……………. उसका मन किया कि वह शोर मचा-मचाकर बताए कि देखो, एक गरीब और असहाय अबला की आह ने क्या रंग दिखाया। एक राजा तड़प रहा है, प्रेम की आग में झुलस रहा है, जल रहा है और जलता रहेगा जब तक कि प्रेम की यह आग इसको जलाकर भस्म न कर दे, राख न कर दे। यह राजा नहीं रहेगा, इसका राज्य नहीं रहेगा। एक दिन इसका राजमहल गिरकर चूर-चूर हो जाएगा। हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा। परंतु वह ऐसा नहीं कर सकी। दिल के अंदर जाने कौन-सी ऐसी ताकत थी, जिसने लपककर उसके होंठों पर ताला डाल दिया। वरन् उसकी आंखें उदास हो गयी। दिल में मानो आरी चल रही थी।
राजा विजयभान सिंह को उसकी ख़ामोशी से उत्साह मिला। उसकी उदासी के पीछे उन्हें अपने प्रति सहानुभूति प्रतीत हुई। वह बोले‒‘आज मेरी मंगनी का दिन है‒एक राजकुमारी के साथ, लेकिन मैं चाहता हूं कि आए हुए मेहमानों के सामने तुम्हें ले जाकर खड़ा कर दूं। सभी को साक्षी रखकर तुम्हारा हाथ पकड़ लूं। राधा! मैं तुम्हें अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहता हूं।’
राधा तब भी कुछ न बोली। उसने राजा विजयभान सिंह की आंखों में झांका। क्या कभी ऐसा भी संभव है? एक राजा, एक ऐसा राजा जिसके लिए लड़कियां खेल-तमाशे ही रही हों, सुंदरियां खिलौने के समान मज़ाक बनती आई हों, वह एक साधारण गरीब गांव की गोरी से प्रेम करेगा? क्या वह उसे अपनी पत्नी बना सकता है?
‘मेरा विश्वास करो राधा…!’ राजा विजयभान सिंह फिर बोले‒‘मैं अपने बाप-दादा के समान नहीं हूं, जो विवाह के बाद भी दूसरी लड़कियों से आनंद उठाना अपनी शान समझूं। तुम चाहोगी तो मैं अपनी सारी जायदाद, राज्य, राजमहल सब कुछ त्याग दूंगा। जहां चाहोगी वहां चला चलूंगा। केवल मुझे क्षमा कर दो, क्षमा करके मुझे अपना बना लो राधा।’ उनकी आवाज़ भर्रा गई। आंखें भीग गईं। क्षमा के लिए उन्होंने वास्तव में उसके आगे अपने हाथ जोड़ दिए थे।
राधा ने देखा, उनके बढ़े हुए हाथ की अंगुलियों में बहुमूल्य हीरों की अंगूठी हैं, परंतु एक अंगूठी चांदी की भी है, बाएं हाथ की छोटी अंगुली में, जिस पर उसका नाम खुदा है‒राधा। उसे सख्त आश्चर्य हुआ।
‘यह अंगूठी अब तभी मेरी अंगुली से उतरेगी, जब तुम मुझे क्षमा कर दोगी।’ उन्होंने राधा के मन का भाव समझकर अपने-आप ही कहा‒‘और जब इसे वापस स्वीकार करके तुम अपनी अंगुली में पहन लोगी तो मैं समझूंगा कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार का स्थान बन चुका है। बाएं हाथ की अंगुली में मैंने इसे इसलिए पहन रखा है, क्योंकि यही मेरा सीधा हाथ है, सारा काम मैं इसी हाथ से करता हूं, इसलिए इस अंगूठी को भी इतना महत्त्व दे रखा है। तुम्हारे बाकी सभी गहने मेरे पास सुरक्षित हैं। मेरे लिए वे देवी की मूर्ति की तरह ही पवित्र हैं।’
राधा ने अपनी घनी पलकें नीचे झुका लीं। राजा विजयभान सिंह को उत्साह की दूसरी कड़ी मिली। घुटनों के बल झुकते हुए उन्होंने अपने दाहिने हाथ द्वारा उसकी पीठ से होकर उसकी बांह थाम ली, बाएं हाथ द्वारा उसके दाहिने हाथ को हथेली में फूल के समान रख लिया, फिर बोले‒‘राधा! मुझे क्षमा कर दो…।’ उनका स्वर पहले से भी अधिक भीगा हुआ था।
राधा के होंठ कांप गए। जाने कौन-सी ऐसी बात थी कि राजा विजयभान सिंह से सख्त घृणा करने के पश्चात् भी उसके दिल पर बरछियां चल गईं। उसकी पलकों पर ठहरी मोटी-मोटी बूंदें गालों पर मोती की लड़ियां बनकर लुढ़क आईं‒ फिर हवा का दामन थामकर राजा विजयभान सिंह की आंखों का हार बन गईं।…..
…………‘इस संसार में हर वस्तु परिस्थिति की गुलाम है राधा!’ राजा विजयभान सिंह ने फिर कहा‒‘और इसी परिस्थिति में पड़ने के बाद मैं भी अपने बाप-दादा की एक कड़ी बनकर दूसरों पर जुल्म ढाता चला गया। यह भी एक परिस्थिति ही है कि आज मैं तुम्हारे प्यार का भूखा हूं, तुम्हारे लिए तड़प रहा हूं। यदि तुम शुरू में ही मुझसे घृणा नहीं करतीं, मुझे क्षमा कर देतीं तो शायद मेरी यह दीवानगी इस कदर नहीं बढ़ती। आज तुमने मेरे अंदर जीवन का नया प्रकाश उत्पन्न किया है तो इस पर चलने की शक्ति भी मुझे प्रदान करो। मैं इस राह से कभी नहीं भटकना चाहता। राधा! मेरा साथ दो, मुझे अपना बना लो, ताकि तुम्हारे हाथ थामे-थामे मैं अगिणत अच्छी मंजिलें प्राप्त करता चला जाऊं। मेरे पापों का प्रायश्चित हो सके।’
राधा के होंठों पर एक सिसकी उभरने को तड़प उठी तो वह सामने की ओर देखने लगी। अचानक ही वहां एक घायल बाज आ गया था, जो उड़ नहीं सकता था, शायद उसके पंख टूटे हुए थे। केवल पैरों के बल फड़फड़ाते हुए चलकर शायद वह कोई पनाह ढूंढ लेना चाहता था। सहसा बच्चों का शोर बुलंद हुआ। वे पत्थर द्वारा बाज का पीछा कर रहे थे। संभवतः इस बाज ने किसी पक्षी को घायल किया था।
राधा ने घबराकर अपने हाथ छुड़ा लिए। भटकी हुई हिरणी के समान उसने इधर-उधर देखा और फिर वहां से भाग गई चुपचाप, बहुत ख़ामोशी के साथ। राजा विजयभान सिंह की एक भी बात का उत्तर नहीं दे सकी और राजा विजयभान सिंह उसी प्रकार घुटनों के बल बैठे रह गए। जब खड़े हुए तो राधा दूर जाकर एक टीले से उतरते हुए ओझल हो रही थी। उन्होंने एक गहरी सांस ली… मानो जीवन की एक किरण फूटकर निकल आई हो। घोड़े को संभालकर उन्होंने ऐड़ लगाई और अपने इलाके की ओर चल पड़े। छोटे-छोटे बच्चे आश्चर्य से खड़े होकर उन्हें देख रहे थे। वह हल्के से होंठ दबाकर मुस्करा दिए।
जिस समय वह राजमहल वापस पहुंचे तो शाम हो रही थी, परंतु उन्होंने समय की पाबंदी का ज़रा भी विचार नहीं किया। उनके दिल में यह विश्वास समा चुका था कि कोशिश करने पर वे राधा से क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। उसका मन जीत सकते हैं, उसे अपना सकते हैं और अब इसी विश्वास के सहारे वह सारी दुनिया को ठुकराने के लिए तैयार थे। लौटते समय उनके चेहरे पर एक विचित्र सी शांति की छाया अंकित थी।……………
आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय….
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