भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
आज उसकी किताब प्रकाशित हो कर आ गई थी और इस समारोह में उसका विमोचन होने वाला था। जिनकी किताबों का आज विमोचन किया जाने वाला था, उस सूची में कुछ और लोगों के नाम भी शामिल थे। सबके घर से कोई-न-कोई उस समारोह में शामिल होने आया था। किसी-किसी का तो पूरा कुनबा ही आ गया था। लेखक-लेखिकाएं बड़ी शान बघारते हुए इधर-उधर एक-दूसरे से बतिया रहे थे। “मेरी बहिन ने तो हमारे खानदान का नाम रोशन कर दिया।” कोई कह रहा था- “हमें तो अपनी दीदी पर बड़ा नाज है।” “अरे हमें तो पहले से ही पता था कि ये जरूर पुस्तकें लिखेगी।” बचपन से ही लिखना जो शुरू कर दिया था। और न जाने क्या-क्या।
लेकिन निशा मंच से जरा हटकर एक कौने में पड़ी कुरसी पर बैठी शून्य में ताक रही थी। काश! कोई तो होता जो उसकी इस उपलब्धि पर खुश होता। ज्यादा बड़े बोल न सही, जरा-सी तारीफ ही करता, उसे बधाई तो देता। पर सिवाय उसके वहाँ कोई न था जो उसकी खुशी में शामिल हो।
हाँ, कुछ आते-जाते लोगों ने सूची में उसका नाम देखकर औपचारिकता के तौर पर दो शब्द अवश्य कह दिए थे। पर यह क्या! इतने में भी उसकी आँखें छलक पड़ीं। आज तक जिंदगी में अवहेलना, तिरस्कार ही तो मिला था, सो आदत-सी हो गई थी। कोई उसके काले रंग को लेकर मजाक बनाए या बेइज्जती करे, उसके अच्छे से अच्छे किए गए काम को बेकार साबित करे, या उसे निकम्मा या नाकारा कहे, तो ये उसके लिए कुछ नया नहीं था। घर में माँ भी जब-तब कहती रहती- “ऐसी काली बाई कहाँ से आ गई। मेरी दूसरी वाली बेटी ममता और पहला बेटा मयंक तो इतने गोरे हैं कि हाथ भी लगाओ तो दाग पड़ जाता है। लेकिन पता नहीं कैसे तू अभागी हमारे गले पड़ गई।” यहां तक कि कोई मेहमान भी आ जाए तो उसे अपनी बेटी बताने में उन्हें शायद शरम महसूस होती थी।
“तुझ जैसी कालका से कौन शादी करेगा? उम्र भर हमारी छाती पर मूंग दलती रहेगी” माँ के तानों में अपनी गोरी बेटी ममता की मृत्यु का दर्द छलकता था और शायद इस बेटी के बचे रहने का अफसोस भी। बचपन से ही ये सब सुनते-सुनते लगा था कि जैसे उस गोरी वाली अपनी बहन की असामयिक मृत्यु की वही जिम्मेदार थी। अप्रत्यक्ष रूप से सब यही चाहते थे कि जिंदा उसे रहना चाहिए था और मरना निशा को था। लेकिन वह जिंदा बच गई तो इस अपराध की सजा भी तो उसे ही मिलनी चाहिए थी। बड़ा भाई रंग-रूप में गोरा चिट्टा माँ के रंग का होने पर उसको बड़ी नाजुकता से, लाड़-प्यार से पाला जा रहा था। उसे अपना बेटा कहते समय माँ के चेहरे पर जो गर्व के भाव उभर आते थे, वो उनके गोरी रंगत की चमक को और भी बढ़ा देते थे। अपनी ही औलाद में गोरे और काले होने पर इतना रंग-भेद और अत्याचार शायद ही कोई माँ करती होगी।
बात केवल कहने तक ही सीमित नहीं थी। खाने-पीने, कपड़े खरीदने, दीवाली या होली अथवा कोई भी त्योहार मनाने, मित्रों के साथ घूमने-फिरने, खेलने जाने, ऊँची पढ़ाई करने आदि हर तरह की सुख-सुविधा पर उन्हीं का हक होता है, जो गोरे और सुंदर बच्चे होते हैं। बार-बार उसके रंग-रूप को कोस-कोस कर ये एक बात उसके जेहन में जानबूझ कर बैठा दी गयी थी। क्योंकि उन बच्चों ने गोरे रंग का पैदा होकर अपने वंश और परिवार का नाम जो रोशन किया होता है। उस भाई की उतरन निशा को पहनने को मिल जाती थी, वो भी क्या कम मेहरबानी थी। वैसे उसका नाम भी काली होने के कारण ‘राक्षसी’ या ‘डायन’ न रख कर “निशा” रख दिया गया था, इसका भी उसे शुक्रगुजार होना चाहिए था।
उसे याद है जब उसने भाई की साइकिल चलाने की जिद की थी, तब भाई ने न जाने कितना बढ़ा-चढा कर शिकायत कर दी कि मेरी साइकिल तोड़ दी है, तब माँ ने पिताजी से शिकायत कर दी और पिताजी न जाने किस बात पर पहले से ही झुंझलाए बैठे थे कि उसे एक हाथ से उठाया और छत से नीचे फेंकने लगे कि तभी पास की मोयनी मासी आ गई और यह कहते हुए रोक दिया कि “ये क्या कर रहे हैं भाई साहब। बच्ची के हाथ-पैर टूट गए तो आगे परेशानी होगी”
इस रंगभेद का नतीजा यह हआ कि निशा ने अपना सारा ध्यान किताबों में लगा दिया। घर में वैसे भी उसकी स्थिति एक नौकरानी से कम नहीं थी। कोई बरतन ठीक से नहीं धुल पाया तो उसकी धुनाई होती थी।
मयंक तो भाई कम, दुश्मन ज्यादा हो गया था। कहीं किसी भी काम को करने में बरतन, कपड़े साफ करना, खाने में नमक या मिर्ची ज्यादा हो या न हो उसे निशा की शिकायत कर के उसे मार या डाँट पड़वाने में बड़ा ही आनन्द आता था। माँ सिर्फ कपड़े धोने वाले डंडे से पिटाई ही नहीं करती, साथ-साथ जली-कटी भी सुनाती जाती कि “कल्लो ने रंग रूप तो पाया नहीं, कालका न जाने किसके घर जाएगी, वहाँ भी हमारी नाक कटाएगी कि माँ ने कुछ सिखाया नहीं। तू तो पैदा ही हमारी बेइज्जती कराने को हुई है”
पैदा होने का किस्सा भी कम नहीं है। जब उसका जन्म हुआ तभी एक पड़ोस की जगत मासी ने अपना निर्णय सुना दिया कि “लड़की हुई है और वो भी सांवले रंग की। तुरंत इसे उठा कर खाई पर फेंक आ” माँ ने तभी से उस नवजात बच्ची को अपना दूध पिलाना बन्द कर दिया। भूख के मारे बिलख-बिलख कर रोती हुई नन्हीं-सी बच्ची को जब उसकी नानी नीलाबाई ने देखा तो हैरान हो गई। बच्ची रो रही है उसे भूख लगी होगी दूध पिला दे। तब तक मैं बच्ची के गीले कपड़े धूप में डालकर आती हूँ। वापिस लौटने पर नानी ने देखा कि बच्ची अब भी वहीं पड़ी हुई जार-जार रोए जा रही है। पर ये कैसी जन्म देने वाली माँ है, जो आराम से दूर बैठी रेडियो पर तेज आवाज में बिनाका गीत माला के गाने सुने जा रही है। या शायद बच्ची के रोने की आवाज को ही नजरअन्दाज करने के लिए रेडियो का वोल्यूम इतना तेज कर रखा है। इस बार बच्ची की नानी से भूख से बिलखती बच्ची का यूँ रोना देखा न गया और उसने जरा नाराज होते हुए कहा- “कैसी माँ है तू? आँखों के सामने बच्ची रोए जा रही है और तू है कि रेडियो सुन रही है। बच्ची के और काम तो मैं या दाई आकर कर जाती है। पर दूध तो तुझे ही पिलाना पड़ेगा न। जरा बच्ची का ख्याल कर भूख के मारे दम निकल जाएगा इस नन्हीं-सी जान का” अपनी माँ को उस बिना रंग-रूप की बच्ची के लिए स्वयं पर नाराज होते हुए देख कर भगवती चीख पड़ी- “मरती है तो मर जाए। किसे जरूरत है इसकी।
मैं क्या करूँ इस काली बाई का। मेहतरानी को दे दो या फिर जैसा लाभू मासी कह गई है, इसे खाई में फेंक आओ। मुझे नहीं चाहिए ये कालका” ये कह कर भगवती ने चादर से मुँह ढंक लिया और सोने का उपक्रम करने लगी।
उसकी माँ नीलाबाई को अब समझ में आ गया कि ये सब उस लाभू का किया धरा है। जब जो कुछ मन में आता है कह जाती है। इसी से भगवती का मूड उखड़ा-उखड़ा-सा है। बच्ची को देखने अभी जरा देर पहले वही आई थी और बच्ची की साँवली रंगत देख न जाने क्या-क्या बक गई होगी। तो ये है इस निशा के जन्म का किस्सा। जिसकी भड़ास माँ ताउम्र उस पर निकालती रही है।
सांवली रंगत का यही अपराधबोध निशा पर आजन्म हावी रहा। यद्यपि वह किसी भी काम में कम नहीं थी। स्कल में तीसरी कक्षा में वह किताब इतनी गति और सफाई से बिना त्रुटि किए पढ़ लेती थी कि ग्यारहवीं कक्षा की लड़कियाँ अपनी किताबें लाकर रिसेस के समय उसे “पढ़ कर दिखा” कहती थीं। केवल पढ़ाई में ही नहीं, घर के हर एक काम में निशा इतनी दक्ष थी कि पास-पड़ोस वाले उसका उदाहरण अपने बच्चों को दिया करते थे। उसका पढ़ने में इतना उत्साह देखकर माँ ने तो स्पष्ट कह रखा था कि सुबह खाना बनाकर, घर की सफाई करके, कपड़े धोने के बाद अगर चाहे तो स्कूल जा सकती है। भाई मयंक मजे से सोता रहता लेकिन उसे स्कूल समय पर जाना है और घर का सारा काम नहीं हुआ तो स्कूल की छुट्टी। इसी डर से जल्दी उठना पड़ता।
बोझ तो वह पहले से ही थी, गाँव में आठवीं कक्षा तक आते-आते आस-पास और स्कूल की लगभग सभी लड़कियों की सगाई तय हो गई थी। माँ को फिर एक बहाना मिल गया निशा को कोसने का। नवीं में उसकी शादी का फैसला हो गया, पर पिता को न जाने क्या सूझी। उससे पूछ लिया कि “आगे पढ़ना है या माँ के तय किए रिश्ते में शादी करनी है?” निशा ने आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर कर दी। पिता ने घर में ये बात बताई तो माँ ने फिर से बवाल मचा दिया।
उस समय के लिए तो यह बात टल गई। किन्तु माँ के सिर पर उसकी शादी का बोझ कई गुना बढ़ गया। उन्हें ये लगने लगा कि न जाने अब इसकी शादी कभी हो भी पाएगी या नहीं। गोया, दुनिया में लड़कों का अकाल ही आ गया और जो भी था वही एक लड़का था, जिसे बाप ने अपनी मूर्खता से हाथ से जाने दिया।
अब आगे पढ़ने की बात पर भी माँ ने तो अपनी शर्ते बाँध ही रखी थीं। अभी कल ही नवीं कक्षा का रिजल्ट आया और मयंक फेल हो गया। निशा स्कूल में प्रथम आने का प्रमाण-पत्र लेकर जैसे ही घर पहुँची, माँ तो भरी बैठी ही थी। आते ही उसके हाथ से प्रमाण पत्र छीन कर दो टुकड़े कर जलते हुए स्टोव पर फेंक दिए। सारा गुस्सा उस पर निकालते हुए बोली- “क्या निहाल कर देगी पढ़-लिख कर? जिसे पास होना था, वह तो हुआ नहीं। ये महारानी पहले नम्बर पर आ गई है। जब देखो इसके हाथ से किताब तो छूटती ही नहीं है। आग लगे इन किताबों को” निशा की आँखों में आँसू आ गए। कहाँ तो स्कूल की प्रार्थना सभा में प्राचार्या उसकी इतनी तारीफ कर रही थीं और यहां उसे प्रथम आने के एवज में डाँट पड रही है।
माँ के इस व्यवहार से भाई और बहन के रिश्ते में भी दरार बढ़ती जा रही थी। भाई मयंक भी उसके अच्छे नंबरों से पास हो जाने को अपनी बेइज्जती समझने लगा था। मयंक उससे दो कक्षा आगे था और एक बार फेल होकर उससे एक कक्षा का ही अन्तर रह गया था।
एक दिन की बात है, रात के खाने और बरतन का सारा काम जल्दी-जल्दी निपटाकर निशा परीक्षा के लिए बस अभी ही पढ़ने बैठी थी कि अचानक भाई ने चिल्लाना शुरू कर दिया- “बत्ती जली हुई है मुझे नींद नहीं आती। जल्दी से बत्ती बंद कर। आधी रात गये पढ़ना क्या जरूरी है। परीक्षा में ज्यादा नम्बरों से पास होकर जानबझ कर मझे पिटवाना चाहती है। अब देख, मैं बताता हूँ तू कैसे पास होती है?” कह कर उसने सीढ़ियों के पास बिजली के मीटर से फ्यूज ही निकाल कर छिपा दिया। निशा विवश होकर रोने लगी। मयंक ताली बजाता हुआ सोने चला गया।
उस दिन जब बहुत गर्मी थी और वह स्कूल से अभी-अभी आकर खाना खाने लगी थी। उसे हमेशा रोटी के साथ में सूखी सब्जी हो तो दही या छाछ की जरूरत होती है अन्यथा निगलने में परेशानी होती है। उसने रसोई से दही कटोरी में डाली और खाना शुरू किया ही था कि मयंक आ गया। माँ ने खाना परोसा और दही कम होने पर खाना छोड़कर चल दिया। माँ ने निशा की कटोरी में दही देखी तो बिफर पड़ी। पास ही एक पाइप रखा हुआ था, आव देखा न ताव निशा पर बरसाना शुरू कर दिया। कहने लगी “न जाने कौन-से पाप किए थे कि ऐसी भुक्खड़ पल्ले पड़ गई। भाई के लिए रखा हआ दही खाते जरा भी शर्म नहीं आती तझे। दही-दुध खा कर तू गोरी तो होने से रही”
“अचानक उसकी तंद्रा भंग हुई, साहित्यिक मंच पर उसकी पुस्तक का नाम पुकारा जाता है “लम्बी रात्रि का अंत” मुख्य अतिथि के रूप में राज्यपाल उपस्थित थे। उन्हीं के हाथों आज उसकी पुस्तक का विमोचन हो रहा है, मगर अपनी इस सफलता में भी उसके लिए कोई प्रसन्न होने वाला नहीं है। वह एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर ओढकर मंच की ओर बढ़ गयी।”
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
