jaise hain, vaisa hee karen
jaise hain, vaisa hee karen

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई युवा महात्मा गांधी के पास आते थे और कहते थे कि वह कांग्रेस से जुड़कर काम करना चाहते हैं। महात्मा गांधी कहते थे बहुत अच्छा है। लेकिन आप जहां हैं, वहीं मोर्चा संभालें। आप जो कर रहे हैं, उसी में देशभक्ति और देश की आजादी के लिए संघर्ष का मोर्चा खोल लें। भगत सिंह भी अपने साथियों से यही कहते थे।

हर कोई असेंबली में बम फेंकने की न सोचें। जो कर रहा है, वही करे। मकसद लक्ष्य को हासिल करने का होना चाहिए। एक जैसी काम में भेड़चाल नहीं। इसलिए गीता में कृष्ण कहते हैं मेरे शीर्ष भक्तों में गृहस्थ धर्म वाले हैं यानी जो अपने जीवन को, अपने परिवार के जीवन को बेहतर बनाने के उपक्रम में लगा है, वही असली भक्त है। भागवतपुराण बार-बार कहता है ब्राह्मण का धर्म पूजा पाठ है तो वह पूजा-पाठ करेगा और क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना तो उसे वही सद्गति युद्ध हासिल होगी जो ब्राह्मण को धार्मिक अनुष्ठान से हासिल होती है? आज जरूरत है हम तमाम बाबाओं, गुरुओं की शरण में जाने की बजाय अपने-अपने कर्तव्य में तन्मय होकर जुटें। अगर हम नाई हैं तो बाल काटते हुए आध्यात्मिकता में खो जाएं।

अगर हम बढ़ई हैं तो औजार बनाते हुए धार्मिक अनुष्ठान जैसी लगन हो। हम बस कंडक्टर हों तो सवारियों के साथ हमारा व्यवहार इतना आदर और नम्रतापूर्ण हो कि सवारियाँ इसे याद रखें। हम अध्यापक हों तो छात्रें को कुछ बनाने के लिए अपनी हर कोशिश कुर्बान कर दें। कहने का मतलब यह कि हम जो हों, उसी में अपना सौ फीसदी दें। यही धर्म है। धर्म के लिए न गेरुए कपड़ों की जरूरत है, न अंगरखे की जरूरत है, न बड़े-बड़े प्रवचनों की जरूरत है और न ही दुनिया भर के ढोंग-आडम्बरों की जरूरत है।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)