भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
ऐ सोफिया! बता, तुझे मामू ने कित्ते पैसे दिए ? प्रतिज्ञा ने एक हाथ से सोफिया का हाथ पकड़ रखा था, और दूसरे हाथ से रघु को ईशारा करके बुला रही थी। सोफिया हाथ छुड़ा कर भागी और गंदा नाला फलांगती हुई मानक सेठ की दुकान जा पहुँची। मुट्ठी खोलकर देखा- “अठन्नीऽऽ” जोरों से चिल्ला पड़ी।
पिछले कई वर्षों से सोफिया, प्रतिज्ञा और रघु में खूब दोस्ती थी। तीनों एक साथ खेलते, पढ़ते, झड़ते और घूमते रहते थे। पूरे मोहल्ले को अपनी फ्री सेवाएँ देना इनका प्रमुख धर्म था। दुकान से सामान लाना, बगीचे से धनिया-नींबू तोड़ लाना, संदेश पहुंचाना और न जाने क्या-क्या। बड़ों से कुछ ईनामी चवन्नी, एकन्नी भी मिल जाती थी। ईनामी की खुशी ऐसी कि छुपाये न छुपे। चेहरे पर खुशी की चमक और जेब से ईनामी की खनक छलक आती थी। सच उगलते हुए तीनों तीर की तरह मानक सेठ की दुकान पहुँच जाते।
समय नहीं रूका। तीनों साथी कक्षा पाँच अच्छे नंबरों से पास हो गए। अब इन मध्यम वर्गीय परिवारों में इनकी बेहतर शिक्षा के लिए किसी अच्छे व सस्ते स्कूल की तलाश की चिंता थी। अच्छे व सस्ते स्कूल घर के पास नहीं थे। प्रायवेट स्कूल्स की तगड़ी फीस संभव को असंभव में बदल सकती थी। तीनों परिवारों में काफी चिंतन-मनन व विमर्श के बाद ‘बाला जी’ स्कूल सर्वमान्य ठीक-ठाक समाधान घोषित हुआ। पढ़ाई भी ठीक-ठाक और तीनों का आना-जाना भी एक साथ संभव था। छठवीं से नवमी तक कब हँसते-खीझते दिन निकले-ये, पता ही नहीं चला। और अब, कक्षा दसवीं माने ‘बोर्ड परीक्षा’। ‘बोर्ड परीक्षा’ शब्द अपने आप ही में भारी था। परीक्षा के पहले प्रतिज्ञा काफी परेशान सी थी। उसकी आवाज़ भी थोड़ी भारी-भारी सी होने लगी थी। कुछ तो वह भी असामान्य रहने लगी और खुद पर आश्चर्य भी करती थी। साथी उसे परेशान भी करते और उल्टे-सीधे व्यंग्य भी। वह स्वयं भी बडी चिंतित नजर आती-कहती-‘मेरे गले में कोई बीमारी तो नहीं है न? मेरी आवाज़ कुछ अजीब सी क्यों हो रही है?’ फिर वह मित्रों से दूर-दूर रहने लगी। अन्य मित्रे से भी बातचीत कम और फिर लगभग बंद ही कर दिया उसने। एक दिन टीचर ने उसे डॉक्टर से सलाह लेने को कहा। प्रतिज्ञा डॉक्टर से मिली। जांच के बाद उसका चेहरा सूख कर पीला होने लगा। हँसना, शरारत करना, मुँह फुलाना, नखरे करना, सब भूल गई जैसे। एक दिन उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए सोफिया ने पूछ ही लिया-क्या हुआ? इतनी अनमनी सी क्यों हो?’ उसने अपना हाथ इस तरह छुड़ाया, मानों हाथों में कोई रहस्य हो, या तिलस्म हो। मजाक के मूड मे सोफिया ने कहा – ‘कहीं कोई मिल तो नहीं गया?’ प्रतिज्ञा एक झटके में दूर छिटक गई। इस व्यवहार से सोफिया अवाक् रह गई। प्रतिज्ञा भी रूसी हो उठी। बोली-‘पता नहीं यार, थोड़ा अजीब-अजीब सा लगता है और डर भी।’ सच ये था कि प्रतिज्ञा की आंखों में एक घनीभूत पीड़ा उमड़ आई थी। बात सोफिया के पल्ले नहीं पड़ी।
मार्च-अप्रैल का महीना माने परीक्षा का मौसम। विद्यार्थियों के चेहरों पर थोड़ी गंभीरता दिखाई देने लगीं। फ्री पीरियड्स में भी हाथों में पुस्तक-कापियाँ दिखाई देने लगीं। लड़कों ने लड़कियों पर व्यंग्य करना शुरू कर दिया। ‘अरे ये तो इस साल मेरिट मे आएगी। मेरे हिस्से का भी थोड़ा पढ़ लेना, सेकंड पोजिशन नहीं होना चाहिए।’ कोई कहता-‘अरे मेरे से पार्टी ले लेना, ग्रैंड पार्टी। लेकिन परीक्षा के दिन आंसर शेयर कर देना प्लीज’…… वगैरह …..वगैरह। इन दिनों प्रतिज्ञा प्रायः सभी लोगों से दूर-दूर और एकांत में रहने लगी थी। साथी आश्चर्य में थे। कई बार तो शिक्षकों के चेहरे पर भी प्रश्न चिह्न उभरने लगते थे।
एक दिन नसरीन ने प्रतिज्ञा का हाथ पकड़ लिया। पूछने लगी ‘क्या पढ़ रही है रे जीनियस वन? बातचीत सब बंद?’ प्रतिज्ञा ने हाथ छुड़ाया तो नसरीन चिल्लायी ‘हाय अल्लाह इसका हाथ तो देखो, फौलादी है, फौलादी। कौन भला रोक सकता है इसको?’ ‘मैं रोकगीं-’ मौसमी आगे बढ़कर बोलीकैसे ये परीक्षा का भूत है या तू ही आग का गोला हो गई है? नसरीन बोली- “वैसे तो हम लड़के भी नहीं है, जो तू हमसे भागी-भागी फिर रही है।” पता नहीं क्या हुआ प्रतिज्ञा को। वह वहीं सिर पकड़ कर बैठ गई। सारे साथी उसके इस व्यवहार से हैरान थे।
दूसरे दिन प्रतिज्ञा नहीं आई, तीसरे दिन भी नहीं। और……… और फिर कभी नहीं। परीक्षा को दो दिन शेष थे। सभी उसके बारे में जानना चाहते थे, पर सभी व्यस्त थे। प्राचार्य या शिक्षक से पूछने की हिम्मत किसी में नहीं थी। रघु से नहीं रहा गया, तो वह उसके घर चला गया। प्रतिज्ञा के पापा ने कहा-वह बाहर गई है, कल तक आ जाएगी। दूसरे दिन प्रतिज्ञा की माँ ने कहा-उसकी तबियत ठीक नहीं है। शायद परीक्षा नहीं देगी। इन दो अलग-अलग उत्तरों से रघु और अन्य साथी भी हैरान थे। लेकिन प्रतिज्ञा किसी से भी नहीं मिली।
सभी संगी-साथी दिखाई देते किंतु प्रतिज्ञा नज़र नहीं आती थी। प्रतिज्ञा सबकी प्रतीक्षा बनकर रह गई। नया सत्र शुरू हुआ, तो सबकुछ सामान्य होने पर भी प्रतिज्ञा की गैरमौजूदगी को सभी साथियों के और विशेषकर रघु के चेहरे पर तलाशा जा सकता था।
चार वर्ष बाद सभी साथी बिखर गए। केवल कुछ ही एक-दूसरे के संपर्क में थे। एक बार रघु मिला तो सोफिया ने प्रतिज्ञा के बारे में पूछ लिया। रघु बोला- ‘हाँ एक पत्र आया था। मजे मे है’ यह बताते हुए वह बेहद प्रसन्न नजर आ रहा था। सोफिया ने भी उसे फिर छेड़ा-‘मतलब सब सेटमेट है?’ रघु सकपकाया सा बोला-‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं।’ सोफिया ने फिर पूछा- ‘प्रतिज्ञा की तरफ से कंफर्म तो है न?’ रघु हँसकर बोला-‘पहले एम.बी.ए. कर लूँ, जॉब ढूँढ लूँ, फिर बताऊंगा।’ सोफिया को राहत मिली कि प्रतिज्ञा ठीक है। उनकी दोस्ती को कभी उसने इतनी गम्भीरता से नहीं लिया था। इस बात का सुखद आश्चर्य भी उसे हुआ।
समय सरपट भागता रहा। जो पीछे था, छूटता चला गया। सोफिया भी जमशेदपुर में रहने लगी। उसकी अपनी गृहस्थी थी। एक आध्यात्मिक प्रवचन के दौरान उसकी भेंट एक श्वेत वस्त्रधारी विद्वान पुरुष से हुई, वह रघु जैसा ही था। सोयिा को लगा कि ये तो साफ-साफ रघु ही है। आखिर ये यहां क्या कर रहा है। उससे रहा नहीं गया-उसने अनायास पूछ ही लिया “कैसे हो रघु?” रघु ने कोई जवाब नहीं दिया। सोफिया अपमान से तिल मिला उठी। जी में आया- झिंझोड़कर पूछ ले- रघु ये सब क्या नाटक है? और……. और…प्रतिज्ञा कहाँ है? पर ऐसा नहीं हुआ, उसने मन ही मन रघु को कोसा-‘मूर्ख! भगोड़ा! सच्चाई से भागता है।’
उस दिन सोफिया कोलकाता से लौट रही थी। सामने बर्थ पर दो लोग बैठे थे। देखने से ही दोनों “ट्रांसजेंडर” लग रहे थे। तभी उस बोगी में ऐसे कई ऊँचे-पूरे लड़के-लड़कियाँ नज़र आये। सभी स्मार्ट और एजुकेटेड लग रहे थे। सभी आपस में हिंदी व अग्रेजी में बातें कर रहे थे। तभी दो लोग और आ गए। एक सामने बर्थ पर और एक सोफिया की बर्थ पर बैठ गया। सोफिया ने खुद को असहज महसूस किया। सामने बैठी लड़की ने मुस्कुराकर सोफिया को नमस्ते किया। वह बड़ी सहजता से सोफिया से बातें करने लगी। सोफिया ने भी कुछ हल्का महसूस किया। तभी एक दो लोग कुछ अनर्गल हाव-भाव से बातें करने लगे। सामने बैठी लड़की ने उन्हें डांटा, और शांति से अपनी सीट पर बैठने को कहा। वे चुपचाप अपनी-अपनी जगह चले गए। थोड़ी देर बाद सोफिया ने ही चुप्पी तोड़ी और पूछा-“तुम इतने सारे लोग कहाँ जा रहे हो?” उस लड़की ने सोफिया से कहा-मेरा नाम मीरा है और ये मेरा साथी है -“ समीर”। हम लोग एक महासम्मेलन से लौट रहे हैं। अखबार पढ़ते हुए समीर ने चेहरे के सामने से अखबार हटाकर सोफिया को नमस्ते किया और पुनः अखबार पढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद सोफिया ने फिर कहा-“मैंने समझा था किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी का फंक्शन है।” मीरा जरा हंसी, फिर बोली-लगभग सभी लोग पढ़े-लिखे ही हैं। मैंने और समीर ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम.ए. किया है। सोफिया चौंक कर बोली-‘अच्छा! चलो, बहुत अच्छी बात है। लोगों की पूर्व धारणा खत्म होगी। वैसे मेरे भीतर भी आप लोगों के प्रति कुछ पूर्वाग्रह तो थे ही किंतु अब’………सोफिया ने मुस्कुरा दिया। मीरा पुनः बोली- लेकिन कुछ तो ऐसे भी हैं, जो पुरानी परंपराओं से जुड़े हुए हैं। हम उन सभी को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ना चाहते हैं। उन्हें सहज बनाना चाहते हैं। सोफिया ने कहा-‘चुनौतीपूर्ण काम है।’ मीरा मुस्कुराते हुए बोली-“हाँ, मगर चुनौतियों को स्वीकारने और संघर्ष करने में ही आनंद है।” बातें होती रहीं और दिन ढल गया। आसमान से तारे टेन की खिडकी से अंदर झांकने लगे। सोफिया ने बात खत्म करने के अदांज से कहा-तुमसे मिलकर अच्छा लगा मीरा, मेरी असहजता दूर हो गई। उसने अपना विजिटिंग कार्ड मीरा को दिया, और बोली आगे भी आपसे बातें हो सकती हैं। सोफिया ने फिर मुस्कुराते हुए कहा-‘हम भी चाहते हैं, समाज में सबको सम्मानपूर्वक जीने का अधि कार मिले।’ सोफिया अब सोने की तैयारी में थी। समीर ने मीरा से कहा-मैं आगे जा रहा हूँ, थोड़ी देर से सोऊँगा। उसने अखबार मोड़ कर रख दिया। सोफिया ने उसकी ओर देखा तो जी धक् से रह गया- ‘इसका चेहरा तो प्रतिज्ञा से मिलता-जुलता लग रहा है। सोफिया को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। खुद को समझाया-‘ऐसा नहीं हो सकता’-फिर आंखें मंद लीं। अजीब होती हैं ये आँखें, बंद होने पर भी देखती रहती हैं। उसके सामने आज अतीत, तेज धार नदी की तरह, तेज गति से गुज़रने लगा। हड़बड़ाहट में वह उठ बैठी। उसका उद्देश्य समीर को पहचानना ही था। वे लोग दूसरी और गप्पें मार रहे थे। सोफिया बाथरूम गई, लौटी और रूककर समीर को देखने लगी, रहा नहीं गया तो आवाज़ दे दिया-“समीर’। फिर खुद से घबराकर सोफिया बर्थ पर आ गई। उसे लगा कि बहुत बड़ी गलती हो गई। क्या कहेगी समीर से ……..? और अगर वह समीर, प्रतिज्ञा न हुआ तो? अगर वह समीर, सिर्फ समीर ही हुआ तो? क्या सोचेगा? और फिर उस दिन आध्यात्मिक प्रवचन में मिला पुरुष उसे याद आया। मैंने तो उसे रघु ही समझ लिया था। नहीं, नहीं, वह तो रघु ही था। तो क्या प्रतिज्ञा की अनुपस्थिति ने रघु को एकान्त जीवन जीने के लिये विवश कर दिया था? सोफिया को खुद पर गुस्सा आ रहा था। विचारों की आंधी ने स्मृतियों की घटाओं से उसे घेर लिया था। रह-रह कर नये विचार कौंधाने लगे और निष्कर्ष की एक विचित्र आकृति उसके सामने उभरने लगी। तो क्या, प्रतिज्ञा की कमी ने रघु को एकान्त जीवन की ओर मोड़ दिया और उसकी चुप्पी………?
कुछ ही पलों में समीर उसके सामने खड़ा था। घबराकर सोफिया ने मुड़ा हुआ अखबार उसके हाथों में दे दिया। समीर वहीं खड़ा रहा और अपलक उसे देखता रहा। सोफिया पसीना पोंछने लगी। पल भर बाद बोला-शायद तुमने मुझे पहचान लिया। क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? सोफिया घबराहट में खिसक गई। समीर ने बोलना शुरू किया-मुझे सच बताना मना है। पिछला जीवन मेरी खुशियों का ताबूत बनकर हृदय में धंसा जा रहा है। तुम्हारा मिलना मेरे लिए भी सुखद है। जैसे बरसों अंगारों पर चलने के बाद, आज ठंडी छाँव मिली है। हमारी जिंदगी ही ऐसी है कि हम अपना पिछला नाम व जीवन पूरी तरह भुला देते हैं, या भुलाने की कोशिश करते हैं। उसकी आवाज़ दर्द से थरथराने लगी। फिर धीरे से बोला-हाँ सोफिया, मैं प्रतिज्ञा ही हूँ। मेरी ओर एक बार’, सिर्फ एक बार सोफिया, वही पहले वाले प्यार और अपनेपन की नजर से देखो। बहुत दर्द है दिल में। हम सबकी एक ही कहानी है पर बिना “ऊ’ किए पी लिया है-हमने सारा दर्द। सोफिया, दनिया और सारे मजहब कहते हैं-गलत काम करो तो ईश्वर सजा देता है। पर यहाँ तो गलती ईश्वर से हुई है। हम ही उसकी गलती का परिणाम हैं और सज़ा भी हम ही भुगत रहे हैं। सोफिया ने देखा उसकी आँखे दर्द और वितृष्णा से भरी हुई थीं। उसने एक लंबी निःश्वास के साथ चुप्पी साध ली।
यह सब इस तरह पलक झपकते हुआ कि सोफिया अवाक् उसकी ओर देखने लगी। जी में आया कि उसे बाहों में भर ले और ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ मार कर रो ले। वह अपने कलेजे को सम्हालती हुई सिर्फ इतना ही कह पाई “कहो समीर, आज सब कुछ सच सच कहो।” समीर ने धीमी आवाज में कहना शुरू किया-परीक्षा तो दसवीं की मैंने भी दी, लेकिन प्रायवेट ही दिया, क्योंकि जो कुछ मेरे साथ हुआ उससे घबराकर मैंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया था। फिर माँ मेरी तबियत के कारण कई डॉक्टरों से मिली। कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। वे बड़ी त्रासदी और अपमान के दिन थे….. तुम्हें कैसे सुनाऊँ? तय हो चुका था कि मैं ट्रांसजेंडर हूँ। मुझसे अधिक पापा परेशान थे, जो न किसी से कह पा रहे थे, और न चुप रह पा रहे थे। माँ को तो मानो मानसिक पक्षाघात जैसा हो गया था। अर्ध विक्षिप्त-सी रहने लगी। पर मैं? मेरा अपराध? मैं याने प्रतिज्ञा निर्दोष थी, पर हर क्षण से डरने लगी। न मालूम अगले क्षणों में क्या होगा?
एक दिन परेशान पापा ने मुझे ग्वालियर वाले चाचा को सौंप दिया। माँ मुझे छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थीं। मुझे सीने से लगाकर तड़प-तड़प कर रोती रहीं। माँ बुदबुदाती रही-मेरे किस पाप-कर्म की सजा मेरे बच्चे को मिली? हे भगवान! समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? मैं पापा से लिपट कर रोता रहा……….यह सब क्यों पापा? प्लीज ऐसा मत कीजिए। मुझे अपने साथ ले चलिए पापा। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा। पापा मुझे साथ ले चलिए, पर पापा मानो पत्थर के हो गए थे।
पापा ने मुझे अलग करते हुए कहा था-तुम्हारा भविष्य अब हमारे साथ नहीं बन सकता। जो चाचा कहें, बस वही करना होगा। तुम्हारे लिए हम बेहतर ही करेंगे। मैं किसी से क्या कहता? मेरी क्या इच्छा है, यह जानने समझने की किसी ने कोई कोशिश ही नहीं की। न मझे कछ स्पष्ट बताया गया, न समझाया गया। मेरा दोष क्या है? गलती क्या है? मेरे साथ क्या होगा, यह भी नहीं। मैं माँ से लिपट गया था, तो चाची और पिताजी ने मुझे एक झटके से अलग कर दिया, और वे चले गए। मैंने बहुत दर्द अनुभव किया और ऐसा लगा जैसे मैं परिवार का सबसे विकृत और भयावह हिस्सा हूँ। मुझे सबको छोड़ना ही होगा।
दुनिया का कोई व्यक्ति शायद ही समझ पाये, चाचा जी के घर एक सप्ताह मैंने कैसे गुजारे। अपने आप से घबराहट होती थी, घृणा भी होती थी। जी चाहता था कि चीख-चीख कर रो पडूं कि मैं प्रतिज्ञा हूँ और कुछ नहीं। मुझे मेरे घर वापस भेज दो। मेरा अपराध क्या है? लगता था दु:ख से हृदय फट जाएगा कि मैं “एबनॉर्मल” क्यों हूँ? ईश्वर, परिवार और समाज………..किसी ने मेरे भीतर दर्द का सैलाब नहीं देखा? धीरे-धीरे मैं नकारात्मक विचारों से घिरने लगा। कुदरत की गलती, और सजा मुझे? मैंने दो बार पिताजी को भी छुप-छुप कर रोते देखा था, पर किसी ने मेरा दर्द क्यों नहीं समझा? मुझमें उसी दिन से किसी के सामने आने-जाने की हिम्मत खत्म हो गई। मैं अपने आपको अजूबा समझने लगा। सबसे दूर भाग जाने की इच्छा प्रबल हो चुकी थी।
सोफिया की आँखों से आँसू टपकने लगे। उसने धीरे से समीर के कंधो पर हाथ रखा और बोली- मैं, तुम्हारा दर्द समझ रही हूँ, पर…….?
समीर जरा मुस्कुराया, फिर बोला- हाँ सोफिया मैं खुद से और दूसरों से भी परेशान था। मेरे भीतर बहुत दुःख था, क्रोध, नफरत, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, पागलपन और उदंडता-और इन सबको झेलने का असहाय दर्द भी। बहुत कुछ कर डालने की इच्छा और कुछ भी न कर पाने की विवशता भी थी। मैं क्या बताऊँ, उन दिनों मेरे भीतर क्या चल रहा था? तुमसे और रघु से बिछड़ना, अपने टुकड़े-टुकड़े कर डालने जैसा था। समीर पल भर चुप रहा। सोफिया धीरे से बोली-अब कहाँ हो समीर?
समीर ने कहा-कुछ दिनों बाद चाचा जी ने मुझे ट्रांसजेंडर्स के एक ग्रुप को सौंप दिया और मैं दिल्ली पहुँच गया। वहाँ मुझे ग्रुप लीडर के रूप में मिली-“मीरा”। बेहद समझदार। पहले मैं बहुत असहज था। इन लोगों के साथ खाना, पीना, सोना कुछ भी नहीं कर पा रहा था। मीरा के व्यवहार ने मुझे धीरे-धीरे सामान्य बना दिया। एक दिन मैंने मीरा से सब कुछ कह दिया। तुम्हारे और रघु के बारे में भी। मीरा ने ही धीरे-धीरे समझाया कि पिछला जीवन भूल जाओं और रघु को तो खासकर भूल जाओ। मन-पढ़ने-लिखने में लगाओ। हम सब ही बस एक-दूसरे के रिश्तेदार हैं।
लंबा समय बीत गया। अब तक समझता था, धीरे-धीरे सब भूल जाऊँगाा। आज तुमसे मिलकर मालूम हुआ, कि वो प्यार, वो दोस्ती सब बरकरार है। क्या तुम मुझे ‘प्रतिज्ञा’ नहीं समझ सकती? सोफिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और बोली ‘तुम सिर्फ तुम हो-हम दोस्त हैं और रहेंगे।’ समीर का चेहरा एक बार फिर मुरझा गया। उसने पूछा फिर-और वो रघु कैसा है? सोफिया मुस्कुराई और बोली-‘शायद तुम्हें भूल नहीं पाया। अकेला रहता है, एक बार मिला था तो कह रहा था कि तुम्हारा पत्र मिला है।’
समीर बोला-हाँ, मैंने यानी प्रतिज्ञा ने उसे एक-एक कर तीन पत्र लिखे। किसी भी पत्र में उसे नाम-पता नहीं दिया। पोस्ट भी कहीं दूसरी जगह से किया था। मीरा के समझाने पर मैंने खुद को बदला। तुममें से भी कभी किसी ने शायद मुझे ढूँढने की कोशिश नहीं की। मेरी आँखे हर दिन, हर दिन किसी अपने को ढूँढती रही, पर सदा ही निष्फल रहीं। मैं एक अनजान और गुमनाम दुनिया में रहने लगा…….शायद।
भुवनेश्वर स्टेशन आते ही समीर, मीरा और उनके सारे साथी उतरने लगे। सोफिया के दिमाग में बिजली कौंधी। जी चाहा उसे हाथ पकड़कर रोके, पर ऐसा नहीं कर पायी। उसकी पीठ थपथपाकर बोली-यदि अपना फोन नंबर दे दो तो? समीर ने अपना विजिटिंग कार्ड दे दिया। उसमें उसका ई-मेल एड्रेस भी था।
सोफिया को अपने शहर लौटे लगभग छः माह हो चुके थे। उसने रघु का पता बमुश्किल ढूंढा। एक रविवार हिम्मत करके उससे मिलने चली ही गई। मन आशंकाओं से घिरा हुआ था। क्या प्रतिज्ञा के बारे में उससे बातें करना उचित होगा? उसने चौकीदार से रघु का पता पूछा तो चौकीदार ने सोफिया से चिट पर नाम लिख कर देने कहा। थोड़ी ही देर में सोफिया को रघु ने बुलवा लिया। सोफिया ने गंभीरतापूर्वक कहा-बात कहाँ से शुरू करूँ? रघु ने बेमन से पूछा-क्या कहना है? सोफिया बरबस बोल पड़ी-प्रतिज्ञा के बारे में क्या जानते हो? रघु ने तपाक से कहा-मैं अब किसी प्रतिज्ञा को नहीं जानता। सोफिया ने कहा-झूठ बोलने की प्रेक्टिस की है क्या इन दिनों? सच ये है कि प्रतिज्ञा हमारी दोस्ती का अभिन्न हिस्सा है। तुम्हें उसे जानना होगा क्योंकि जिन्दगी का तकाजा है-हम किसी व्यक्ति को अकारण -लत या स्वार्थी सिद्ध नहीं कर सकते। सिर्फ और सिर्फ इसीलिए, मैं तुमसे मिलने आई हूँ यहां तक।
क्या कहना चाहती हो, रघु ने निर्विकार भाव से पूछा। फिर खुद ही बोला-जिन्दगी ने बेकाई की हद कर दी। लोगों ने प्रेम को मज़ाक और तमाशा बना लिया। सोफिया ने तपाक से कहा-बस यही मैं कहने आई हूँ। जिन्दगी की बेकाई को व्यक्ति की बेकाई मत समझो। हम अंधेरे में सच के नाम पर भटक रहे हैं। तीनों के बीच में जो काल्पनिक सच है, उसे दूर करो। हम तीनों अच्छे मित्र हैं। एक-दूसरे के प्रति इतने अनुत्तरदायी कैसे हो सकते हैं? सोफिया ने संक्षेप में उसे पूरी कहानी सुना दी। रघु के चेहरे पर जैसे घने बादल घिर आये थे। आँखों से बरसना भी चाहते थे, पर तपिश इतनी अधिक थी कि चारों ओर सूखा था, भयानक सूखा। सोफिया ने प्रतिज्ञा (समीर) का विजिटिंग कार्ड रघु के हाथों में रख कर कहा, सबकुछ तुम्हारे हाथ में है’, मेरी कोशिश खत्म हुई।
वह छब्बीस जून की शाम थी। पहली बार रघु, सोफिया से मिलने आया था। रघु के साथ समीर (प्रतिज्ञा) भी था। यह एक अद्भुत समय था सच होते हुये भी चमत्कार की तरह। पिछले दो-चार दिनों से हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। वे साथ-साथ बैठकर बगीचे में चाय पी रहे थे और चहक रहे थे। कॉलोनी के सामने फैले सूखे मैदान में थोड़ी-थोड़ी हरियाली फैलने लगी थी। विश्वास है कि जल्द ही वह लहलहा उठेगी और शायद कोई नयी कहानी दौड़ती हुई बाहें फैलाये फिर चली आएगी।
वे तीनों हरी और कोमल दूब पर खड़े थे और एक ठंडक तीनों के भीतर समा रही थी।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
