बचपन में मुझे घूमने का बहुत शौक था, खासकर पापा के स्कूटर पर पीछे बैठ कर। पापा भी मेरी इस पसंद से अच्छी तरह से वाकिफ थे इसलिए वो अक्सर मुझे अपने स्कूटर पर बैठा कर सैर कराते थे। एक दिन पापा किसी जरूरी काम से बाहर जा रहे थे। जब उन्होंने अपना स्कूटर घर से बाहर निकाला मैं उनसे पूछ बैठी, ‘पापा, आप कहां जा रहे हैं? पापा को मेरा इस तरह से पीछे से टोकना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने गुस्से से कहा, ‘जहन्नुम जा रहा हूं। मुझे लगा कि शायद ये कोई नई जगह है, मैंने पापा से कहा, ‘पापा मैं भी आपके साथ चलूंगी। पापा गुस्से में थे। उन्होंने मुझसे अंदर जाने को कहा। उस समय तो मैं चुप हो गई, पर जहन्नुम जाने की उत्सुकता मेरे मन में सदा बनी रही। मैं जब-तब पापा से वहां से चलने की जिद करती। आखिरकार एक दिन पापा को मुझे जहन्नुम शब्द का अर्थ बताना ही पड़ा। साथ ही पापा ने मुझसे भविष्य में कभी ऐसी गलत बात न कहने का वादा भी किया।

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