Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “सुनो, मुझे सुसु आई है ज़ोरों की।” “अरे! तो पहले क्यों नहीं कहा; ज़ोर मारने का वेट कर रही थी?” मैंने हँसते हुए कहा। “चुप रहो, ज़्यादा बकवास ना किया करो।”

आज का दिन यूँ तो धूप वाला, उदास और परेशान करने वाला होता; पर हमारे मिलने के मंसूबे ने इसे पाकीज़ा बना दिया। हमारे शहर से लगे इलाकों में अब भी जंगलों का लहलहाना बाकी है और कुछ पहाड़ भी समतल होने से बचे हुए हैं। मैंने एक घाटी पर जगह देखकर कार रोकी, जहाँ से नीचे उतरकर इस ज़रूरी क़ुदरती करतूत को अंजाम दिया जा सके।

“अरे! तुम पीछे-पीछे क्यों चले आ रहे हो?” उसने थोड़े गुस्से से कहा।

“चिंता न करो, तुम्हें ऐसे देखने की नीयत होगी तो कह दूँगा, चोरी छिपे ताँका-झाँकी करना कोई शरीफ़ों का काम नहीं।” मैं उसकी मदद की पाक़ नीयत से ही पीछे जा रहा था क्योंकि; जो रास्ता था, वह बरसाती पहाड़ी नाले से बना रास्ता था और यह शर्मीली ज़्यादा दूर तक उतरने वाली थी, जहाँ से वह मेरी नज़रों से ओझल हो सके; यह मुझे पता था।

मैंने आगे कहा-“कोई जानवर-वानवर मिल गया तो? मैं इंतज़ार ही करते रह जाऊँगा। ज़्यादा दूर नहीं जाना, वो पत्थरों के पीछे चले जाओ।” हालाँकि मुझे पता है अब जानवर तो नहीं ही बचे इस जंगल में, पर दोपाए कहीं भी पाए जा सकते हैं।

“मैं देख लूँगी ना, तुम वहीं रुको।” उसने आगे बढ़ते हुए कहा।

“हाँ ना, परेशान ना हो। मुँह घुमा के ही खड़ा हूँ और इतनी दूर तो हो ही कि,आवाज़ भी ना आए।” मैंने हँसते हुए कहा।

“चुप तो।” उसने कहा और आँखों से ओझल हो गई।

मैंने वहीं घाटी की ढलान पर, दरख्तों की छाँव में एक शिलाखंड पर बैठ सिगरेट जला ली।

वह वापस आई, और मेरे बगल में ही बैठ गई। सड़क से दूरी इतनी ही थी कि, हमारी कार सर उठाकर आसानी से देखी जा सकती थी।

“सुनो, तुम इतनी अंडबंड और फिलोस्फ़ी की इतनी गाढ़ी बातें कैसे कर लेते हो? आज की तुम्हारी बकवास के लिए सोचती हूँ तो हँसी आती है और कल रात की तुम्हारी इतनी गहरी बातें कि, दुनिया के सारे ज्ञान का बोझ तुम्हारे ही सर हो।”

“डार्लिंग! कल तुम्हें यही तो कह रहा था। समझदारी से ज़िंदगी जी जा सकती है। लेकिन उसमें जीने जैसा कुछ होगा नहीं। जो ज़िंदगी है वह अल्हड़ता है।”

“तो समझदार होना ही क्यों?”

“वह भी ज़रूरी है डियर। बिना समझ के अल्हड़ ही पैदा हुए थे हम। फेरे की डगर नाप लेना ही ज़िंदगी है।”

“तुम्हारी बातें बहुत बार बखेड़ा खड़ा कर देती हैं। बिना समझ के आज तुम्हें या मुझे कोई जीने देगा?”

“यही तो कह रहा हूँ। समझ ज़िंदा रहने के लिए। जीने के लिए अल्हड़ता। अब देखो, तुम इतनी ही अक्लमंद होती तो अभी अपने कॉलेज में बच्चों का भविष्य ही तो ख़राब कर रही होती ना? झूठा बहाना बनाकर तुमने जो छुट्टी ले ली, उससे हम जी पाए और तुम्हारे स्टूडेन्ट्स भी…हा…हा…”

“पाजी कहीं के। कभी मेरे लिए कुछ अच्छा तो कहना ही नहीं है तुम्हें…”

“कहा तो था, मुझे चार-पाँच औलादें दे दो।”

“किसी दिन ठीक से कूटूँगी तुम्हें।” बाज़ू या लफ़्ज़ वह ताक़त कहाँ से लाते; जो आँखों से बयाँ हो गई।

“हाज़िर हूँ।”

“आज बख़्शती हूँ। अब चलो भी।”

उठते हुए उसने मेरा हाथ यूँ कसा, जैसे मुझे खींचकर ले जा सकती हो।

बरखा को तरसते नाले की छाती हम नाप रहे थे; पर हमारे सीनों के पीछे जन्नत के चश्में कलकला रहे थे।