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गृहलक्ष्मी की कहानियां - किस्मत का खेल
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां – पिछले साल मेरे पति एक सड़क हादसे में हमें छोड़ कर चले गये। इस कारण कुछ महीनों बाद हमें अपना सरकारी मकान खाली करना पड़ा। शहर के बाहरी हिस्से में एक कम किराये वाला फ्लैट ले कर हम वहां रहने के लिए चले गये। फ्लैट बहुत बड़ा तो नहीं था, पर मेरे और मेरे दो बच्चों- सात साल की वंदना और चार साल का मुकुंद के लिए काफी था। मुझे पैसों की कोई खास दिक्कत नहीं थी। मेरे पति की बचाई हुई रकम, जीवन बीमा, प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी के पैसे, मेरी फैमिली पेंशन और मेरे लेखों की कमाई, कुल मिला कर मुझे अच्छी आमदनी दे रहे थे, जो हमारी जरूरतों को बड़े आराम से पूरा कर रही थी। हमारी नई कालोनी छोटी सी थी, पर उसमें बच्चों के खेलने के लिए एक पार्क था, जो हमारे ब्लाक के बिलकुल पास था। शाम को वंदना के स्कूल से आने के बाद, मैं दोनों बच्चों को वहां खेलने भेज देती थी। खेलने के बाद,जब बच्चे घर लौटते तो मुकुंद अकसर गुस्से से भरा और उखड़े मिज़ाज में होता था। दोनों से पूछताछ करने पर उसकी वजह मिली। वंदना के हमउम्र की तो कई लड़कियां खेलने आती थीं, सो वंदना का तो समय हसीं-खुशी में बीत जाता था। पर मुकुंद के बराबर का एक ही लड़का था और वह भी कभी-कभी ही आता था। बाकी बच्चे या तो एक-दो साल के शिशु थे, जिनकी आया उनको वहां लाती थीं, या नौ-दस साल के लड़केथे। जो बड़े बच्चे थे वह झूले और सीसौ पर कब्जा जमा लेते थे।

नतीजा यह था कि मुकुंद को ज्यादातर एक तरफ खड़े हो कर तमाशा ही देखना पड़ता था। बेचारा इस कारण काफी दुखी था। मैंने जब वंदना को कहा कि वह मुकुंद को भी अपने साथ खिलाए तो उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसे धर्म-निंदा को कहा हो।’मम्माउसने मुझे समझाया, जैसे कोई नासमझ बच्चे को समझाता है- ‘आप क्यों चाहती हैं कि मेरे सारे दोस्त मुझ पर हंसें और मेरे साथ खेलना छोड़ दें।हमारे नए फ्लैट में जाने के तकरीबन एक महीने बाद, वंदना जब एक दिन खेल कर आई तो उसके साथ एक और लड़की भी थी। ‘मम्मा, यह है उपासना, मेरी सब से अच्छी दोस्त, मेरीबेस्टेस्ट फ्रेंडवंदना ने उसका परिचय दिया।

उपासना ने मुझे नमस्ते किया। देखने में वह तकरीबन वंदना की उम्र की ही थी, पर कद उसका कुछ छोटा था और वह बहुत दुबली-पतली थी। उसके बाल छोटे कटे थे और वह एक साधारण सी सलवार-कमीज पहने हुए थी। जब मैंने उसके चेहरे की ओर देखा, तो मैं थोड़ा चौंक गई। उपासना की आंखें काफी बड़ी थी पर उनमें ऐसी गहराई थी जैसी मैंने आजतक कभी किसी की आंखों में नहीं देखी थी और उन गहराइयों में, कहीं दूर छिपा एक दर्द था।

मेरा दिल उपासना की ओर उसी समय खिंच गया और मैंने सोचा ‘इस बच्ची के साथ जरूर कोई हादसा हुआ है।पूछताछ करने पर पता लगा कि वह हमारे यहां से तीन ब्लॉक आगे रहती थी और पास के गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ती थी। उसका बाप स्वयं का रोजगार चलाता था और मां टीचर थी। मैंने बच्चों को कुछ नमकीन दिया और 2 गिलास कोला पीने को दिया। खी-पी कर उपासना ने मुझे बड़ी गंभीरता से ‘थैंक यूकहा और चली गई।

उस दिन के बाद, उपासना अकसर हमारे घर आया करती थी। वंदना और वह अच्छी तरह घुल-मिल गए थे। दोनों गुडिय़ों के साथ खेलते या फिर कम्प्यूटर पर कुछ न कुछ करते रहते थे। मुकुंद को भी पड़ोस में हाल में ही आए एक परिवार के दो हम-उम्र के लड़के मिल गए थे, जिन से उसकी दोस्ती हो गई थी। उसको अब अपनी दीदी से कोई शिकायत नहीं थी।

उपासना के बारे में कुछ बातें मुझे जंचती नहीं थी, पर मैंने उन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था। पहली बात थी कि हमारे घर दरजनों बार आने पर भी उसने कभी वंदना को अपने घर नहीं बुलाया। जब भी वंदना उसके घर जाने की इच्छा प्रकट करती थी, उपासना कोई न कोई बहाना बना कर टाल देती थी। दूसरी बात थी कि हमारी एक अच्छी-खासी मिडल क्लास कालोनी में रहने के बावजूद ऐसा लगता था कि उसके पास केवल तीन या चार जोड़ी कपड़े ही थे, वह भी काफी घिसे-पिटे। तीसरा बात थी कि उसने यह तो बता दिया था कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है और उसके कोई भाई-बहन नहीं है, पर उसके आगे वह अपने परिवार के बारे में बात करने से बहुत हिचकिचाती थी। इन बातों की वजह से मेरे मन में कभी-कभी उपासना के बारे में शंका सी उठती थी, पर घर चलाने और अपने लेखन कार्य को समय पर पूरा करने के दबाव में मैं उसके बारे में उठने वाले प्रश्नों का उत्तर ढूंढऩे में प्रयत्नशील कभी हो ना सकी।

वंदना के पापा ने अपने हादसे से एक महीना पहले, उसके जन्मदिन पर उसे एक बच्चों वाली साइकिल उपहार में दी थी। उन्होंने वंदना को साइकिल चलाना सिखाने का वायदा तो किया था, पर इसके पहले कि वह अपना वादा पूरा करते वह गुजर गए। मैंने वंदना को कई बार कहा कि वह साइकिल चलाना खुद ही सीख ले, पर वह हमेशा जवाब देती कि वह गिरने से डरती है और इसलिए कहती कि वह फिर कभी कोशिश करेगी।

एक दिन उपासना ने वह साइकिल देख ली। जब उसने सुना कि गिरने के डर के मारे वंदना उसे चलाती नहीं थी, तो वह जबरदस्ती वंदना को साइकिल समेत नीचे ले गई। वहां उसने वंदना को साइकिल पर बैठाया और साइकिल को पीछे से पकड़ा ताकि वह सीधी रहे। फिर वंदना ने पैडल मारना शुरू किया और उपासना साइकिल का पिछला हिस्सा पकड़े उसके साथ-साथ भागने लगी। लगभग एक घंटे उपासना ऐसे ही वंदना के साथ भागी। वह पसीने से लथपथ हो गई, पर उसने वंदना का साथ नहीं छोड़ा। तब तक वंदना का साहस और आत्मविश्वास काफी बढ़ चुका था और वह अपने मनोबल पर साइकिल चलाने लगी थी। मैं उपासना को धन्यवाद देना चाहती थी और तोहफे के तौर पर एक बड़ा चॉकलेट उसके लिए ले कर खड़ी थी, पर वह ऊपर नहीं आई, नीचे से ही सीधे अपने घर चली गई।

वंदना जब खाली हाथ ऊपर आई, तो मैंने उससे पूछा कि उसकी साइकिल कहां है? उसने जवाब दिया कि साइकिल को सीढिय़ों के नीचे खाली जगह में पार्क कर दिया था और उसका बिल्ट-इन ताला लगा दिया था। वंदना ने यह भी कहा कि साइकिल की चाभी वह अपने पास रखेगी, क्योंकि अब वह रोज साइकिल चलाया करेगी। मैंने मन ही मन उपासना को दुआएं दीं।

तकरीबन एक महीने बाद, एक शाम वंदना खेल कर बहुत जल्दी घर लौट आई। उसका चेहरा लटका हुआ था और उसकी आंखों में आंसू थे। यह सोचते हुए कि शायद उसका किसी के साथ झगड़ा हुआ है, मैंने पूछा ‘क्या बात है बेबी? तुम इतनी उदास क्यों हो?”

मेरी आवाज सुनते ही वंदना रोने लगी और मुझ से चिपक गई। सिसकियों के बीच उसने मुझे बताया कि उपासना अपनी मां के साथ, हमारी कालोनी छोड़ कर चली गई थी। वह तो उसकी बेस्टेस्ट फरेन्ड थी पर उसने उसे भी कुछ नहीं बताया और उसको गुडबाई भी नहीं किया। इसलिए अब वह सारी जिंदगी किसी को अपना दोस्त नहीं बनाएगी और वह उपासना को कभी माफ नहीं करेगी।
वंदना की बात सुन कर मुझे काफी हैरानी हुई। सोचा कि जरूर दाल में कुछ काला था। मामला तहकीकात करने लायक था। मैंने वंदना को मुश्किल से चुप कराया और उसका मन बहलाने के लिए उसे कुछ काम दे दिया।

अगले दिन कालोनी में पूछताछ करने के बाद, उपासना के जीवन की कड़वी सच्चाई सामने आई। पता चला कि उसका बाप एक शराबी था और कोई काम नहीं करता था। ऊपर से नशे की लत थी, अपनी नशे की तलब को पूरा करने के लिए वह अपनी बीवी की आधी तनखा उड़ा देता था। अक्सर उसको पीट भी देता था। बेचारी चुपचाप सब सह लेती थी। इसके साथ यह भी पता लगा कि वह असल में उपासना का सौतेला बाप था। अब किन कारणों से उपासना की मां ने उससे शादी की थी यह तो पता न लग सका। पर दो दिन पहले नशे की हालत में जब वह घर लौटा तो घर पर उपासना अकेली थी, पता नहीं क्या उसके मन में विचार आया कि उसने उपासना का बलात्कार करने की कोशिश की। जब उपासना ने विरोध किया तो उसने उसे बेरहमी से पीटना शुरू किया कि वह तकरीबन बेहोश हो गई। पर तभी उपासना की मां घर लौट आई, उसने अपनी बेटी को बचाने की कोशिश की तो उसे भी बेहद मार खानी पड़ी।

बाद में जब उपासना से सारी बात उसे पता लगी तो उपासना की मां को लगा कि अब पानी सिर से ऊपर चढ़ गया था। उसी रात, जब उसका पति नशे की हालत में धुत्त पड़ा था, तो उसने जरूरी सामान इकठ्ठा किया और बेटी को लेकर किसी गुमनाम मंजिल के लिए निकल गई। जाते-जाते पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला को बस इतना बता गई कि वह जल्दी ही किसी वकील द्वारा अपने पति को तलाक के कागज भेजेगी। समय बीता। वंदना अपने बाकी दोस्तों में व्यस्त हो गई और धीरे-धीरे उसने उपासना के बारे में सोचना बंद कर दिया। मैंने भी कामकाज और घर के चक्कर में इस मामले को जल्द ही भुला दिया।

25 साल गुजर गये। बच्चे पढ़-लिख कर बड़े हो गई। वंदना शादी के बाद अपने पति के साथ अमेरिका में जाकर बस गई। मुकुंद फौज में भर्ती हो कर अफसर बन गया। वैसे तो दोनों बच्चे मेरा हालचाल जानने के लिए सप्ताह में दो-तीन बार जरूर फोन करते थे, पर उनके जाने के बाद मैं अपने आपको काफी अकेला महसूस करने लगी थी।

एक सुबह, नाश्ते के तकरीबन एक घंटे के बाद मेरी छाती में अचानक जोर का दर्द होने लगा। मैं डर गई कि शायद मुझे दिल का दौरा पड़ रहा है। तुरंत एक टैक्सी मंगा कर मैं अस्पताल पहुंची। डॉक्टरों ने मेरी जांच की और बताया कि मुझे हार्ट अटैक नहीं हुआ था। छाती का दर्द, पेट की गैस के कारण हुआ था। मैंने चैन की सांस ली और बाहर की ओर चली।

रास्ते में, एक सफेद कोट पहने लेडी डॉक्टर, मेरी ओर आ रही थी। अचानक वह मेरे सामने रुक गई और उसने मुझे नमस्ते किया। मैंने भी नमस्ते तो किया पर बोली, ‘माफ करना डॉक्टर साहिबा, मैंने आपको पहचाना नहीं।

‘आंटीजीउसने जवाब दिया ‘आप वंदना की मां हैं ना?

मैं आश्चर्य में पड़ गई ‘हां, मैं वंदना की मां तो हूं, पर यह तुम को कैसे पता?मैंने पूछा। उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान छा गई और उसने जवाब दिया ‘आंटीजी, मैं उपासना हूं। वही लड़की जिसने आपकी बेटी को साइकिल चलाना सिखाया था।

मेरी आंखों से परदा हट गया और मेरे सामने सफेट कोट वाली डाक्टर नहीं, अपितु एक छोटी-सी, दुबली-पतली सी साधारण कपड़े पहने हुई लड़की खड़ी दिखाई दी।

हम दोनों गले मिले, फिर उपासना मुझे अपने केबिन में ले गई। वहां चाय पीते-पीते उसने बताया कि उसकी मां उसके साथ, कालोनी छोडऩे के बाद एक दूसरे शहर में जा कर बस गई। वहां उसकी मां ने फिर टीचर की नौकरी शुरू की और साथ-साथ घर पर ट्यूशन भी देने लगी। उपासना को उसने पढ़ा-लिखा कर डाक्टर बना दिया।

जब मैंने उसकी मां से मिलने की इच्छा प्रकट की, तब पता चला कि दो साल पहले, स्वाइन फ्लू के कारण उसका देहांत हो गया था। उपासना अब अकेली रह रही थी। फिर मैंने उसे वंदना और मुकुंद के बारे में बताया और अंत में कहा कि अब मैं भी अकेली रह रही थी। तब मैंने उससे पूछा कि क्या उसका विवाह हो गया है?

उपासना ने कहा, ‘आंटी जी, मां जब तक जीती रही, वह बहुत कोशिश करती रही कि मैं शादी कर लूं पर मेरे मन में पुरुष वर्ग के प्रति कुछ ऐसा अविश्वास बैठा हुआ है कि यह संभव ना हो सका‘। मुझे सुन कर बेहद दुख हुआ, पर इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उपासना ने मेरी मनोदशा समझते हुए कहा, ‘यह ठीक है कि मां के जाने के बाद से मेरी जिंदगी में जो खालीपन सा छा गया था वह आज ऊपर वाले की कृपा से दूर हो गया।वह अपनी कुर्सी से उठ कर मेरे गले लग गई और बोली ‘आंटीजी, अब हम दोनों अकेले नहीं रहे। मुझे मां मिल गई और आपको बेटी।

खुशी के मारे मैं कुछ बोल तो ना सकी, पर सिर ऊपर से नीचे हिला कर मैंने उसकी हां में हां मिला दी।

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