bijjal ka neela ghoda
bijjal ka neela ghoda

Hindi Immortal Story: विंध्य प्रदेश में भला बिज्जल का नाम किसने नहीं सुना? कहा जाता है कि बिज्जल शौर्य और वीरता की मिसाल था और बड़े-बड़े शूरवीर राजा भी उसका नाम सुनकर थर-थर काँपते थे। उसके पास बड़ी अनोखी शक्तियाँ थीं जिनके बारे में तरह-तरह की कहानियाँ चल पड़ी थीं। पर बिज्जल कुछ अजीब ही था। वह विंध्य के जंगलों में रहता था और वहीं से कभी-कभी पलनीपुर शहर में भी घूमते हुए आ जाता था। अजीब रंग-ढंग था उसका। लंबा, ढीला-ढाला चोगा पहने रहता। काली दाढ़ी, वैसे ही काले, लंबे-लंबे बाल। उसकी आँखों में विचित्र सी चमक थी, जो भी देखता आकर्षित हो जाता।

बिज्जल ने जंगल में एक आश्रम जैसा बनाया हुआ था, उसी में रहता था। बाहर नीले रंग का खूबसूरत घोड़ा बँधा रहता। बिज्जल के पास न जाने किस धातु की, लाल रंग की विचित्र तलवार भी थी, आगे से मुड़ी हुई। वह उसकी शैया के सिरहाने लटकी रहती।

कहा जाता, अँधेरा होते ही बिज्जल अपने नीले घोड़े पर बैठ, हाथ में तलवार ले, निकल पड़ता। वह कहाँ जाता, किसी को पता नहीं था। किसी ने उसे कहीं आते-जाते देखा नहीं था। लेकिन आधी रात के समय घोड़े के हिनहिनाने की आवाज जरूर सुनाई देती। तब लोग कहते, “बिज्जल जा रहा है। आज जरूर किसी न किसी दुष्ट की खबर ली जाएगी।”

बिज्जल कौन है, कहाँ से आया? किसी को पता नहीं था। कुछ बुजुर्ग बताते, “बिज्जल जादूगर है। इसने अपने गुरु गुगनी बाबा की खूब सेवा की। गुगनी बाबा ने ही इसे नीला घोड़ा, लाल तलवार दी। चमत्कारी घोड़ा कभी दिखता है, कभी अदृश्य हो जाता है। तलवार भी जादुई है।”

बिज्जल के बारे में तरह-तरह के किस्से-कहानियाँ भी प्रचलित थीं। सभी उसे जी-जान से चाहते थे। कारण यह था कि पलनीपुर का राजा अभयदेव क्रूर और अत्याचारी था। प्रजा उससे अपना दुख-दर्द भला कैसे कहती? लिहाजा जब राजा के कारिंदे तंग करते, तब लोग बिज्जल के पास जाते। बिज्जल चुपचाप उनकी बात सुन लेता, करता कुछ न था। लेकिन कुछ दिन बाद दुष्ट कारिंदों को सजा मिल जाती।

एक दिन एक बूढ़े ने आकर बिज्जल से कहा, “राज्य में कुछ विदेशी जासूस आ गए हैं। सुना है, वे कुओं और तालाब के पानी में विष मिलाएँगे। राजा को कुछ परवाह नहीं है। हाथ पर हाथ धरे बैठा है। ऐसा ही रहा, तो राज्य के तमाम सीधे-सादे लोग बिना वजह मारे जाएँगे।”

बिज्जल ने कहा, “चिंता न करो बाबा। सब ठीक हो जाएगा।”

उसी रात लोगों ने देखा, एक तालाब के किनारे तीन विदेशी मरे पड़े हैं। उनके सिर कटे हुए थे। पास ही घोड़े की टापों के निशान थे। लोगों को यकीन हो गया, यह बिज्जल का ही काम है। खोजने पर उन विदेशियों के थैलों में चाँदी के डिब्बे मिल गए, जिनमें विष भरा हुआ था। अनहोनी टल गई। लोग मन ही मन बिज्जल की प्रशंसा कर रहे थे।

भीड़ में से किसी ने कहा, “अगर दुष्ट जासूसों को दंड न दिया जाता, तो न जाने हम पर क्या बीतती? चलो, चलकर बिज्जल को धन्यवाद दे आएँ।”

बिज्जल के आश्रम पर आकर लोगों ने उसकी खूब बड़ाई की। पर उसने कहा, “मैंने तो सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया है। गुरु को दिया हुआ अपना वचन निभा रहा हूँ।”

किसी ने पूछा, “तुम राजा को दंड क्यों नहीं देते? वह लोगों को तंग करता रहता है। क्या राजा के सामने तुम्हारा जादू नहीं चलता?”

बिज्जल ने मुसकराकर कहा, “अभी इसका समय नहीं आया।”

ऐसे ही समय बीतता जा रहा था। अचानक एक दिन सुबह-सुबह एक युवक बिज्जल के पास आया। कपड़े फटे हुए, शरीर बुरी तरह घायल था। देखने में कोई राजकुमार लगता था। बिज्जल के आगे हाथ जोड़कर उसने कहा, “कीरतपुर से सीधा आपके पास आया हूँ। बहुत नाम सुना है आपका। आप ही मेरा दुख दूर कर सकते हैं।”

बिज्जल के पूछने पर उसने बताया, “मेरा नाम सुमंत है। पलनीपुर के मित्र राज्य कीरतपुर का राजकुमार हूँ। लेकिन चापलूसों के कहने में आकर दुष्ट राजा अभयदेव ने कीरतपुर पर चढ़ाई कर दी। मेरे पिता कीर्तिसेन मारे गए। मैं किसी तरह भागकर आया हूँ। फिर से सेना संगठित करके, अभयदेव से बदला लूँगा। आततायी राज से मुक्ति दिलाने में आपकी मदद चाहिए।”

बिज्जल सोच में पड़ गया। फिर बोला, “ठीक है। अभयदेव कभी-कभी शिकार के लिए जंगल में आता है। इस बार आया, तो बचकर नहीं जा सकता। फिर तुम पलनीपुर पर आक्रमण कर देना।” सुमंत संतुष्ट होकर वहाँ से चला गया। सेना संगठित करने के काम में जुट गया।

कुछ ही दिन बाद राजा अभयदेव शिकार के लिए जंगल में आया। जंगल के पशुओं में भगदड़ मच गई। राजा तेजी से घोड़ा दौड़ाता हुआ, बढ़ा जा रहा था। अचानक किसी जगह राजा ने पास ही घोड़े के हिनहिनाने की आवाज सुनी। यह राजा के अपने घोड़े की आवाज न थी। कोई दूसरा ही घोड़ा था, लेकिन नजर नहीं आ रहा था।

राजा चौंका। इधर-उधर देखा, लेकिन दूसरा घोड़ा कहीं नहीं दिखाई दे रहा था। राजा चकित होकर सोचने लगा, “यह कैसा चमत्कार है। घोड़े की हिनहिनाहट तो सुनाई दे रही है, लेकिन घोड़ा कहीं नहीं दिखाई पड़ रहा।”

अब राजा के लिए अपने कौतूहल पर काबू पाना मुश्किल हो गया। वह तुरंत घोड़े से उतरा। अपना घोड़ा वहीं एक पेड़ से बाँधकर आगे चल पड़ा।

चलते-चलते राजा बिज्जल की कुटिया के पास आया। बिज्जल बाहर ही खड़ा था। राजा ने पूछा, “क्या तुमने यहाँ कोई घोड़ा देखा है? मुझे सिर्फ हिनहिनाहट सुनाई दे रही है। घोड़ा कहीं नजर नहीं आ रहा।”

बिज्जल ने कहा, “मैं तुम्हें वह रहस्यमय घोड़ा दिखा सकता हूँ। मेरे पीछे-पीछे आओ।”

राजा बिज्जल के पीछे-पीछे चल पड़ा। बिज्जल उसे आश्रम के भीतर ले गया। एक कोठरी के पास जाकर बोला, “जाओ! इसके भीतर तुम्हें वह घोड़ा दिखाई देगा।”

सचमुच, कोठरी में प्रवेश करते ही राजा को नीले रंग का घोड़ा दिखाई दिया। लेकिन राजा जैसे ही हाथ बढ़ाकर छूने की कोशिश करता, घोड़ा दूर सरक जाता। राजा चकित था, कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। उसने पीछे मुड़कर देखा, तभी अचानक कोठरी का दरवाजा खुद-ब-खुद बंद हो गया। राजा गुस्से में भरकर चिल्लाया, “यह धोखा है। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो तुमने मुझे कैद कर लिया? मेरे सैनिक अभी आकर तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे।”

सुनते ही बिज्जल हँसा। उसका अट्टहास दूर-दूर तक गूँजने लगा। बोला, “भूल गए, तुमने निर्दोष प्रजा को कितना सताया है! तुम आततायी हो, शासन करने के योग्य नहीं हो। मित्र राज्य कीरतपुर पर आक्रमण करके, राजकुमार सुमंत को दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया। मैं तुम्हें इसकी सजा दूँगा।”

राजा चीखता-चिल्लाता रहा। बिज्जल को अपनी शक्ति से आतंकित करना चाहा, पर कोई असर नहीं हुआ।

कुछ देर बाद कोठरी का दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया। राजा भागना चाहता था। इतने में ही बिज्जल ने हाथ उठाया। तुरंत तलवार उसके हाथ में आ गई। अगले ही पल तलवार बिज्जल के हाथ से छूटी, राजा के सिर के चारों और घूमने लगी। अब राजा को लगा, भागना संभव नहीं है। अंत नजदीक आ गया है।

पर अचानक उसे एक चाल सूझी। बड़ी विनम्रता से बोला, “तुम इसलिए मुझसे नाराज हो न, कि मैंने सुमंत से उसका राज्य छीन लिया है। लेकिन राजा का काम तो युद्ध लड़ना और युद्ध जीतना ही है। इसमें मेरा क्या दोष? हाँ, अगर तुम चाहो, तो मैं वह राज्य तुम्हें दे सकता हूँ। तुम्हें कीरतपुर का राजा बना दूँगा।”

सुनते ही बिज्जल की तनी हुई भृकुटियाँ ढीली पड़ गईं। आँखों में चमक आ गई। मुसकराते हुए बोला, “क्या सचमुच! अपने वायदे से फिर तो नहीं जाओगे?” बिज्जल ने कितनी ही बार पलनीपुर की प्रजा की मदद की थी, पर यह लालच उसके मन में कभी नहीं आया था। वह बिना किसी स्वार्थ के, लोगों की भलाई में जुटा रहता। आज पहली बार राजा अभयदेव की बातों ने उसके मन में खोट पैदा कर दी थी।

राजा ने देखा, तीर निशाने पर बैठा है। वह और अधिक विनय तथा चतुराई से बोला, “मेरी बात का विश्वास करो। कीरतपुर राज्य आज से तुम्हारा है। लेकिन अभी कुछ समय तक तुम्हें प्रतीक्षा करनी होगी। कीरतपुर की प्रजा विद्रोह पर उतारू है। पहले उसे शांत करना होगा। यह काम होते ही मैं राज्य तुम्हें सौंप दूँगा। हाँ, अब सुमंत कभी आए, तो उसे जीवित न जाने देना। वही विद्रोहियों का सरगना है।”

बिज्जल खुशी-खुशी मान गया। उसने राजा अभयदेव को बड़े सम्मान से विदाई दी।

कुछ ही दिन में राजा अभयदेव के सैनिक आए। वे बिज्जल के लिए रेशमी वस्त्र तथा बेशकीमती रत्न उपहार में लाए थे। राजा ने कुछ स्वर्ण-मुद्राएँ तथा एक चाँदी मढ़ा पत्र भी भेजा था जिसमें बिज्जल की खूब प्रशंसा की गई थी।

अब बिज्जल का रहन-सहन बदल गया। वह राजसी वेश में रहने लगा। वैसा ही स्वभाव भी हो गया। लोगों से वह अब उतने प्यार से न मिलता। उनके दुख-दर्द और शिकायतों की परवाह न करता। रात को अपने नीले घोड़े पर बैठ, तलवार लेकर निकलना भी छोड़ दिया।

उधर राजकुमार सुमंत भी एक बीहड़ जंगल में मित्रों के साथ रह रहा था। उसने एक छोटी सी सेना संगठित कर ली थी। रोज युद्ध का अभ्यास करता। सोच रहा था, ‘बिज्जल की मदद से जल्दी ही राजा अभयदेव से बदला लूँगा।’ एक दिन उसके एक दूत ने आकर संदेश दिया, “बिज्जल ने हमारे साथ छल किया। राजा अभयदेव को कैद करके फिर छोड़ दिया। उस पर विश्वास करना ठीक नहीं होगा।”

सुमंत को जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन दूत बोला, “मैंने अपनी आँखों से देखा है, खुद बिज्जल ने आश्रम के बाहर मुसकराते हुए राजा अभयदेव को विदा किया है।”

अब तो सुमंत क्रोध से आग-बबूला उठा। फौरन घोड़ा दौड़ाता हुआ बिज्जल के पास पहुँचा। बिज्जल उस समय शाही ढंग से सजे हुए कक्ष में विश्राम कर रहा था। सुमंत ने कहा, “तुम तो मित्रता की लंबी-लंबी डींगें हाँक रहे थे। फिर राजा अभयदेव को कैद करके कैसे छोड़ दिया?”

इस पर बिज्जल कुटिलता से हँसा। बोला, “तुमने जो सुना है, ठीक ही सुना है। लेकिन इसका कारण तुम हो। मुझे पूरा यकीन हो गया है कि आततायी राजा नहीं है। उलटे तुम्हीं प्रजा को उसके खिलाफ भड़काया करते हो।”

सुमंत बोला, “सच क्यों नहीं कहते? राजा ने कीमती उपहार देकर तुम्हें खरीद लिया। तुम लालची हो। पलनीपुर की प्रजा बेकार ही तुम पर भरोसा करती है।”

बिज्जल क्रोध के मारे थर-थर काँपने लगा। चेहरा लाल हो गया। बोला, “दुष्ट युवक! बहुत बढ़-चढ़कर बोल रहा है। तुझे इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी।”

कहकर बिज्जल ने मंत्र पढ़कर अपने जादू का स्मरण किया। उसने जोर से जमीन पर पैर पटक, अपने घोड़े को आने का आदेश दिया। लेकिन चमत्कार! घोड़ा आया और दूर खड़ा हो गया। उसने बिज्जल के पास आने से इंकार कर दिया। बिज्जल की आँखों में उदासी छा गई। उसने फिर हवा में हाथ फैलाया। लेकिन जैसे घोड़ा कुछ दूर रुक गया था, ऐसे ही तलवार भी कुछ दूरी पर आकर रुक गई।

बिज्जल चीखा, “मेरे नीले घोड़े! सुमंत को पैरों से रौंद डालो। मेरी लाल तलवार! सुमंत के टुकड़े-टुकड़े कर दो।”

पर यह क्या! न नीला घोड़ा अपनी जगह से हिला, न बिज्जल की जादुई तलवार। बिज्जल के लिए अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया। वह स्वयं दौड़कर अपने नीले घोड़े और तलवार के पास गया। मगर जैसे ही उसने छुआ, नीला घोड़ा और लाल तलवार दोनों पत्थर के हो गए।

बिज्जल घबरा गया। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। सुमंत बोला, “खबरदार! अब अपनी जान की परवाह करो। जब तक तुम अच्छे काम करते थे, लोगों की मदद करते थे, तुम्हारा जादू चलता रहा। लेकिन अब तुमने दुष्ट राजा का साथ देना शुरू कर दिया। इसीलिए जादू ने तुम्हारा साथ छोड़ दिया।”

सुमंत ने आगे बढ़कर बिज्जल को पकड़ लिया। उसे कैद करके अपनी छावनी में ले गया। मित्रों से बोला, “हमने बिज्जल की मदद से राजा अभयदेव को हराना चाहा। अब हम अपने पराक्रम से उसे हराकर दिखाएँगे।”

सुमंत के आह्वान पर देखते ही देखते, सेना तैयार हो गई। पलनीपुर की प्रजा तो राजा अभयदेव से नाराज थी ही। बहुत से सैनिक और अधिकारी भी उसके अत्याचारों से तंग आ चुके थे। मौका देखकर सभी सुमंत की सेना में शामिल हो गए। भाले, फरसे और तीर-कमान लिए सब राजमहल की ओर चल दिए। आगे-आगे सुमंत था। सबने राजा अभयदेव के राजमहल पर हल्ला बोल दिया।

अभयदेव चारों ओर से घिर गया। उसने चिल्लाते हुए अपने विश्वासपात्र सैनिकों को आदेश दिया, “पकड़ लो सुमंत को। भागने न पाए। इसके सिरफिरे साथियों को घोड़े की टापों से कुचल दो।”

खुद भी वह तलवार लेकर आगे बढ़ा, लेकिन उसके सैनिक अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। जो थोड़े से सैनिक लड़े, उन्हें सुमंत के वीर सैनिकों ने पछाड़ दिया। राजा अभयदेव को कैद कर लिया गया।

सैनिक जब अभयदेव को हथकड़ी डालकर ले जा रहे थे, उसकी आँखें झुकी हुई थीं। लेकिन उसकी हालत पर किसी को तरस नहीं आया। प्रजा उसके अत्याचार याद कर-करके कोस रही थी।

उसी दिन राजा सुमंत का राज्याभिषेक किया गया। शानदार समारोह हुआ, जिसमें बिज्जल भी शामिल हुआ। उसने अपनी गलती मान ली थी, इसलिए सुमंत ने उसे क्षमा कर दिया था।

सुमंत पलनीपुर पर न्यायपूर्वक शासन करने लगा। बिज्जल को उसने मंत्री बना दिया था। कहते हैं, पत्थर की नीला घोड़ा और लाल तलवार जंगल में बरसों उसी तरह पड़े रहे, फिर अचानक गायब हो गए। लेकिन रात को घोड़े की हिनहिनाहट वहाँ अब भी सुनाई देती है।

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)