Hindi Love Story: “क्या हुआ, मूड ठीक नहीं है क्या?” वह कार में आकर बैठी, तब कुछ देर बाद उसकी शांति देखते हुए मैंने पूछा।
“मुझे बात ही नहीं करनी तुमसे।”
“ओके। कोई बात नहीं।” उसके झूठ की पहचान है मुझे, बात ना करनी होती तो आती ही क्यों?
“हाँ, तुम्हें क्यों फ़र्क पड़ेगा मेरे बात करने से या नहीं करने से। मुझे लेकर ही क्यों आए जब बात नहीं करनी थी? वापस छोड़ दो मुझे नहीं जाना कहीं।” उसने आँसू ढ़लकाते हुए कहा।
“अरे यार, मज़ाक कर रहा था ना। तुमसे बात किए बग़ैर कैसे रह सकता हूँ, कैसे बुद्धुओं की तरह कर रही हो, क्या हुआ है बताओ?” मैंने अपनी दिल्लगी का लहजा छोड़ा।
“मैं बुद्धु ही हूँ ना। ठीक बोलते हो।” उसका ढंग और भी रुआँसा हुआ।
“अरे नहीं यार! कुछ भी मीनिंग मत निकालो। मुझसे कुछ गलती हुई है ना? बताओ तो क्या गलती हुई? हो सकता है मेरे नोटिस में ही ना हो।” हालांकि मुझे पता था कि, वह किस बात पर नाराज़ है और उसे होना भी चाहिए था।
“कल रात कहाँ थे तुम?”
“था किसी के साथ, क्यों? क्या हुआ?”
“किसके साथ?”
“मेरी एक दोस्त थी।”
“कौन दोस्त भई, जिसके साथ इतनी रात तक थे और कितनी पी हुई थी तुमने?”
“अरे तुम नहीं जानती उसे। मेरी स्कूल फ्रेण्ड है; बेचारी की शादी तीन महीने पहले ही हुई है। अपने ससुराल वालों को लेकर बहुत ज़्यादा परेशान थी, वही सब बातें चल रही थीं।”
“तो तुम उसे रोने के लिए अपना कंधा दे रहे थे?”
“हाँ, तभी तो किसी लड़की का दिल मिलता है ना?” मैंने यह बात उस बोध से कही नहीं थी, जो इसके मायने निकल सकते थे।
“बहुत हो गया तुम्हारा। मुझे वापस छोड़ो। या रहने दो यार। कार रोको, मुझे यहीं उतरना है।” उसका हर शब्द आवेश रहित रुदन से नहाया हुआ था।
“हा…हा…अरे प्यारु, काहे को इतना गुस्सा? वैसे तुम्हारे गुस्से में मज़ा बहुत आता है मुझे। मेरा सपना है कि एक दिन तुम्हें बहुत ज़्यादा गुस्सा कर दूँ और ज़बरदस्ती प्यार करूँ।”
“गलती से भी मत सोचना ऐसा; नाख़ून दिख रहे हैं ना मेरे? तुम्हारी पूरी स्कीन नुच जाएगी। कार क्यों नहीं रोक रहे तुम?”
“रोक दूँगा न, थोड़ा आगे। वहाँ टैक्सी आराम से मिल जाएगी।” दरिया के चढ़ आए पानी का वक़्त ही इलाज है।
“बस! बंद करो। कितना दिखावा करोगे और कि, मेरी कितनी परवाह है तुम्हें?” उसकी खीज बढ़ गई।
“परवाह काहे को? तुम कोई दूध पीती बच्ची हो या हॉस्पिटल में एडमिट पेसेंट; जिसकी फ़िक्र की जानी ज़रूरी है?”
“तुम रोक रहे हो या नहीं?”
“रोक दूँगा। पाँच मिनट में चौक आ जाएगा।”
उसकी चुप्पी बनी हुई थी। मैंने आगे कहा- “अबे मोटो! कल मैं अकेला ही था। तुम्हें मैसेज किया तो था कि, आज शायद बात नहीं हो पाएगी। सौरभ के भाई की शादी से वापस आते-आते ही 11 बज गए थे; वहाँ से भी तो मैसेज किया था। उसके बाद दोस्तों के साथ बहुत देर तक घर के सामने पहुँच कर ही बातें होती रहीं। कोई ना कोई साथ ही था पूरे टाइम और तुम्हारे मैसेज का रिप्लाई करने जितना तो होश नहीं था मुझे। थोड़ी ज़्यादा तो हो ही गई थी, अब तक असर है थोड़ा। दिन भर सोया हूँ, तब तो शाम को थोड़ा चलने-फिरने लायक़ हुआ।”
“ठीक है ना। तुम्हें एक बार थोड़ा सा भी नहीं लगता कि, मेरी क्या हालत होती होगी? रात में दो बजे तक तुम्हारे मैसेज का वेट कर रही थी। और क्या मैसेज भेजा था तुमने? पढ़कर बताओ तो; टाईप तक करते बन नहीं रहा होगा तुमसे। हद हो गई है यार; मैं सच में पागल हूँ जो दो-दो, तीन-तीन बजे तक तुमसे बात करने के लिए जागते रहूँ और तुम दोस्तों के साथ दारू पी के बेहोश रहो।” मुझे तसल्ली हुई कि, उसका रुदन शिकायत में बदल गया था।
“मानता हूँ ना भाई; मेरी गलती थी, सॉरी।” मैंने पूरी संजीदगी और असलियत से कहा।
“रहने दो, नहीं चाहिए तुम्हारी सॉरी। प्रॉमिस दे सकते हो मुझे?” मेरी तसल्ली और बढ़ गई कि शक के दलदल से अब निकाला जा चुका हूँ।
“देखो डियर, बच्चे पर अत्याचार नहीं करते। कभी-कभी गलती से मिस्टेक हो जाती है ना; माफ़ करना ही तो बड़े दिल वालों का काम है।”
“सॉरी! नहीं है मेरा दिल इतना बड़ा। प्रॉमिस दे रहे हो या नहीं?” अब उसकी ज़बान हक़ की हो गई थी।
“बात समझो, कभी प्रॉमिस टूट गया तो उसके लिए भी सॉरी बोलना होगा और तुम्हें सॉरी-वॉरी सुनने में कोई इण्ट्रेस्ट है नहीं; तो काहे को बेकार के झमेले पालना?” मैं बातों को उलझा कर गंभीरता से निकल जाने की डगर देख रहा था।
“मैं जानती थी, तुम्हारी नौटंकी रहेगी ही रहेगी।” उसने समतल लहज़े में कहा।
“अच्छा, वैसे इन सब में एक बहुत अच्छी बात हुई; तुमने नोटिस में लिया?”
“क्या?” शायद मैं कामयाब हो ही गया था, वायदों के बंधन से निकलने में।
“मेरी किसी बेचारी फ्रेण्ड को अपनी ससुराल में परेशान नहीं होना पड़ा और ना मेरे कंधे पर सर रखकर, रात भर रोना पड़ा। दिलों का तो जरा नुक़सान उठाना पड़ा हमको, बस।”
“तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर दूंगी किसी दिन।” उसने बड़ी ही अदा से अपनी उँगली को चाकू की तरह इस्तेमाल करते हुए मेरी बाँहों पर चॉपिंग की तरह चलाया।
“फिर कुत्तों को नहीं खिलाओगी टुकड़े?”
“नहीं। मैं ख़ुद खा जाऊँगी।”
हम कभी लड़े नहीं, आज भी नहीं।
जंग पर वे कैसे क़ायम रहें; जिन्हें वक़्त की तंगी है।
परवरदिगार कभी यूँ ना करे कि, इश्क़ से वक़्त ज़ाया जाए। आमीन!
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
