भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
केसर ने घर में पहुँचते ही देखा उसके कमरे का ताला टूटा हुआ है वो हड़बड़ा के कमरे में दाखिल हुई तभी उसके पैरों के नीचे कुछ चुभा। उसने चारों तरफ देखा तो अपना सर पकड़ कर बैठ गयी, उसका बड़ा टीन का बक्सा खुला हुआ था और टूटा हुआ ताला बाजू में पड़ा था और उसका मिट्टी का फुकुआ (गुल्लक) कई टुकड़ों में बिखरा पड़ा था।
“हे भगवान उ चमरा दरुआ सब सत्यानाश कर दिया। सारा पैसा ले गया दारू और जुएँ में उड़ाने”
“कितने मुश्किल से पाई-पाई बचाकर इतने पैसे जुटाए थे।
अभी और कितना सारा पैसा जुटाना बाकी है और ये हरामी पूरा खाली करके ले गया। एक फूटी कौड़ी भी न छोड़ा। खुद तो एक धेले भर की कमाई करेगा नहीं, बस लुगाई की कमाई चाटनी है उसके जिसम के साथ साथ, सत्यानाशी कहीं का। चार दिन नहीं टिकता कहीं काम पर और जो कमाता अपने ही ऊपर खरच कर लेता। जी तो करता किसी दिन जहर ही दे दूँ घोटकर। पर न जाने कौन-सा कीड़ा काटा है आँख से दूर भी हो जाये तो पीरान निकलते हैं।”
“का करूँ बाप भी तो वही है मेरे चार-चार बच्चों का।” किस्मत ही नासपीटी है, किसको दोष दूँ”
चिल्लाते हुए सुबकते हुए केसर अपनी आँख और नाक बार-बार पोंछते रही थी और अपने आप से ही बात किये जा रही थी।
वह अपने गुल्लक के लिए इतना रोई थी कि उसको हल्की सर्दी-सी हो गयी और आँसू के साथ नाक से भी बार-बार पानी आ रहा था।
केसर एक सुन्दर महिला थी उजले श्याम वर्ण की और कद काठी से भी आकर्षक थी। देखकर नहीं लगता था कि चार बच्चो की माँ है। जबकि दोनों बेटियों के बच्चों की नानी भी बन गयी थी। छोटी को दो बच्चे थे और बड़ी वाली को एक बेटी थी।
इन दो बेटियों के आलावा एक बेटा जो दोनों बड़ी बेटियों से छोटा था जो तीसरी तक पढ़कर पढाई छोड़ चुका था। और सारा दिन यहाँ-वहाँ फोकट का घूमता रहता और माँ से अपने शौक पूरे करवाता रहता।
केसर भी अपने इकलौते बेटे की हर बात सर आँखों पर रखती थी। और एक छोटी बेटी थी जो कुछ समय से बहुत बीमार चल रही थी ।
केसर दो घरों में बरोनी का काम करती और बाकी समय साड़ियों में हाथों से फॉल लगाने का काम करती थी।
बरोनी का काम एक बड़ी मेडम जी के घर और दूसरा एक टीचर के घर पर करती। इन्हीं दो घरों की कमाई से अपना घर चला रही थी और अपनी बीमार बच्ची का इलाज भी करा रही थी। उसके ऊपर मेडम जी का काफी कर्जा चढ़ गया था। उसे जब भी रुपयों की जरूरत होती मेडम जी झट से उसकी मदद को तैयार खड़ी हो जाती।
मेडम जी को हमेशा डर लगा रहता की कहीं वह काम न छोड़ दें आजकल केसर जैसी मेहनती और ईमानदार बरोनी कहाँ मिलती है।
उसका आदमी रोज ही दारू पीकर आता और साथ में दो-तीन पऊआ भी लेकर आता और कभी-कभी तो ये हद हो जाती है कि पीकर इधर-उधर पड़ा रहता फिर देर रात तक न आने पर केसर और उसका लड़का उसे ढूंढकर किसी तरह घर लेकर आते।
केसर अपनी जिंदगी के पिछले पन्ने देखकर बहुत रोती जब शादी होकर आई थी। पति चुनागारे और ड्राइवर गिरी करके अच्छी कमाई कर लेता था। पीता तो तब भी था मगर अब तो रोज का ही तमाशा हो गया पीकर आना। छोटी लड़की की बीमारी ने ऐसे ही कमर तोड़ रखी थी।
बाजूवाली फूलमती बोली तेरी लड़की को कोई जादू टोना कर दिया है उसके पेट में भूत घुस गया है तभी तो तेरी लड़की पेट दर्द से दिन-रात चिल्लाती रहती है और देख उसका पेट फूल भी गया है।
केसर टीचर जी के सामने रोती .. “टीचर जी मेरी लड़की को कोई टोना कर दिया उसके पेट में भूत घुसा है” ..कैसे निकालूं उसे? बहुत पिराता है उसका पेट। “उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती, वो दर्द में अपने बाल नोचने लगती है” .. कल तो रात में उठकर तो चीखने लगी, “फिर छोटी मस्जिद लेकर गए वहाँ के मौलाना ने पानी फूककर दिया है। बोला पानी की बोतल को किसी को छूने मत देना, बस मैं छू सकती हूँ।
दो ढक्कन पानी सुबह खाली पेट पिलाने को बोला है।
“तू उसे किसी डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाती है, टीचर जी ने कहा।” “नहीं नहीं टीचर जी, “डाक्टर को दिखने से भूत दूसरे के पेट में घुस जाएगा” बदला लेगा घर के लोगों से..ये कोई टोना किया है डॉक्टर की दवाई से नहीं ठीक होगा।
“फालतू की बात मत कर, दिमाग सही है तेरा, कुछ हो जाएगा तब पछताएगी तू। सुन ये जादू-टोना कुछ नहीं होता समझी, उसे किसी डॉक्टर को दिखा जांच में पता चल जाएगा कि क्या हआ है. क्यों पेट दखता है।’
“तुम लोगों की यही आदत से पिछड़ापन खत्म नहीं हो रहा है ..। कुछ सिखाओ भी तो नहीं सीखना चाहते” टीचर जी गुस्से में केसर को बोले जा रही थी।
केसर झाडू लगाते हुए चुपचाप सुन रही थी और अपनी आँखें पोंछ रही थी।
केसर का काम खत्म होने में अभी थोड़ी देरी थी तभी उसकी बड़ी बेटी का फोन आया ..
हेल्लो ,
हाँ बोल बाली
माँ तू घर कब आएगी?
“क्यों? तू इहाँ आई है का’
“हाँ और मेरी लड़की को भूख लगी है बाबू कहीं चला गया है, मैं का करूँ? तू जल्दी आ”
“अरे, मेरा काम थोड़ा बाकी है। चल ठीक है, जल्दी खत्म करके आती हूँ तू रुक” कहकर केसर अपने काम को जल्दी-जल्दी करने लगी।
केसर की लड़की की दूसरे समाज में शादी हुई थी इसलिए वो उसके चौके में घुस नहीं सकती थी।
उसका ससुराल पचास (50) किलोमीटर दूर था लेकिन वो आये दिन अपनी माँ के घर आ जाती थी।
केसर की बड़ी लड़की का एक लड़के से प्रेम हो गया था लड़का संपन्न परिवार का था।
केसर ने पहले तो शादी के लिए मना कर दिया मगर अपनी लड़की के अच्छे भविष्य के लिए मान गयी और उन दोनों को छुपकर शादी करने के लिए हाँ कर दिया क्योंकि रीति-रिवाज से ये शादी नहीं कर सकती थी। क्योंकि इससे उसके बिरादरी वाले समाज से उसको बाहर कर देते।
जबकि वो जानती थी की लड़की के घर से भागने पर वो अपने समाज के एक बड़े कर्जे में आ जाएगी मगर उसने इस कर्जे को अपने ऊपर चढ़ा लिया बेटी की खातिर।
एक कर्जा तो उसके ऊपर पहले ही चढ़ गया था जब छोटी बेटी बिना किसी को बताये घर से भाग गयी थी।
वो अब दो बड़े कर्जे को उतारने की चिंता में पैसे इकट्ठे करने में लगी हुई थी। उस पर छोटी बेटी की बीमारी भी बढ़ गयी थी।
उसने तय किया की वो टीचर जी की बात मानकर लड़की को डाक्टर को ही दिखाएगी।
उसकी लड़की जो भी खाती उल्टी कर देती मगर भूख से रोती भी।
वो दोनों लड़कियों का बकरा भात और पैसा छुड़ा के समाज में अपने बेटे के लिए जगह बनाने की चिंता में दिन-रात खट रही थी।
“मैडम जी, आज शाम को नहीं आऊँगी”
सुबह काम करते हुए उसने मैडम जी से कहा
“क्यों नहीं आएगी?” मैडम ने चौंककर झल्लाते हुए कहा,
आज बुआ सास के घर बकरा भात है।
तो … मैडम ने चिढ़ते हुए कहा, “जल्दी आकर काम खत्म करके चली जाना”
केसर कुछ बोलना चाहती थी मगर बोल नहीं पाई .. मैडम के दिए पैसों से उसकी जुबान बंध गयी थी।
जो उसने अपने बेटे को थाने से छुड़वाने के लिए लिए थे। जब होली में कच्ची दारू पिए लड़कों में मार-पीट होने पर पुलिस उठा ले गयी थी सब लड़कों के साथ उसे भी, जबकि उसने तो दारू भी नहीं पी थी बस भांग की लस्सी पिया था।
वह जानती थी कि बकरा भात पर न जाने से सब ये समझेंगे वो खुद को छुपा कर भाग रही है बकरा भात कराने से। इसलिए वह और तेजी से अपना काम करने लगी।
उस रात अपनी छाती पर हथेलियों के कसाव से केसर की नींद खुल गयी। वह अपने ही पति को अपने इतने करीब, लगभग अपने ऊपर चढ़ा हुआ देखकर ऐसे घबरायी जैसे कोई गैर मरद ने उसे दबोच लिया हो .. “क्या कर रहे हो, हटो” … “मीरा देख लेगी”
“नहीं देखेगी उसे मैं दूसरी जगह लिटा आया हूँ”
अरे!! कहाँ लिटा दिया है? वो डर जाएगी” .. केसर खुद को अपने पति के पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करती हुई बोले जा रही थी।
“नहीं डरेगी तू चुप कर … उसका पति अपने दांत भींचते हुए बोला, तेरी आवज से उठ जाएगी वो”
“नामर्द समझ ली है का मुझको, रोज दिन तेरे नखरे सुनता रहूँ .. आज थक गयी हूँ, आज मीरा रो रही है .. आज ये कल वो सबेरे मैडम जी ने जल्दी बुलाया है।” कहते हुए केसर के आदमी ने उसकी साड़ी खींच दी। केसर मना करने की कोशिश में उसे दूर धकेलने लगी, लेकिन वो था की रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।
“देख सीधी तरह अपना मुह बंद रख ..तमाशा मत कर, नहीं तो ठीक नहीं होगा हरामजादी” बता दे रहा हूँ, कहते हुए उसने केसर की दो पिन से अटकी हुई बंडी को खींचकर खोल दिया और उसकी भरी हुई छाती में अपना मुँह रगड़ता हुआ दांतों से काटने लगा .. केसर की आँखे शून्य हो गयी और उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया।
उसका पति उसे ब्रेड के आटे की तरह उसे मसले जा रहा था। कभी उसकी छाती कभी पेट तो कभी उसके नितम्बों और जाँघों की मछलियों को पागलों की तरह चूमे जा रहा था काटे जा रहा था।
केसर को लग रहा था जैसे वो किसी अँधेरे सुरंग के अंदर धंसी जा रही है।
रह-रहकर दारू के भबके से वह उचट रही थी। उसका बदन सारे दिन के काम से टूटा जा रहा था ..कमर में इतना दर्द था की चित होकर सीधे लेट भी नहीं पा रही थी कुछ दिन से .., मगर उसके आदमी बोया को उसकी ऐसी किसी भी तकलीफ से कोई मतलब नहीं था।
वह केसर की कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़कर, अपनी सुलगती आग को ठंडा करने लगा।
हर झटके के साथ केसर का कलेजा मुँह तक आ जाता, उसके आँसू और भी तेज झरने लगे, उसने अपने दांतों से होंठो को जोर से दबा लिया, वो चीखकर रोना चाहती थी। उसे उस वक्त अपना आदमी एक बलात्कारी-सा लग रहा था।
दोनों हथेली से तकिये को कसकर अपनी सारी चीखों को खून की तरह आँखों से बहा रही थी।
काफी सारे झटको के बाद बोया केसर के ऊपर ही निढाल हो गया और फिर खून जैसी लाल-लाल आँखों को तरेरते हुए बोला, “मजा आ गया बाली की अम्मा”
“अरी तू तो अभी भी 16 साल की लड़की का मजा देती है रे।”
“तेरे को भी आया न मजा, अरे इसलिए तो आज खूब सारा पिया, तेरे को देर तक मजा देने को, और तू क्या.. ये मुर्दे जैसी सकल बना रही है रे” कहते-कहते बोया केसर के बगल में ही लुढ़क गया।
अपनी जांघो पर चिपचिपाहट से उसे घिन्न आ रही थी। खुद में बहुत कमजोरी-सा महसूस करते हुए वह उठी अपने कपड़े समेटते हुए आँगन में बने स्नानघर में जाकर चेहरे को कई-कई बार पानी के छींटे मरकर धोती रही उसके बाद अपने कमरे से ही सटे हुए दूसरे कमरे में जाकर देखा मीरा सो रही थी वह भी वहीं मीरा के पास लेट गयी मगर नींद दूर-दूर तक कहीं नहीं थी।
रात वीरान दूर तक फैले किसी रेगिस्तान-सी लग रही थी। जहाँ पानी की कोई बंद कहीं नहीं है उसका गला भी सख रहा था मगर उठकर पानी पीने की जरा भी ताकत नहीं थी उसमें, वह चुपचाप मीरा के बगल में ही लेटी रही, उसे खुद पर रह-रह कर खीज-सी उठ रही थी। जैसे कुछ हार गयी है वह।
साढ़े तीन बज रहे थे न पूरी रात थी न पूरी सुबह ही हुई थी । ठण्ड की रातें तो वैसे ही गूंगी होती है और उस रात तो जैसे एक तूफान से गुजरकर गूंगी हुई थी।
पूरे घर में एक सन्नाटा पसरा हुआ था मगर घर की हर बेजान चीज जैसे केसर को घूर रही थी।
छत पर लगे पंखे को देखकर उसे ऐसा लग रहा थी जैसे खट-खट की आवाज के साथ चलता हुआ वह पंखा किसी भी वक्त ठीक उसी के ऊपर गिर जाएगा। उसने डर के मारे कथड़ी को अपने मुँह तक खींच लिया।
मगर आँखे किसी चोर की तरह बाहर ही झाँक रही थी। मीरा की तरफ मुड़कर उसने अपने दोनों घुटनों को पेट तक मोड़ लिया। तभी मीरा कराहने लगी अम्मा .. अम्मा … केसर ने उसके सर पर हाथ रखकर कहा “हाँ, मैं यहीं हूँ”
“अम्मा देख न, दादी बुला रही .. अम्मा दादी मेरे को बुला रही है ..
मीरा बुदबुदा रही थी” उसकी बात सुनने के लिए केसर ने पूरे ध्यान से अपने कान उसकी आवाज में गड़ा दिए।
अम्मा दादी बुला रही है। ये कानों में पड़ते ही केसर के पूरे बदन में एक कंपकंपी सी दौड़ गयी, क्योंकि दादी यानी केसर की सास तो पिछले साल ही गुजर गयी थी। उसने घबराकर कमरे में चारो तरफ देखा मगर कमरा तो पहले की तरह ही था, कोई नहीं था वहाँ उन दोनों के आलावा .. वो देवी माँ का नाम लेकर मीरा के सर पर हाथ फेरने लगी थोड़ी देर में मीरा गहरी नींद में चली गयी ।
अचानक केसर को लगा वो किसी ऊँची जगह-सी गिरने लगी है वो झट से उठकर बैठ गयी तब उसे पता चला की उसकी आँख लग गयी थी मीरा के साथ साथ।
घड़ी में सुबह के सात बज रहे थे ।
केसर आँगन की तरफ गयी, वहाँ उसका देवर चाय पी रहा था जो सुबह ही कहीं बाहर से आया था। उनके घर से लगे हुए घर में ही वह अपनी बीवी के साथ रहता था। जिसके अपने कोई बच्चे नहीं थे ।
उसने एक विधवा को चूड़ी पहना कर अपनी बीवी बना लिया था और अब दोनों पति-पत्नी की तरह जीवन यापन करने लगे थे।
केसर जब काम पर चली जाती तो उसकी देवरानी ही मीरा का ध्यान रखती।
केसर के चारो बच्चे अपने चाचा-चाची के चहेते थे । लड़का तो अपने चाचा का लाड़ला भतीजा था।
उस सुबह केसर को काम पर जाने की जरा भी इच्छा नहीं हो रही थी। मगर मैडम जी के तानों के डर के मारे काम पर जाना उसकी मजबरी थी। टीचर जी तो कुछ नहीं कहती लेकिन एक घर के पगार से उसका घर नहीं चल सकता था इसलिए मैडम की झिड़कियों को सुनना उसकी मजबूरी-सी हो गयी थी। आखिर उसे बकरा भात के लिए पैसे जो जुटाने थे।
इन सबके बीच कभी-कभी उसे महसूस होता जैसे वह भी एक बकरा भात है और अपनी जिंदगी, किसी कर्जे की किस्त की तरह खर्च कर रही है जिसका मूल शायद कभी भी नहीं चुक पायेगा उसके जीते जी।
केसर मौलाना के फूंक वाला पानी मीरा को पिलाकर अपनी देवरानी भाना को उसका ख्याल रखने की बात कहकर काम पर निकल गयी मगर आज उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।
आज का मौसम भी बिना बरसात वाले दिन में बादलों के घिरे रहने वाला सा हो रहा था। एक उदासी एक मायूसी उसके मन में गहराती जा रही थी।
सबसे पहले वह मैडम के घर ही गयी और रोज की तरह अपने काम में लग गयी। उसे मैडम जी के घर 7 बजे तक हर हाल में पहुँचना होता था।
करीब दस बजे तक काम करके वह टीचर के घर जाती थी क्योंकि टीचर का स्कूल 12 बजे से लगता था। तो उसे 11:30 तक अपना काम खतम करना होता था फिर वहाँ से वह मैडम जी के घर वापस आकर बाकी के काम करती थी। लेकिन उस दिन मैडम जी के यहाँ से निकलकर वो टीचर के घर के गेट तक ही पहुंची थी कि उसका मोबाईल बज उठा उसने आशंकित मन से जल्दी से अपने बंडी के अंदर से मोबाइल निकालकर कॉल उठाया। वह कुछ बोलती उससे पहले ही दूसरी तरफ से उसका बेटा लगभग हाँफते हुए बोलने लगा, अम्मा, अम्मा जल्दी घर आ, मीरा कैसा कैसा कर रही है .. अम्मा जल्दी आ… अम्मा …वह जोर से चिल्लाया और रोने लगा। बेटे की बात सुनते-सुनते ही वह घर की तरफ वाले रास्ते पर दौड़ पड़ी। उसके कदम और तेज और तेज होते जा रहे थे। वह हांफते हुए एक अनजाने डर से बढी हई धडकनों के साथ दौडती जा रही थी।
घर पहुँचते ही उसने देखा मोहल्ले की कुछ औरतें उसके घर में खड़ी है वह सबको हटाते हुए अन्दर भागी, क्या हुआ? मीरा को, क्या हुआ मीरा को ..?
भाना जोर से रोते हुए बताने लगी “बाली की अम्मा, मीरा उल्टी पर उल्टी किये जा रही है और बोले जा रही है देख अम्मा, दादी बुला रही है.. देख अम्मा दादी बुला रही है..”
ये सुनते ही केसर काँप गयी। बीती रात को भी मीरा यही सब बड़बड़ा रही थी उसे याद आया।
मीरा अपनी दादी की बहुत लहठी हुई थी और 6 महीने पहले ही दादी चल बसी जो पिछले 8 साल से लकवे से ग्रस्त बिस्तर पर ही पड़ी थी। एक मीरा ही थी जो दादी के पास पड़ी रहती थी हमेशा।
केसर मीरा का सर अपनी गोद में रखकर बैठ गयी, इधर देवर भागा ऑटो लाने तभी मीरा एक झटके के साथ उठकर फिर से उल्टियाँ करने लगी उसकी उल्टियों में अब खून भी आने लगा था और वह बार-बार दादी बुला रही अम्मा ..दादी बुला रही अम्मा की रट लगाये पड़ी थी।
तभी देवर अन्दर भागता हुआ आया “ऑटो आ गया, चल जल्दी कर, अस्पताल ले जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा” वह अपनी भाभी को दिलासा देते हुए मीरा को गोद में उठाकर ऑटो में बैठने लगा साथ में भाना भी जाने लगी तभी केसर बोली “तू घर पर ही रुक बाद में आ जाना।” कहकर ऑटो में बैठी और ऑटो चल पड़ा लेकिन अभी वे लोग मोहल्ला ही पार कर पाए थे कि मीरा जोर-जोर से हिचकियाँ मारते हुए एकदम शांत हो गयी।
मीरा.. मीरा.. उठ मीरा कहते हुए केसर का देवर मीरा को जोर-जोर से हिलाने लगा लेकिन मीरा में कोई हलचल नहीं हो रही थी। “गाड़ी तेज भगा गुड्डा” वह ऑटो वाले पर चिल्लाया।
केसर मीरा के सर पर हाथ फेरे जा रही थी “कुछ नहीं होगा तुझे, तू जल्दी ठीक हो जाएगी।” खुद को दिलासा देते हुए केसर लगातार बोल रही थी।
अस्पताल आते ही दोनों मीरा को लेकर अंदर भागे डॉक्टर के कमरे में ही सीधे घुस गए बिना रुके ..” अरे अरे कहाँ घुसे चले आ रहे हो, बाहर इंतजार करो”
डॉक्टर के केबिन में खड़ी बाई बोली मगर केसर एकदम से डॉक्टर के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगी “डॉक्टर साब मेरी बच्ची को जाने क्या हो गया, जल्दी से देख लीजिये।” डॉक्टर सकपका कर बोला, “ हाँ.. हाँ.. रुको रुको, छोडो मुझे, देखता हूँ, उसे लिटा दो पहले।” फिर डाक्टर उठा और मीरा को चेक किया, चेक करते ही उसने केसर के देवर की तरफ देखते हुए बोला, “आप लोगो ने लाने में बहुत देर कर दी ये तो पहले ही खतम हो चुकी है।”
डॉक्टर की बात सुनते ही केसर सन्न रह गयी जैसे हजारों लाखों जोंक ने एक ही बार में उसके शरीर का सारा खून चूस लिया हो, उसकी आँखे जैसे पत्थर की हो गयी। अचानक कुछ देर तक वो वैसी ही खड़ी रही और फिर एकदम से किसी कटे हुए पेड़ की तरह धड़ाम से फर्श पर गिर गयी.. पास ही खड़ी नर्स उसकी तरफ दौड़ी
और आया को आवाज दी जल्दी आओ, आया और नर्स ने उसे उठाकर डॉक्टर के केबिन के बाहर लाकर कुर्सी पर बैठाया। वह अब भी पत्थर की तरह बेजान-सी थी। उसकी आँखों से एक बूंद भी पानी नहीं गिरा।
उस दिन के बाद से केसर एकदम खामोश हो गयी थी ।
न किसी से कोई बात करती न किसी की बात का कोई जवाब देती । घर के सभी लोग बहुत चिंता में पड़ गए ।
मोहल्ले की औरतें तरह-तरह के उपाय बताने लगी उसे रुलाने के .. पर केसर तो जैसे किसी और ही दुनिया में चली गयी थी। पूरे दस दिन बीत गए थे उसे इस तरह खामोश घर पर ही रहते हुए।
एक रात केसर अपने बिस्तर पर रोज की तरह आँखें मीचे गुरमुटिया के पड़ी हुई थी। ठण्ड काले नाग की तरह अपना फन फैलाये हुए थी। तभी उसकी बंडी के अंदर अपना हाथ डालते हुए बोया उससे चिपकने लगा। केसर तब भी चुप ही पड़ी थी बेसुध-सी। बोया उसे मसलते हुए उसके ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हुए उसे सीधे लेटने के लिए कहने लगा। अरी ओ बाली की अम्मा और कितने दिन मातम मनाएगी। वह अम्मा के पास चली गयी अब क्या तू उसका रोना जिन्दगी भर रोएगी।
आ मेरे पास आ बोलते हुए उसने केसर को अपनी तरफ खींचा, देख आज मैं तेरे लिए दो पाउआ ज्यादा चढ़ा कर आया हूँ।
अचानक केसर को बगल वाले कमरे से मीरा की आवाज आई अम्मा .. अम्मा देख दादी बुला रही है अम्मा देख दादी बुला रही है। आवाज सुनते ही केसर ने अपनी पूरी ताकत से चीखते हुए बोया को दूसरी तरफ धकेल दिया और उठकर दूसरे कमरे की तरफ भागी जहाँ मीरा ने आखिरी रात बितायी थी और उस खाट के पास जाकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगी और अपना सर पीटने लगी मीरा आआ.. उसकी चीख जैसे मीलों तक चली गई थी .. घर के सारे लोग उठ गए उसकी दर्दनाक चीख सुनकर।
भाना और उसका देवर भी आ गए। केसर फूट-फूट कर रो रही थी। भाना ने उसे चुप कराना चाहा लेकिन देवर ने इशारे से मना कर दिया। वह चाहता था की केसर दिल खोलकर रो ले।
रो-रो कर केसर बेहाल हो गयी। सब वहीं उसे घेरे खड़े थे।
भाना भी अपना मुँह दबाकर रोने लगी। देवर की आँखें भी भीग गई।
केसर का बेटा पानी लेकर आया और बोला अम्मा चुप हो जा, ले पानी पी ले कितना रोएगी अम्मा. रोने से मीरा वापस नहीं आएगी अब।
ऐसे ही गमगीन माहौल में सुबह हो गयी। इसके दो दिन बाद केसर अपने पति से बोली घर में कथा कराना है, मीरा की आत्मा की शांति के लिए। पंडित जी को खबर कर देना।
दूसरे दिन आस पड़ोस के लोगों को बुला कर कथा कराई गयी शाम तक सभी प्रसाद लेकर जा चुके थे । पंडित जी भी चले गये । अँधेरा हो गया था।
शाम के 6 बज रहे थे केसर मुरझाया हुआ सा चेहरा लेकर भाना के पास ही बैठ गयी ।
बाली की अम्मा, काम पर कब से जाएगी? मैडम जी और टीचर जी बार-बार खबर पूछते हैं। भाना ने दोनों के बीच की चुप्पी तोड़ते हुए कहा। हूँ, कहकर केसर कुछ देर चुप रही, फिर बोली, चली जाऊँगी। जाना तो है ही। नहीं तो बकरा भात के पैसे कहाँ से जटाऊँगी। और एक लंबी सांस भरते हुए वहाँ से उठ गयी। दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर केसर अपने काम पर निकल गयी। धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा और इस तरह चार महीने बीत गए। अब केसर भी पूरी तरह सामान्य हो गयी थी। उसका पूरा ध्यान बकरा भात के लिए पैसा जमा करना में लग गया था।
बकरा भात और पैसे बांटना उसे दोनों लड़कियों के घर से भागकर दूसरे समाज में शादी करने की सजा से मुक्त कर उसके पूरे परिवार और उसके बेटे को समाज में रहने की अनुमति देने का एक रिवाज था।
और उसने सिर्फ अपनी लड़कियों को जीवन भर सुखी देखने के लिए इस कर्जे वाली मुसीबत को मोल लिया था .. और कर्जा न चुकाने पर उसे अपनी लड़कियों की शादी तुड़वाकर घर वापस लाना पड़ता जो वो हरगिज नहीं करना चाहती थी।
उस सुबह केसर मैडम जी के घर से जब टीचर जी के घर पहुँची तो अंदर से जोर-जोर से दोनों के झगड़ा करने की आवाज आ रही थी। केसर सहमते हुए घर में घुसी।
टीचर जोर से चीखी जानवर नहीं हूँ मैं, इंसान हूँ इंसान ‘तुम्हारी भूख शांत करने की मशीन नहीं हूँ मैं।’
तू मुझसे धीरे बात कर, अपने पति से बात कर रही है भूल मत,
ऐसा भी क्या कर दिया मैंने जो रात से तमाशा बना कर रखा है तूने, अरे तेरे साथ नहीं सोऊँगा तो क्या बाहर की औरतों के पास जाऊँ। “हाँ, हाँ चले जाओ वही ठीक रहेगा, तीन दिन नहीं हुए मेरा मिस कैरेज को मेरी क्या हालत हो रही है जरा भी अहसास है तुम्हें।
मना क्या कर दिया तो हंगामा ही मचा दिया तुमने जबकि डॉक्टर ने तुम्हारे सामने ही कहा था कि अभी दोनों अलग-अलग ही रहना नहीं तो बच्चेदानी पर बुरा असर पड़ेगा।
केसर सब सुन रही थी उसका खून जमता जा रहा था जैसे उसे बोया की उस रात की हरकत याद आ रही थी। उसे टीचर जी का पति में बोया नजर आ रहा था उसकी आँखे भर आई।
तू उस डॉक्टर की बात सुनेगी या अपने पति की, कान खोलकर सुन ले जो मैं बोलूँगा वही होगा इस घर में।
ये मेरा घर है तेरा स्कूल नहीं समझी हरामखोर.. टीचर का पति जोर से चिल्लाया और दरवाजे को धड़ाम से खोलकर पैर पटकते हुए घर से बाहर चला गया। टीचर जी वहीं अपने बिस्तर पर फफककर रो रही थी।
केसर पोछे की बाल्टी लेकर उस कमरे में घुसी, टीचर जी को इस तरह रोते हुए उसने पहली बार देखा था ..उसकी आँखे भीग गयी उसने पास में रखी पानी के बोतल से गिलास में पानी भरकर टीचर को बढ़ाते हुए बोली पानी पी लीजिये नहीं तो तबियत खराब हो जाएगी।
टीचर जी के चेहरे को देखकर साफ पता चल रहा था कि टीचर जी को उनके पति ने मारा भी है । टीचर का चेहरा कमजोर और पीला दिख रहा था।
टीचर केसर की तरफ देखकर खुद को सँभालने लगी। टीचर जी आप ठीक तो हैं न?
हाँ मैं ठीक हूँ कहते हुए उसने अपने आँसू पोंछे।
उस दिन केसर को अपने अनपढ़ पति और टीचर के वकील पति में कोई अंतर नहीं लग रहा था। उसे टीचर में एक और केसर नजर आ रही थी।
इधर शाम को मैडम जी के बेटे की तबियत अचानक खराब हो गयी। वे लोग घर की चाबी केसर को देकर रातों रात बड़े शहर चले गए बेटे का इलाज कराने।
पीछे से घर की और उनके कुत्ते टॉबी की देखभाल केसर करती रही ।
मैडम जी अपने बेटे को लेकर एक हफ्ते बाद घर लौटे।
सब उदास दिख रहे थे ।
अब कैसे हैं भैया केसर ने मैडम जी से पूछा
नहीं ठीक नहीं .. उसकी किडनी में इन्फेक्शन हो गया है जो बहुत बढ़ गया है।
हे भगवान केसर ने घबरा कर कहा अब क्या होगा मैडम जी भैया का दूसरी किडनी लगानी पड़ेगी जल्दी से जल्दी। डॉक्टर ने बोला है देर नहीं करना है। कहते हुए मैडम जी रोने-सी लगी। केसर की आँखों के सामने मीरा का चेहरा घूम गया
दूसरे दिन मैडम ने केसर से कहा
केसर मुझे तुझसे एक बात करनी है
हाँ, बोलिए न मैडम जी
तू किसी से कहेगी तो नहीं
आपको मुझपर भरोसा नहीं क्या? केसर ने बड़ी जिम्मेदारी से मैडम जी से कहा नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है, पर मैं जो बात करने जा रही हूँ वो है ही ऐसी बात। आप बोलिए तो सही केसर ने भरोसा जताते हुए कहा। तू चाहे तो मेरे बेटे की जान बचा सकती है
मैं! केसर ने चौंकते हुए कहा, मैं कैसे मैडम जी
हाँ तू केसर तू
तू ही मेरे बेटे की जान बचा सकती है
केसर का सर घूमने लगा, वह चक्कर में पड़ गयी थी।
मैं भला एक गरीब औरत आपके बेटे की कैसे जान बचा सकती हूँ
बकरा भात के पैसे तो जुटा नहीं पा रही हूँ, आपका कर्जा भी कितना बाकी पड़ा है। मैं क्या कर सकती हूँ मैडम जी आप काहे मजाक कर रहीं हैं।
नहीं केसर नहीं, मैं सच बोल रही हूँ तेरा कर्जा भी माफ हो जाएगा और बकरा भात और पैसा बांटना भी हो जाएगा।
केसर की आँखे बड़ी हो गयी वो कैसे? मैडम जी।
तू अपनी एक किडनी मेरे बेटे को दे दे कहते हुए मैडम जी केसर के सामने लगभग गिड़गिड़ाते हुए रोने लगी। मेरे बेटे को बचा ले केसर मेरे बेटे को बचा ले ….
मैडम केसर का ब्लड ग्रुप जानती थी, एक बार बहुत बीमार होने पर केसर को खून चढ़ाना पड़ा था .. तभी से जानती थी और उनके बेटे का भी वही ब्लड ग्रुप था। इसलिए कहीं न कहीं उन्हें ये भी विश्वास हो रहा था कि उसकी किडनी भी मैच हो जाएगी।
और इसी भरोसे मैडम जी ने इतनी बड़ी मांग केसर के सामने रख दी।
केसर कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है।
उस दिन केसर चुपचाप अपना काम खतम करके घर लौट आई ।
उसके कान में बार-बार मैडम जी की बात गूंज रही थी ‘मेरे बेटे को बचा ले’
‘केसर मेरे बेटे को बचा ले’ ।
दूसरे दिन केसर मैडम जी के घर चुपचाप काम कर रही थी। उसके और मैडम जी के बीच एक गहरी चुप्पी घड़ी की सुई जैसी टिक-टिक कर रही थी।
वहाँ का आधा काम करके वह टीचर जी के घर गयी ..रास्ते में ही उसने तय कर लिया की वह टीचर जी से पैसे उधार लेकर बकरा भात करा देगी ।
टीचर जी एक बात करनी थी आपसे
हाँ बोल न केसर , क्या बात है
वो क्या हैं न आप तो जानती हो मेरे को बकरा भात कराना है।
हाँ याद है न तूने ही तो बताया था
टीचर जी मुझे पैसा उधारी देंगे क्या?
कितना पैसा केसर? टीचर जी ने पूछा
टीचर जी दो बकरा भात और सारे कुटुम्ब का पैसा बांटना में जितना लगेगा।
अरे केसर, ये तो बहुत हो जाएगा .. दो तीन हजार तक ही दे सकूँगी उससे अधिक तो बहुत मुश्किल है और तू तो जानती है हमारी स्थायी नौकरी नहीं है इस शहर में फिर मैं इतने पैसे नहीं फंसा सकती।
केसर का चेहरा उतर गया। वो रुआंसी होकर काम करने लगी।
शाम को मैडम जी के घर जब काम पर पहुँची तो मैडम जी ने उससे पूछा, तूने क्या सोचा है केसर?
जी, कहकर केसर रुक गयी जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं, तूने क्या सोचा है, ‘मेरे बेटे को लेकर’, मैडम जी ने अपनी बात दुहराई
उस दिन केसर ने किसी पकड़े गए खूनी की तरह खुद को सरेंडर कर दिया मैडम जी के सामने।
दस दिन बाद केसर के घर में पूरा शामियाना लगा था घर में मेहमानों की भीड़ मेले जैसी लग रही थी
पूरे आँगन में चारो तरफ खून फैला हुआ था दूसरी तरफ बड़े से भगोने में से छबीला, जायपत्री और लौंगफूल की खुशबू लिए धुंआ उठ रहा था।
बेटे नानबाबू ने जोर से गाना लगा रखा था जिस पर उसके हमउम्र लड़के और वो नाच रहे थे।
दूसरी तरफ भाना और उसका पति दोनों मिलकर लिफाफे तैयार कर रहे थे। एक बड़ी टोकरी भर लिफाफे तैयार हुए पड़े थे। और साथ ही एक झोले में कच्ची दारू की बहुत सारी भरी हुई बोतलें भी रखी थी।
दूसरे दिन सुबह-सुबह ही केसर अपना सामान बाँध चुकी थी। पास ही लिफाफों से भरी हुई टोकरी खाली पड़ी थी।
भाना वहीं सामने खड़ी थी उसने केसर को पूजा के फूल हाथ में देते हुए कहा। ये देवी को चढ़े फूल हैं इसे अपने पास ही रखना फिर दोनों गले लगकर रोने लगी और फिर केसर घर से निकल गयी।
गुड न्यूज! मिस्टर एंड मिसेज शर्मा सब मैच हो गया है,
बताते हुए डॉक्टर ने मैडम जी के पास खड़ी नर्स को एक फाइल दिया और कहा कल ही हम ऑपरेशन करेंगे।
केसर एक बहुत ही साफ-सुथरे बिस्तर पर लेटी हुई थी और उसे खून चढ़ रहा था।
केसर उस खून की चढ़ती हुई बोतल को एक टक देखे जा रही थी। उसमें उसे अपने आँगन में चारो तरफ फैला हुआ खून ही खून नजर आ रहा था और कानों में डीजे की आवाज आते-आते तेज हो चली थी। इसी बीच जाने कब उसकी आँख लग गई। जैसे बरसों बाद उसे नींद आई हो।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
