हिमालय की वादियां जितनी खूबसूरत है उतनी रहस्यमयी भी। हम लोगों में ज्यादातर लोग यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से ही वाकिफ है लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसी सच्चाई भी हैं जिनसे हम अनजान हैं। हिमालय की गोद में एक ऐसे ही रहस्य को समेटे हुए है रूपकुंड। नाम से बेहद खूबसूरत जान पड़ने वाली ये जगह असलियत में बेहद खौफनाक है। यहां हर तरफ सिर्फ और सिर्फ मौत दिखाई पड़ती है। हजारों फीट की ऊंचाई पर मौजूद ये वो झील है, जिसके अंदर एक पूरा कब्रिस्तान है। ये झील अपनी गहराई में सैकड़ों इंसानों को दफना चुकी है।
इसी हिमालय की पर्वत श्रृंखला त्रिशूल तथा नन्दाघाटी के नीचे स्थित है। यह वही पवित्र स्थान है जहां हर बारह साल में नन्दा देवी राजजात की यात्रा का अंतिम पड़ाव पड़ता है। यहां के बाद यह कहा जाता है कि यही से ही सीधे स्वर्ग का मार्ग जाता है।
600 साल से रहस्य बना हुआ है
उत्तराखंड राज्य में स्थित एक हिम झील है जो अपने किनारे पर पाए गये पांच सौ से अधिक कंकालों के कारण प्रसिद्ध है। इसे रूपकुंड या कंकालों की झील के नाम से भी जाना जाता है। यह नंदादेवी राजजात यात्रा मार्ग पर यह एक चर्चित रहस्यमयी स्थान है। इस बर्फीली झील के आस-पास सैकड़ों नरकंकाल बिखरे पड़े हैं। जो इस जगह को और भी भयानक बना देते है। एक अनुमान के मुताबिक, इन नरकंकालों की संख्या 500 से ज्यादा है। इनका रहस्य 600 वर्ष पुराना है। सालों तक यह कुंड दुर्गम होने की वजह से अज्ञात रहा था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वैसे तो रात में इधर से गुजरने की किसी की भी हिम्मत नहीं होती लेकिन अगर कोई गलती से भी गुजर जाए तो ये जगह उसे वापस नहीं जाने देती।
साल 1942 हुई थी इस जगह की खोज
एक बार वन विभाग के अधिकारी साल 1942 में दुर्लभ पुष्पों की खोज करते-करते यहां पहुंचे। लेकिन जब उन्होंने इतनी संख्या में नर कंकालों को देखा तो उन्हें लगा कि वह किसी दूसरे ही लोक में आ गए हैं। उनके साथी तो इस दृश्य को देखकर डरकर भाग गए। वाकई दूर से दिखने वाली ये बेहद खूबसूरत जगह अन्दर से वाकई खौफनाक है।
शिव ने पार्वती के लिए बनाया था रूपकुंड
एक कहावत यह भी है कि यहां से ही भगवान शिव पार्वती को कैलाश की ओर ले गए थे। जब रास्ते में पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस पर्वत पर एक झील बना डाली थी जिसका पानी पीकर पार्वती ने अपनी प्यास तो बुझाई थी वही इस झील में अपने प्रतिविंब को देखकर पार्वती ने इसे ही रूपकुण्ड का नाम दिया था।
नंदादेवी के प्रकोप का परिणाम
इन कंकालों के पीछे की हकीकत तो कोई नहीं जानता लेकिन इनसे संबंधित एक पौराणिक मान्यता जरूर लोगों को चौंका रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक बार कन्नौज के राजा यशोधवल नंदादेवी के दर्शन के लिए सदल-बल प्रस्थान किया। गढवाल हिमालय के इस पावन क्षेत्र की धार्मिक यात्रा के नियमों एवं मर्यादाओं की घोर उपेक्षा की। राजा अपनी गर्भवती रानी व दास-दासियों सहित तमाम लश्कर दल के साथ त्रिशूली पर्वत होते हुए नंदादेवी यात्रा मार्ग पर स्थित रूपकुंड में पंहुचे। नंदादेवी के दोष के परिणामस्वरुप वहां अचानक भयंकर वर्षा और ओलावृष्टि हो गई। सभी यात्री दल उस बर्फानी तूफान में फंस गये और दबकर मर गये। ये नरकंकाल और अस्थियां आदि वस्तुऐं उसी समय के बताए गये हैं।
आज तक नहीं उठा रहस्य से पर्दा
हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों के बीच बसा रूपकुंड भी ऐसे ही रहस्यों को समेटे हुए हैं, जिन्हें सुलझा पाना शायद किसी के लिए भी सरल नहीं है। ये इंसान कौन थे? इनकी मौत कैसे हुई? ये झील तक कैसे आए? देखते ही देखते ये झील कंकालों की झील कैसे बन गई? अफसोस, आज भी ये एक राज़ ही है।
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