गुलाबो जल्दी-जल्दी काम निपटा रही थी। कल त्योहार था। उसने कल की छुट्टी और कुछ रुपये मालकिन से मांगे थे। मालकिन ने उसे यह कह कर मना कर दिया कि कल कुछ मेहमान दोपहर भोजन पर आने वाले हैं। दोपहर को कम से कम एक टाइम आकर काम कर दे।

उसे मनुवा की याद आ रही थी। वह दो दिन से मिठाई, पटाखे व नए कपड़े के लिए जिद कर रहा था। सोच रही थी कि कल सारा काम निपटा कर मालकिन का मूड देख कर पैसे मांगेगी।

उसने मनुवा से वादा किया था कि वह कल उसके लिए कपड़े, मिठाई, और पटाखे जरूर लाएगी। मनुवा की पीली पड़ी आंखों में चमक देख कर उसे अच्छा लगा था।
सुबह से ही लोग नए कपड़े पहन कर घूम रहे थे। वह आज काम पर जल्दी निकल आई थी। मालकिन के घर मीठे पकवानों के बनने की सुगंध आ रही थी।

मालकिन के बेटे राजू ने नए कपड़े पहन रखे थे। उसने मुस्कुरा कर राजू को गोद में लेकर चूम लिया। फिर वह अपने काम में व्यस्त हो गई।

दोपहर बीतने को थी, फिर भी मेहमानों का आना-जाना लगा था। उसके मन में बेचैनी थी, लेकिन मालकिन की व्यस्तता देख कर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी पैसे मांगने की। उसका सारा ध्यान मनुवा की तरफ था।

झोपड़ी के बाहर वह सबको नए कपड़े पहने देख कर मचल रहा था। उसे भूख भी लगी होगी। उसे खड़ा देख कर मालकिन ने आवाज लगाई, ‘अरे गुलाबो, जरा जल्दी-जल्दी हाथ चला, उधर खड़ी क्या देख रही है?

वह रसोई में आ गई। मिठाइयों का ढेर देख कर उसकी इच्छा हुई कि मिठाइयों के कुछ टुकड़े अपने पल्लू में छिपा ले, पर उसने ऐसा नहीं किया। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसे मनुवा की याद आ रही थी।

चार बजने को थे। उसने हिम्मत कर मालकिन से पैसे मांगे, मालकिन ने कहा, ‘पहले पूरे बर्तन साफ कर ले, फिर पैसे देती हूं।

वह बर्तन साफ करते हुए सोच रही थी कि आज घर लौटते हुए फिर शाम हो जाएगी और मनुवा रोते-रोते सो जाएगा, सोचते हुए एक बार फिर उसकी आंखें बेबसी के आंसू से भर आई। 

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