Hindi Best Story: सुधा को उस पल अपनी मां की याद आ गई। वह बहुत छोटी थी जब मां चल बसी थीं। तब वह आठ साल की थी।
कभी-कभी जिंदगी के सबसे बड़े सबक किसी स्कूल या किताब से नहीं, बल्कि एक साधारण से घर में, एक सादी-सी औरत के मुंह से मिलते हैं। सुधा के साथ ऐसा ही हुआ था। उसे क्या पता था कि उस
दिन का एक छोटा-सा लम्हा, उसकी सोच और जीवन के प्रति रवैये को हमेशा के लिए बदल देगा।
हर सुबह जब मोहल्ले में सूरज की पहली किरण घरों की दीवारों से टकराती, उसी समय सुधा अपनी झोपड़ी के बाहर बाल्टी, झाड़ू और पोछे का झोला लेकर तैयार खड़ी होती। दिनभर चार-चार घरों में काम करती थी, झाड़ू, बर्तन, कपड़े और कभी-कभी खाना भी। दो बच्चों की मां, एक शराबी पति की पत्नी और अपने छोटे से घर की अकेली उम्मीद।
पर इन सबके बावजूद सुधा की हंसी कभी थमती नहीं थी। उसका सधा हुआ हाथ और मुस्कुराता चेहरा उसे हर घर में अलग बना देता था। वह साफ-सुथरी रहती थी, दुपट्टा हमेशा कांधे से उतारकर
काम में जुट जाती थी- उसे लगता था कि दुपट्टा बांधने से हाथ रुकते हैं, मेहनत में बाधा आती है। पिछले हफ्ते ही सुधा ने एक नया घर पकड़ा था- तीन मंजिला पक्का मकान, जहां सिर्फ चार लोग रहते थे- अंकल, आंटी और उनके दो जवान बेटे। घर साफ-सुथरा था और आंटी भी पढ़ीलि खी लगती थीं। काम ज्यादा नहीं होता था, पर समय पर पहुंचना जरूरी था। यह सुधा का दिन का आखिरी घर था। वह अपने सभी काम निपटाकर दोपहर के बाद वहां जाती, थोड़ा काम और फिर आंटी के साथ चाय पर थोड़ी बातचीत। यही उसका आराम का समय होता। आंटी से उसे एक अलग अपनापन महसूस होता था। उस दिन भी ऐसा ही दिन था। सुधा फर्श पर झुकी पोंछा लगा रही थी और आंटी पास की कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थीं। बातों का सिलसिला चल रहा
था- कभी बच्चों की पढ़ाई की बात, कभी सब्जी के दामों की। ‘सुधा, एक बात पूछूं? तू बुरा तो नहीं
मानेगी?’
‘नहीं आंटी जी, आप तो मेरी बड़ी हैं, जो चाहे पूछिए।’
‘तू हर घर में ऐसे ही दुपट्टा उतार देती है?’
सुधा हंस पड़ी। ‘हांजी, दुपट्टा लेकर काम बिल्कुल नहीं होता मुझसे। फंसता
है, खिंचता है।’
आंटी एक पल को चुप रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘बुरा मत मानना बेटा, पर जरा
अपने कुर्ते की ओर देख तो।’
सुधा ने गर्दन घुमा कर अपनी ओर देखा, तो वह एकदम झेंप गई। कुर्ते का गला थोड़ा खुला था और झुकने से अंदर का कुछ हिस्सा दिख रहा थाथोड़ी-सी शमीज तक। वह एकदम
सीधी हो गई।
आंटी ने प्यार से कहा, ‘देखा बेटा, मैं औरत होकर देख पा रही हूं, तो सोच तेरे आते-जाते उन दो लड़कों या अंकल की नजर कहीं गलती से भी पड़ जाए, तो तू ही कहेगी कि घर के मर्द बिगड़े हुए हैं। पर जब सामने कुछ दिख रहा हो, तो नजर तो जाएगी ही न? कोई आंख बंद करके तो नहीं चलेगा।’ सुधा की आंखों में पानी आ गया था, पर वह कोई विरोध नहीं कर सकी। पहली बार किसी ने उसे इस नजरिया से कुछ बताया था। आंटी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘देख, मैं तुझे कुछ दिखाती हूं, ऐसे करना चाहिए।’उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से गले को ढका और फिर कमर में ठीक से कसकर बांधा।
सुधा ने सिर हिलाया और चुपचाप अपना दुपट्टा उठाया, उसे सामने से गले तक ढका और कमर में बांध लिया। सुधा को उस पल अपनी मां की याद आ गई। वह बहुत छोटी थी जब मां चल बसी थीं। तब वह आठ साल की थी। मां की गोदी, उसकी डांट, उसका प्यार – सब कहीं धुंधला सा था। लेकिन आज आंटी की वो बात, वो नसीहत, वो सिखाने का तरीका- सब कुछ उस उसकी मां की याद दिला गया था। उसके गले से आवाज नहीं निकल रही थी। आंटी ने प्यार से पूछा, ‘ऐसे क्या देख रही है?’
सुधा की आंखें भर आईं। ‘आपने जो कहा, बिलकुल सही है। पर आज तक किसी ने इस तरह कुछ बताया नहीं, शायद इसीलिए कभी ध्यान नहीं गया। आप मेरी मां जैसी हैं।’ उस दिन के बाद सुधा ने अपना तरीका बदल लिया। अब वह हर घर में दुपट्टा सही तरीके से बांध कर ही काम करती। कई जगह लोगों ने सराहा भी। कुछ औरतों ने कहा, ‘अरे, अब तो तू बड़ी सलीके से दिखती है।’
सुधा के भीतर कुछ बदल गया था। एक आत्म-सम्मान, एक समझ, एक चेतना। उसे यह एहसास हुआ कि समाज में जीने के कुछ अनकहे कायदे होते हैं, जो हमें खुद ही समझने होते हैं।
और कभी-कभी, कोई अपना हमें वो कायदे सिखा देता है- बिना जजमेंट, बिना अपमान के। इस पूरी घटना ने सुधा को एक और बात सिखाई- औरतें अगर एक-दूसरी को जज करने की बजाय समझाएं, साथ खड़ी हों, तो बहुत कुछ बदल सकता है। आंटी ने सुधा को ताना नहीं मारा, उसे
शर्मिंदा नहीं किया, बस एक मां की तरह समझाया।
और यही बात सुधा ने अब अपनी बेटी में भी डालनी शुरू की। वह अपनी बारह साल की बेटी को धीरे-धीरे सजग बनाना सीख रही थी- कपड़े, भाषा, व्यवहार और आत्म-सम्मान के स्तर पर।
कुछ महीनों बाद आंटी का बेटा दिल्ली ट्रांसफर हो गया और वे लोग घर बेचकर चले गए। आंटी
के जाने पर सुधा बहुत रोई। आंटी ने जाते समय एक छोटी सी पोटली में एक सुंदर सूती दुपट्टा देकर कहा था, ‘ये रख, जब भी पहने, मुझे याद कर लेना।’
सुधा ने वह दुपट्टा संभाल कर रखा। कभी पहनती तो आंटी की बातें कानों में गूंजने लगतीं।
सुधा के भीतर कुछ बदल गया था। एक आत्म-सम्मान, एक समझ, एक चेतना। उसे यह
एहसास हुआ कि समाज में जीने के कुछ अनकहे कायदे होते हैं, जो हमें खुद ही समझने होते हैं।
अब सुधा खुद कई औरतों को, नई कामवालियों को सिखाती है। वह उन्हें बताती है, ‘काम करो मेहनत से, लेकिन सलीके से भी। लोग क्या सोचते हैं, यह हमारे हाथ में नहीं लेकिन हम खुद को कैसे पेश करते हैं, यह हमारे बस में है।’
उसे लोग अब ‘सुधा दीदी’ कहते हैं। वह मोहल्ले की औरतों के लिए अब सलाहकार बन गई है। उसका आत्मविश्वास और भाषा बदल चुकी है। और यह सब शुरू हुआ था, उस एक दिन की उस एक सच्ची बात से, जो आंटी ने कही थी।

हम में से बहुतों को जिंदगी में ऐसे लोग नहीं मिलते जो हमें समय पर टोक दें, रोक दें या सही रास्ता दिखा दें। और कभी-कभी, जब ऐसे लोग मिलते भी हैं, तो हम उन्हें सुनना नहीं चाहते। लेकिन अगर हम थोड़ा रुकें थोड़ा सोचें और अपने भीतर झांकें तो शायद जिंदगी की असली समझ उन चुपचाप
बोलने वाली बातों में ही छुपी होती है। दुपट्टा कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, पर उस दिन वो सुधा के लिए पहचान, सुरक्षा और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया। सच में, कुछ गांठें खोलने के लिए पहले उन्हें बांधना पड़ता है और उस दिन सुधा ने दुपट्टे की गांठ के साथ अपनी सोच की भी गांठ बांध ली
थी।
