jab nimma ai dharti par
jab nimma ai dharti par

बात आज से कोई तीस बरस पुरानी है। या शायद इससे भी कुछ पुरानी हो, क्योंकि पुरानी बातों में कभी-कभी पंख लग जाते हैं और उनका कुछ ओर-छोर पता नहीं चलता। तो खैर, असल बात तो निम्मा परी की ही चल रही है ना! सुनाता हूँ, सुना ही देता हूँ वह कहानी।…

हुआ यह कि एक बार परीलोक में रहते-रहते निम्मा परी का जी उचाट हो गया। और मन में एक अजब खटराग सा पैदा हो गया कि ‘चलो धरती पर, चलो धरती पर, चलो…!’

इस कदर कि खुद निम्मा भी परेशान। और परीलोक वाले अलग परेशान, कि भाई, ये क्या अजब झक है, धरती…धरती…धरती…!! जैसे धरती न हुई, विष्णु जी का बैकुंठ हो गया, जहाँ जाए बगैर हमारी निम्मो जी का मन नहीं लग रहा।

मगर निम्मा परी की जिद तो जरा भी कम नहीं हुई, कि धरती पर जाना है, धरती पर…!

यों निम्मा परी थी भी कुछ अलग सी। और परियों से तो बिल्कुल ही अलग। ज्यादातर परियों को तो बस, नाच-गाना ही अच्छा लगता था। वे रात-दिन उसी का अभ्यास करतीं और गाने का सुर बाँधा करती थीं। निम्मा परी ने भी सीख लिया थोड़ा-बहुत, पर ज्यादा नहीं। इसके बजाय उसे आसपास की दुनिया में घूमना और वहाँ के लोगों के बारे में जानना अच्छा लगता था।

वह बहुत बातें सोचा करती थी। खासकर धरती के लोगों की बातें। उनका किस्म-किस्म का रहन-सहन, खान-पान, बोलना-चालना। उनके किस्से-कहानियाँ। उनके हँसी-मजाक और सुख-दुख की अजब कहानियाँ। धरती से लौटकर आई परियाँ इस बारे में बड़ी मजेदार बातें सुनाती थीं और निम्मा परी आँखें फाड़े, बड़ा रस ले-लेकर सुना करती थी।

एक बार की बात, निम्मा परी सोचने लगी, ‘ओहो, बड़ी अजीब है यह परियों की दुनिया। यहाँ जो चीज जैसी है, हमेशा वैसी ही बनी रहती है। इससे तो धरती लाख गुना अच्छी है, जहाँ फूल कभी खिलते हैं तो कभी मुरझाते हैं। लोग आज दुखी हैं तो कल सुखी भी नजर आते हैं। कभी लोग रूठते हैं तो मान भी जाते हैं। चीजें बदलती हैं, मगर इस बदलाव में कितना सुख है। इससे जीवन में कम से कम हलचल तो रहती है। वरना एक जगह खड़ा-खड़ा पानी तो सड़ जाता है। नदी सुहानी है, सुंदर है, पर इसीलिए तो कि वह कल-कल बहती है। सुंदरता समय के साथ बहने में है। रुके रहने में भला क्या मजा?’

आखिर ऊबकर निम्मा परी ने अपनी माँ स्वप्नपरी से कहा, “माँ-माँ, मैं जरा धरती पर घूमने जा रही हूँ।”

सुनकर माँ का दिल सिहर सा गया। बोलीं, “ना-ना बेटी, ऐसा न करना। धरती पर तो बड़ी मुसीबतें हैं। बड़ी भारी मुसीबतें…!”

मगर निम्मा की जिद देख, उसकी माँ ने डरकर कहा, “अरे बेटी, क्या अकेली जाओगी? धरती पर तो सुना है कि…”

“क्या सुना है माँ…?” निम्मा परी हँसकर बोली।

“यही बेटी, कि वहाँ तो सब तरह के लोग रहते हैं। बड़े दुष्ट लोग भी वहाँ हैं। मैंने सुना है, वहाँ अखबार बड़ी उलटी-सीधी खबरों से भरे रहते हैं। पता नहीं, क्या-क्या हो रहा है वहाँ?…ऐसे में किसी ने तुम्हारे पंख चुरा लिए या छड़ी चुराकर तुम्हें किसी कोठरी में बंद कर दिया तो क्या होगा? धरती पर अकेले जाना तो ठीक नहीं, बेटी।”

निम्मा हँसती हुई बोली, “माँ, आप डरती क्यों हैं? हर जगह बुरे लोग हैं तो अच्छे भी। अगर ऐसे ही डरकर रहे तो घर से निकलना ही मुश्किल हो जाएगा।”

निम्मा की माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “अच्छा बेटी, नहीं मानती हो तो परीरानी से इजाजत ले लो।”

निम्मा दौड़ी-दौड़ी गई परीरानी देवयानी के पास। वे उस समय शीशे के आगे बैठी सोलह मन फूलों से दिव्य शृंगार कर रही थीं और हौले-हौले कोई पुराना गीत गुनगुना रही थीं। निम्मा ने धरती पर जाने की इच्छा प्रकट की तो परीरानी को भी थोड़ा अजीब लगा।

चेहरे पर बड़ा सख्त सा भाव, जैसा कभी-कभी ही होता था।

उन्होंने कुछ देर बड़े प्यार से समझाया निम्मा को। धरती की सुनी-अनसुनी बातें बताकर थोड़ा डराया भी। पर निम्मा परी की बहुत उत्सुकता देखी तो बोलीं, “ठीक है निम्मा। जाना ही है तो वहाँ बहुत देर न करना। जल्दी लौट आना।…समझ गईं न?”

बस, निम्मा को तो जैसे मुँहमाँगी मुराद मिल गई। उसने जल्दी में ‘हाँ’ की, और अगले ही पल वह पंख फैलाए धरती की ओर उड़ती जा रही थी, उड़ती जा रही थी।…

धरती के लोगों के प्यार और सरलता के बारे में उसने और परियों से तरह-तरह की बातें सुनी थीं। पर आज तो उसे खुद धरती को देखने का सुख मिलने वाला था। उसे परियों से सुनी इतनी दिलचस्प बातें याद आ रही थीं कि लगा, वह असल में नहीं, सपने में उड़ी जा रही है। उसे रोमांच सा हो आया।

और फिर वह धरती पर पहुँची तो लगा, परियों की बातें सच थीं, पर फिर भी यहाँ की सुंदरता का वर्णन तो किसी ने नहीं किया। आहा, कितनी सुंदर है यह धरती! कितने सुंदर लहलहाते खेत। हवा में झूमते-इतराते फूल, मीठे-मीठे फल। सुंदर पहाड़, हरी-भरी घाटियाँ और दूर-दूर तक फैली छतनार दरख्तों की कतारें। चिड़ियों की मीठी चहकार, ‘कुहु-कुहु…कुहुक…चिरपों…चिरपों…चिरपों…!’

सचमुच, सुंदरता तो यह होती है! भला परीदेश के लोग यह क्या जानें?

किसी जादू की तरह पल भर में ही धरती की अनोखी सुंदरता ने उसे विभोर कर दिया। खेत की मिट्टी और फसलों की महक को उसने महसूस किया। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों का गर्वीला अट्टहास सुना। कल-कल करती नदियाँ के सुरीले गाने के साथ सुर मिलाकर गाया।

और फिर एकाएक उसके मुँह से निकला, “आहा, धरती के क्या कहने!…आहा-आहा, धरती के क्या कहने!”

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)