Hindi Short Story: बादल घुमड़-घुमड़ कर गरज रहे थे और बारिश पूरे शहर को अपनी बाहों में समेटे हुए थी। आर्या अपनी कार में अकेली बैठी थी, बारिश की तेज़ बूंदें विंडशील्ड पर पड़ रही थीं, और वाइपर उसे हटाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। उसने स्टीयरिंग व्हील पर उंगलियां बजाई और गहरी सांस ली।
रात के 11 बज चुके थे, और वो इस वीरान हाईवे पर फंसी हुई थी। फोन नेटवर्क भी धोखा दे रहा था और कार ने भी ऐन मौके पर बंद होने का फैसला कर लिया था।
“शानदार!” उसने बुदबुदाया।
तभी बाइक की तेज़ हेडलाइट्स उसकी तरफ बढ़ने लगीं। डर के मारे उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन जब बाइक रुकी और सवार ने हेलमेट उतारा, तो वो कुछ पल के लिए सांस लेना भूल गई।
“वीर?” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन उसमें कई भूले-बिसरे एहसास गूंज रहे थे।
वीर ने उसे देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम आज भी मुसीबतों को अपने साथ लेकर चलती हो, आर्या!”
वो कुछ नहीं बोली। बस बारिश की बूंदें उसके चेहरे से फिसलती रहीं, जैसे वक्त ने उनके बीच बहते हुए हर लम्हे को फिर से जिंदा कर दिया हो।
सात साल पहले…
कॉलेज के आखिरी दिन भी ऐसी ही बारिश हो रही थी। वीर और आर्या कैंपस की पुरानी लाइब्रेरी के बरामदे में खड़े थे।
“तो तुम सच में जा रही हो?” वीर ने उदास आँखों से पूछा था।
“हाँ, दिल्ली की जॉब पक्की हो गई है। और तुम?”
“मुझे मुंबई जाना है।”
कुछ पल खामोशी रही, फिर वीर ने धीरे से कहा, “अगर मैं कहूँ कि मैं चाहता हूँ तुम यहीं रहो?”
आर्या ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, लेकिन उसकी आँखें नम थीं। “हमारी राहें अलग हैं, वीर। शायद किसी और मोड़ पर…”
वो दिन हीं खत्म हो गया था।
वर्तमान…
वीर उसकी बंद कार के पास झुका और बोनट खोलकर कुछ देखने लगा। “इंजन ओवरहीट हो गया है। अभी स्टार्ट नहीं होगी। तुम्हें कहीं जाना था?”
“घर,” उसने धीरे से कहा।
वीर कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बोला, “चलो, तुम्हें छोड़ देता हूँ।”
आर्या हिचकिचाई। लेकिन इस सुनसान रास्ते और तूफानी रात में उसके पास और कोई चारा भी नहीं था।
बाइक की पिछली सीट पर बैठते ही उसने अपने हाथ कसकर सीट के पीछे पकड़ लिए।
“इतनी दूरी?” वीर ने चिढ़ाया।
“आदत नहीं रही,” उसने हंसते हुए कहा।
जैसे ही बाइक आगे बढ़ी, बारिश और तेज़ हो गई। सड़कों पर पानी लहरों की तरह उछल रहा था। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, लेकिन सबसे ज्यादा महसूस हो रही थी वो गर्माहट—वीर की मौजूदगी की।
एक मोड़ पर बाइक हल्का सा झटका खाकर रुकी, और आर्या अनजाने में वीर को कसकर पकड़ बैठी।
“अब तो लग रहा है कि तुम्हें डर नहीं लग रहा,” वीर ने मुस्कुराते हुए कहा।
आर्या ने धीरे से उसकी पीठ पर सिर टिका दिया। “शायद अब सच में डर नहीं लगता…”
वीर ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी मुस्कुराहट बारिश में भीग रही थी, लेकिन दिल में कहीं एक धड़कन थी-जो सात साल बाद फिर से सुनाई दी थी।
