Hindi Kahani: “अभी एक साल पहले ही उनका विवाह हुआ था। मगर देखो किसी को कुछ भी पता नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। अभी विवाह के बाद कुछ वर्षों तक उन दोनों को माता – पिता के साथ में ही रहना चाहिए था आज के इस समय में संस्कार और सभ्यता का सिर्फ नाम ही बचा हुआ है उनको क्या दोष देना आजकल यह नया ज़माना और आधुनिकरण का रूप हो गया है “।
कॉलोनी के बगीचे में व्यायाम करते हुए पंकज जी अपने साथियों के साथ में बैठकर अपनी कॉलोनी में ही रहने वाले चतुर्वेदी जी के बारे में यह सब बातें सुन रहे थे। यह सब बातें सुनकर पंकज जी को बहुत बुरा लगता है और उनका मन व्याकुल होने लगता है। कुछ ही पलों के बाद वह अपने घर वापिस आ जाते हैं।
पंकज जी की धर्मपत्नी निर्मला जी कहती हैं – ” जी आज आप जल्दी आ गए आपकी तबीयत ठीक है “। पंकज जी कहते हैं – ” हांँ मेरी तबियत ठीक है निर्मला जी बस मेरा मन थोड़ा व्याकुल हो रहा है “। पंकज जी कॉलोनी के बगीचे में हुई सभी बातों को निर्मला जी को बता देते हैं।
निर्मला जी मुस्कुराते हुए कहती हैं – ” जी आपको लगता है हमारा शुभम अपनी अर्द्धांगिनी का ध्यान रखेगा तो वह ” जोरू का गुलाम ” बन जाएगा और फिर सभी उसे अपनी ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” कहकर बुलाएंगे। यह सब सिर्फ एक भ्रम है पति और पत्नी का रिश्ता बहुत पावन होता है और उसे निर्णायक बनकर निर्णय करने का अधिकार किसी के पास नहीं है।
पंकज जी यह सब सुनकर कहते हैं – ” निर्मला जी आपकी बात भी सही है मगर हमारा बेटा शुभम भी अगर चतुर्वेदी जी के बेटे की तरह हमें अकेला छोड़कर अपनी अर्द्धांगिनी के साथ चला गया तो क्या आपको बुरा नहीं लगेगा “।
निर्मला जी कहती हैं – ” जी शुभम और उसकी अर्द्धांगिनी का अपना एक संसार होगा और उन्हें उनका जीवन जीने का अधिकार है और हमारा भी एक संसार है क्या आपने मेरे और शुभम के लिए अपने माता – पिता को छोड़कर अलग संसार बनाया था नहीं तो फिर हमारा बेटा शुभम भी हमारे ही संस्कारों का सृजन है , हमें हमारे संस्कारों और प्रेम पर विश्वास रखना चाहिए “।
इतना कहकर निर्मला जी चाय और नाश्ता पंकज जी को देकर घर की बालकनी में लगे पौधों को पानी देने चली जाती हैं। पंकज जी एक गहरी साँस लेकर चाय – नाश्ता करने लग जाते हैं। कुछ पलों के बाद पंकज जी बैंक में अपने दस्तावेजों को जमा कराने के लिए चले जाते हैं। उनका मन सुबह की घटनाओं को भूलने लगा था जैसे मानो कोई बुरा सपना देखा है। वह अपने मन में कहते हैं – ” पति और पत्नी के पावन रिश्ते को लेकर सकारात्मिक और अच्छे विचारों को ग्रहण करना चाहिए कोई पति अगर अपनी पत्नि का ध्यान रखता है तो क्या वह ” जोरू का गुलाम ” हो जाता है और नहीं रखे तो वह बेकार हो जाता है। पति और पत्नि दोनों को एक – दूसरे का साथ देना चाहिए। शब्दों का चयन देखो ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” समाज को जाने क्या हो गया है “।
बैंक पहुँचकर पंकज जी ने मैनेजर से मिलने का निश्चय किया। बैंक का मैनेजर बैंक के कुछ ज़रूरी कार्य के लिए बाहर गया हुआ था। पंकज जी ने कुछ समय बैंक में ही रुकने का निश्चय किया अपना मन भटकने से रोकने के लिए पंकज जी ने अपने दस्तावेजों को देखना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों के बाद बैंक में हंगामा होना शुरू हो जाता है पंकज जी करीब जाकर देखते हैं तो उन्हें मालूम होता है कि अपने माता – पिता की इकलौती संतान ने अपने माता – पिता को धोखा देकर पूरी संपत्ति अपने नाम करके उन्हें घर से बाहर निकाल दिया है और अपनी अर्द्धांगिनी के साथ में विदेश चला गया है।
पंकज जी बहुत चिंतित होने लगते हैं। इस हंगामे को देख रहे कुछ लोग कहने लग जाते हैं कि आज का ज़माना बस यही है पहले माता – पिता अपना पूरा जीवन बच्चों के जीवन बनाने में लगा देते हैं और फिर वही बच्चे माता – पिता को घर से बाहर निकाल देते हैं। यही है आधुनिकरण का जीवन आजकल के लड़के ” जोरू का गुलाम ” होते हैं। सही कहा आपने भाई साहब ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” कहते हैं इन्हें आज के ज़माने में। संस्कारों की कमी है अगर संस्कार अच्छे होते तो यह सब नहीं होता। बच्चे माता – पिता को देखकर ही चलते हैं इन्होंने भी कुछ ऐसा ही किया होगा अपने माता – पिता के साथ में। चलो भाई अपना काम करते हैं यह तो एक आम बात है अब।
पंकज जी यह सब सुनकर बैंक से वापिस अपने घर की तरफ चल देते हैं। रास्ते में पंकज जी अपना ध्यान भटकाने के लिए बहुत कोशिश करते हैं मगर उनका मन बैंक में हुई घटना को उनके सामने लाकर पंकज जी को विचलित कर देता है। पंकज जी घर पहुँचकर निर्मला जी को बैंक में हुई घटना के बारे में बता देते हैं। निर्मला जी कहती हैं – ” जी आप बहुत चिंता कर रहे हैं इतनी चिंता आपको क्यों करनी है ? पूरी दुनिया एक जैसी नहीं होती है “।
पंकज जी कहते हैं – ” निर्मला जी मुझे बहुत डर लग रहा है अगर चतुर्वेदी जी के साथ में जो कुछ भी हुआ है वह हमारे साथ होता है तो मुझे अपना जीवन समाप्त करने करना होगा “। निर्मला जी कहती हैं -” आप थोड़ा सोच – समझ कर बोला कीजिए “।
पंकज जी अपने कमरे में चले जाते हैं। कमरे की बालकनी में कुछ पक्षियों का शोर होने लगा पंकज जी पक्षियों को भगाने के लिए बालकनी में जाते हैं तभी उनका ध्यान सामने वाली बालकनी में बैठे हुए एक दंपति की तरफ जाता है वह बहुत चिंतित नजर आ रहे थे। पंकज जी को निर्मला जी की बातें याद आने लगती हैं। एक नवविवाहित जोड़ा अपने घर – परिवार से दूर रहता है इनके कुछ रिश्तेदार इन्हें गलत कहते हैं लड़के को ” जोरू का गुलाम ” और ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” कहते हैं क्योंकि अपनी अर्द्धांगिनी की नौकरी के लिए उसने अपने माता – पिता को गाँव छोड़कर यहाँ शहर में अपनी अर्द्धांगिनी के साथ रहने निश्चय किया उन दोनों के हाथों में उनके माता – पिता की तस्वीर थी जिसे देखकर वह भावुक हो रहे थे। कुछ पलों बाद यह नवविवाहित जोड़ा बालकनी से अपने कमरे में चला जाता है।
पंकज जी इस नवविवाहित जोड़े के बारे में निर्मला जी से पूछते हैं ? निर्मला जी कहती हैं – ” यह नवविवाहित जोड़ा अभी कुछ महीने पहले ही यहाँ रहने आया है ” लड़का सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और लड़की पुलिस में है , पहले यह अपने गाँव में अपने माता – पिता के साथ में रहते थे मगर लड़की का स्थानांतरण यहाँ हो गया और उन्हें अपने माता – पिता को गाँव में अकेले ही छोड़कर यहाँ आना पड़ा। इनके रिश्तेदार लड़की को मतलबी और लड़के को ” जोरू का गुलाम ” और ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” नालायक कहते हैं। क्योंकि उन सभी ने सिक्के का एक रूप देखा है दूसरा रूप उन्होंने देखा ही नहीं है अब आप सोचो क्या यह गलत हैं ? “। पंकज जी कुर्सी पर बैठकर कहते हैं – ” एक गिलास पानी पीना है निर्मला जी आप रसोईघर में जाकर ले आओ। पंकज जी को एक गिलास पानी देकर निर्मला जी कहती हैं – ” चतुर्वेदी जी के परिवार का सिर्फ यही रूप सभी ने देखा है मगर उनके बच्चों ने उनके लिए जो कुछ किया है वह किसी ने नहीं देखा है “। पंकज जी का मन अब शांति का अनुभव करने लगा था जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं है पंकज जी अपने कमरे में आराम करने चले जाते हैं निर्मला जी यह देखकर थोड़ा खुश हो जाती हैं।
अगले दिन कॉलोनी के सभी सदस्य बगीचे में व्यायाम करने एकत्रित होने लगते हैं पंकज जी थोड़ा खुश नजर आ रहे थे किसी ने उनसे कहा – ” अरे पंकज जी आप इतना खुश क्यों नजर आ रहे हैं क्या हुआ है “। पंकज जी कहते हैं – ” अरे भाई कुछ नहीं यह वातावरण अच्छा लग रहा है “। कुछ ही पलों बाद चतुर्वेदी जी आ जाते हैं। पंकज जी चतुर्वेदी जी से कहते हैं – ” आपका बेटा और उसकी अर्द्धांगिनी बहुत अच्छी है देखो वह विदेश से अपने माता – पिता के लिये तोहफे लाने वाले हैं अपने माता – पिता को तनाव मुक्त करने के लिए सारी जिम्मेदारी उन दोनों ने स्वीकार करके अपने कर्तव्य का पालन किया है “।
आपका बेटा ” जोरू का गुलाम ” या फिर कोई ” अर्द्धांगिनी का परवाना ” नहीं बल्कि एक ईमानदार बेटा और पति है जो अपने माता – पिता के साथ में अपनी अर्द्धांगिनी का भी सहयोग करता है संस्कार बहुत अच्छे हैं आपके जी ” । सभी इस नए विचार का स्वागत करने लगते हैं। चतुर्वेदी जी के चेहरे पर ख़ुशी को देखकर पंकज जी को बहुत अच्छा लगता है।
