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Importance of Guru
Importance of Guru in Life

Importance of Guru: गुरु तो बहुत दूर की बात है, एक छोटा सा बीज भी तभी फलता है जब उसकी ठीक से देख-रेख हो, वरना उससे फल-फूल तो दूर हमें उसकी छाया तक नहीं मिल पाती। फिर गुरु तो बहुत ऊंची बात है। हम यह तो कह देते हैं कि गुरु नहीं फलता या उसकी कृपा नहीं मिलती परन्तु कभी यह नहीं सोचते कि हम उसे देते क्या हैं। इस जगत का नियम है बिना दिए कुछ नहीं मिलता। मात्र गुरु के पास आने-जाने से, उसकी माला गले में लटका लेने से या उसका नाम ले लेने से तुम शिष्य नहीं हो जाते। किसी को गुरु बनाना और शिष्य बन जाना दो अलग-अलग घटनाएं हैं। किसी को गुरु बनाना किसी का शिष्य बन जाना नहीं होता। यही कारण है कि लोग जितनी शीघ्रता से किसी को गुरु बना लेते हैं उतनी ही शीघ्रता से वह दूसरा गुरु भी ढूंढ लेते हैं। क्योंकि वह गुरु को लाभ की दृष्टि से आंकते हुए चलते हैं। खुद क्या करते हैं, कितना करते हैं, यह नहीं सोचते। हम जैसा बीज बोते हैं वैसा ही फल पाते हैं। गुरु-शिष्य संबंध को भी यदि लाभ-हानि की दृष्टि से देखेंगे तो परिणाम भी वैसा ही होगा। इसलिए हर शिष्य को चाहिए कि वह अपने भीतर झांककर सोचे कि वह किस भाव से गुरु के साथ है उसमें कितना समर्पण है, कितना परदर्शन वह कुछ सीख रहा है या कुछ जांच रहा है मन में शिकायत है या धन्यवाद अपनी तारीफ चाहता है या रूपांतरण अपना काम निकलवाना चाहता है या कुछ काम आना चाहता है गुरु का कहना मानना मजबूरी है या सेवा भाव तुम गुरु के अनुसार चलना चाहते हो या गुरु को अपने अनुसार चलाना चाहते हो आदि-आदि, जरा गहराई से सोचना, उत्तर अपने आप मिल जाएगा। जैसा हम बीज बोते हैं वैसा ही फल हमें मिलता है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम सेब का बीज बोएं और हमें अनार का फल मिल जाए। इसलिए तुम ठीक से सोचो, तुम गुरु को देते क्या हो बची-खुची, थकी-हारी, निराश ऊर्जा फिर भजन करो या ध्यान जैसी ऊर्जा हम गुरु को देते हैं वैसी ही कृपा के हम स्वयं को हकदार बनाने लगते हैं। यहां देने का अर्थ किसी बाहरी वस्तु से नहीं है तुम्हारे भीतरी समर्पण एवं आत्मदान से है। सच तो यह है तुम अपनी सारी अच्छी, ताजी और सकारात्मक ऊर्जा अपनी वासनाओं पर, संसार की अधूरी कामनाओं को पूरा करने में लगाते हो अपने मन एवं ऊर्जा का शुद्ध पांच प्रतिशत भी गुरु द्वारा बताए गए ध्यान पर नहीं लगाते। गुरु के पास जाते भी हैं तो अपनी तकलीफें लेकर। बुझे हुए एवं निराश मन से। एकदम ऊर्जाहीन, क्षीण, हतोत्साहित।

ईमानदारी से अपने आप से पूछें कि गुरु या उसका कहा हमारी दिनचर्या में कहां, किस स्थान पर आता है वह आपके ध्यान एवं कृत्यों में कितना रहता है जितने आपके अन्य कार्य महत्त्वपूर्ण हैं, क्या गुरु के सपने व आदेश भी आपके लिए उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जैसे मस्तिष्क में दुनिया भर की बातें रहती हैं क्या गुरु की बातें भी ऐसे ही याद रहती हैं गुरु के इशारों को तुम कितना समझते हो गर
समझते हो तो उन्हें कितनी प्राथमिकता देते हो गुरु के उत्तर को कितना अपनाते हो आदि-आदि। तुम पाओगे कि तुम्हारे कृत्यों और उद्देश्यों में बड़ा भेद है। तुम्हारे रास्ते तुम्हारी मंजिल से मेल क्यों नहीं खाते। गुरु शब्द तुम्हारे जीवन में नाम के लिए ही है। तुम्हारे प्रयास, तुम्हारे सपने कहीं कुछ और
ही बुन रहे हैं। जहां पर तुम हो वहां से कोई रास्ता गुरु के द्वार तक नहीं जाता। तुम गुरु के समक्ष मौके-बे-मौके हाजिरी जरूर लगाते हो पर वहां हाजिर नहीं होते। तुम्हारी मौजूदगी में तुम्हारी मांग की मिलावट होती है। फिर कहते हो ‘गुरु नहीं फलता। बचा-खुचा दोगे तो बचा-खुचा ही मिलेगा।

Importance of Guru
Importance of Guru in Life

इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु तुम्हारे किसी उपहार या चढ़ावे का भूखा है या उसके मन को किसी प्रलोभन से जीता जा सकता है। पहली बात तो गुरु को बाहर की, संसार की किसी वस्तु से आकर्षित नहीं किया जा सकता। और दूसरा गुरु को जीतने की नहीं, स्वयं को हराने की आवश्यकता है। जो स्वयं को हारना जानता है वही गुरु की कृपा का पात्र बनता है। गुरु को जीतने वाले नहीं स्वयं को हारने वाले सच्चे व सही अर्थों में शिष्य कहलाते हैं। परन्तु तुम दान करने में तो सबसे आगे रहते
हो पर समर्पण करने से बचते हो। तुम संवरना तो चाहते हो पर मिटना नहीं चाहते। तुम बचाना तो चाहते हो पर लुटाना नहीं चाहते। इसलिए तुम्हारे देने पर बहुत कुछ निर्भर करता है। जैसा लगाते हो वैसा पाते हो। तुम गुरु के पास तब जाते हो जब दुखी होते हो। उसकी तब सुनते हो जब सब प्रयास कर-करके हार चुके होते हो। कई दिनों से गुरु से नहीं मिले इसलिए कहीं कुछ बुरा न हो जाए या गुरु नाराज न हो जाए, इस ग्लानि या भय से तुम उससे मिलने जाते हो। घर-दफ्तर के सारे काम
निपटाकर, सारी यारी-रिश्तेदारी निभाकर तुम गुरु से मिलते हो। दर्शन के लिए विलंब से पहुंचते हो और जब पहुंचते हो तो वापस घर जाने की जल्दी रहती है। तुम्हारा मिलना न मिलना सब बराबर हो
जाता है। फिर तुम कहते हो कि कृपा नहीं मिलती। तुम नहीं तो तुम्हारा मन दौड़ताभागता रहता है। तुम ठहरते ही नहीं हो और कृपा तो ठहरने वालों को, रुकने वालों को ही मिलती है। ङ्खतुम इतने विचलित, व्यथित और दूषित हो चुके हो कि यदि तुम पर कृपा बरस भी गई तो तुम तक पहुंचेगी नहीं। गुरु की शुद्ध ऊर्जा और तुम्हारी ऊर्जा का क्या मेल। तुम अपने कारण से उसे भी मैला कर दोगे। तुम पहले से ही इतने भरे हुए हो कि तुम्हारे पास उसकी कृपा के समाने की जगह ही नहीं है और तुम दोष
देते हो गुरु को। शिष्य को चाहिए कि वह स्वयं को इस योग्य बनाए कि गुरु की शक्ति उस पर कार्य कर सके। शिष्य को चाहिए कि उसकी नजर व्यर्थ की चीजों पर नहीं स्वयं अपने ऊपर हो ताकि वह गुरु की नहीं, अपनी कमी देख सके। क्योंकि जिस दिन शिष्य की नजर अपनी ओर होती है उस दिन उसे गुरु फलने लगता है और उसकी कृपा भी मिलने लगती है।

गुरु बनाने से गुरु नहीं मिल जाता, तुम्हारे शिष्य होने से तुम्हें गुरु की प्राप्ति होती है। स्वयं को बचाओगे तो गुरु मिलकर भी न मिलेगा। मिटाओगे तो पाओगे वह तुम्हारे चारों ओर मौजूद है और उसकी कृपा सब तरफ से बरस रही है। सवाल गुरु के फलने का नहीं तुम्हारे पनपने का है, बात फल की नहीं बीज की है। इसलिए सिर्फ यह सोचो क्या तुम शिष्य हो शेष जाने दो।

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