Hindi Immortal Story: “इस समय देश बँटा हुआ है और अंग्रेज एक-एक करके सभी बड़े और शक्तिशाली राज्यों को खत्म करते जा रहे हैं। यह खतरे की घंटी है। इसे अगर अभी नहीं सुना, तो देश पूरी तरह अंग्रेजों के कब्जे में चला जाएगा। आपस में लड़ने की बजाय हम मिलकर अंग्रेजों से क्यों न लड़ें? अगर हम मिलकर लड़ें तो अब भी अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर सके हैं।”
यही विचार था जो हैदर सुल्तान के भीतर हचचल मचा रहा था, जब उसने अपनी बहादुरी के बल पर एक अलग और शक्तिशाली सत्ता कायम की और फिर अंग्रेजों को आगे बढ़ने से रोकने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया।
मैसूर में हैदरअली ने अपनी अपनी चतुर रणनीति और वीरता के बल पर देखते ही देखते अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली कि अंग्रेज उससे आतंकित थे। उन्होंने हैदरअली पर आक्रमण कर दिया।
निजाम की सेना हैदरअली का साथ देने के लिए आई। पर उसका रवैया ढुलमुल था। कभी वह टीपू का साथ देने के लिए हामी भर लेता, तो कभी अंग्रेजों के लालच और घुड़की देने पर फिर हैदर की मदद करने में आनाकानी शुरू कर देता। शुरू में उसने हैदर को मदद करने का वचन दिया था। जब स्मिथ हैदरअली पर हमला करने के लिए आया, तो निजाम ने एकाएक अपनी फौजें हटा लीं और हैदर को अकेले अंग्रेजों का सामना करने के लिए छोड़ दिया। यह एक बड़ा धोखा और विश्वासघात था। अंग्रेजों की भेदभाव की कपटनीति काम कर गई। इससे हैदर को धक्का पहुँचा और उसकी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा।
अंग्रेजों के लिए यह अच्छा मौका था। छल और फरेब की राजनीति करने वाले अंग्रेजों ने बड़ी तेजी से यह अफवाह उड़ा दी कि युद्ध में हैदर की हार हो गई है। वे सोच रहे थे कि इससे हैदर अलग-थलग पड़ जाएगा और उसकी हिम्मत टूट जाएगी।
पर हैदरअली किस मिट्टी का बना है, यह उन्हें पता न था। फौलादी संकल्पशक्ति वाले बहादुर हैदर ने फिर अपनी सेना में जोश भरा और मुकाबले के लिए डट गया।
उधर युद्ध में हैदर के हारने की अफवाह उसकी बूढ़ी माँ ने भी सुनी। सपनकर उनसे रहा न गया। आखिर वे लड़ाई के मैदान में बेटे को हिम्मत बँधाने के लिए चल पड़ीं।
बरसात का मौसम था और बहुत फिसलन भरा कठिन रास्ता। पर वे जरा भी नहीं डरी। उनकी पालकी के साथ एक हजार घुड़सवार और बुर्का पहने दो सौ औरतें घोड़े पर सवार थीं। इन्हें वे लड़ाई के मैदान में हैदर का साथ देने के लिए ले जा रही थीं। आखिर वे बेटे के पास पहुँचीं और उसकी जीत के लिए दुआ माँगी। हैदरअली में फिर से जोश भर गया और उसने युद्धभूमि में अंग्रेजों के दाँत खट्टे किए।
हैदर की तरह ही उसका बहादुर और निर्भीक बेटा टीपू अलग अंग्रेजों की नाक में दम किए हुए था। साहस में वह किसी सिंहशावक जैसा था। उसे पता चला कि अंग्रेज चेन्नई में आसपास के छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर इकट्ठे हुए हैं और जीत का जश्न मना रहे हैं। सुनते ही टीपू बिजली की सी गति से अपने कुछ वीर बाँके सैनिकों की टुकड़ी लेकर वहाँ जा पहुँचा।
उस समय टीपू का नाम ही अंग्रेजों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था। उसके नाम से ही अंग्रेज थर-थर काँपते थे। टीपू को यों अचानक आया देख, अंग्रेजों के होश उड़ गए और वे जल्दी से पानी में नावों पर बैठ, भाग खड़े हुए।
टीपू सुल्तान ने मंगलौर में भी अंग्रेजों को बुरी तरह शिकस्त दी। इस जीत की खुशी में हैदर ने एक चित्र बनवाया, जिसमें हैदरअली तोपों के ढेर पर बैठा था। अंग्रेज सिर झुकाए हाथ में संधि-पत्र लिए खड़े थे तथा स्मिथ खुद अपने हाथ से अपनी तलवार के दो टुकड़े कर रहा था। डूप्ले की नाक सूँड़ जैसी बनाई गई थी, जिससे हैदर के आगे अशर्फियाँ गिरती हुई दिखाई पड़ रही थीं।
इससे मैसूर के इस वीर बेटे का यश दूर-दूर तक फैल गया और अंग्रेजों में दहशत दिखाई पड़ने लगी।
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