………….. फादर ने उन्हें गौर से देखा।

 ‘फादर!’ विजयभान सिंह ने एक गहरी सांस लेकर कहा‒ ‘मैंने भी अपने पापों से ऐसी ही तौबा की है, बल्कि अब प्रायश्चित भी कर रहा हूं, जिसका जितना बिगाड़ा है, उसकी उतनी भरपाई भी कर रहा हूं और भी अधिक करना चाहता हूं ताकि…ताकि कम-से-कम एक बार ही वह मुझे क्षमा कर दे।’

 फादर ने विजयभान सिंह को गौर से देखा। ‘आप किसकी बात कर रहे हैं?’

 ‘मैं राधा की बात कर रहा हूं फादर! राधा की।’

 ‘राधा!’

 ‘जी हां! वही राधा, जो इस समय आपके अस्पताल में भर्ती है, जिसकी जान बचाकर आपने उस पर नहीं, मुझ पर भी बहुत बड़ा अहसान किया है।’

 ‘लेकिन…।’ फादर सोच में पड़ गए। जो कुछ राधा ने विजयभान सिंह के लिए बताया था, वह तो सत्य था, परंतु यह सत्य प्रतीत नहीं हुआ कि विजयभान सिंह उसको लूटने के लिए ही पीछा कर रहा है और फिर लूटने के लिए राधा ही क्यों उसे दरकार है? यह बात उनकी समझ में नहीं आई। उन्हें विश्वास होने लगा कि विजयभान सिंह वास्तव में दिल की गहराई से ही उसे चाहता है‒प्यार करता है। विजयभान सिंह की तौबा सच्ची है। विजयभान सिंह वास्तव में परिवर्तित है। इतिहास साक्षी है कि एक साधारण लड़की की छोटी-छोटी अदाएं भी संसार के बड़े-से-बड़े राजाओं को इस प्रकार भायी हैं कि उन्होंने अपने राज्य का त्याग कर दिया।

 ‘राजा साहब!’ फादर ने कहा‒‘मेरे दिल में राधा ने जो बात उत्पन्न की थी, उसके अंतर्गत मैंने उसे यहां से चले जाने दिया।’

 ‘क्या राधा चली गई?’ विजयभान सिंह के दिल पर जैसे किसी ने घूंसा मार दिया।

 ‘हां। मुझे नहीं मालूम था कि आप इस कदर बदल चुके हैं। उसने तो मुझे अपनी कहानी सुनाते समय आपके विरुद्ध इतनी अधिक घृणा प्रकट की थी कि मैं स्वयं भी…।’ फादर कहते-कहते चुप हो गए।

 ‘उसने जो कुछ भी कहा है, वह सत्य ही है।’ विजयभान सिंह ने बहुत गंभीर होकर कहा‒ ‘वह कभी इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहती कि मैं बदल चुका हूं। विश्वास करने का कोई प्रश्न ही नहीं होता। मुझ पापी ने उसके साथ क्या बुरा नहीं किया?’ उसकी आंखें भीग गईं।

 ‘सुबह का भूला यदि शाम को घर लौटे तो उसे भूला नहीं कहते।’ फादर को उनसे सहानुभूति हुई। ‘राधा दिल्ली में है‒फादर फ्रांसिस के पास। मैं उससे स्वयं मिलूंगा। उसे समझाऊंगा अपने गुनहगार को क्षमा कर देने से बड़ा पुण्य इस संसार में कोई नहीं।’ फादर ने अपनी दृष्टि दीवार पर टंगी एक बड़ी तस्वीर पर गाड़ दी, जहां यीशु मसीह रोमन सिपाहियों के सामने सलीब पर लटके अपना दम तोड़ रहे थे। उनके अंतिम वाक्य में से एक पंक्ति इस तस्वीर के नीचे लिखी हुई थी‒‘हे प्रभु! इन्हें क्षमा कर दें, क्योंकि ये नहीं जानते इन्होंने किया क्या है।’ यह वाक्य उन्होंने उन रोमन सिपाहियों के लिए कहा था, जिन्होंने उन्हें सताने के बाद सलीब पर लटका दिया था।

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विजयभान सिंह ने भी नज़र फेरकर इस वाक्य को पढ़ा। फिर कुछ सोचते हुए कहा‒ ‘आप हमें उसका पता दे दीजिए। हम स्वयं उस पर अपना प्रभाव डालने का प्रयत्न करेंगे। मैं उसे नहीं उसका दिल, उसकी आत्मा जीतना चाहता हूं। मैं चाहता हूं वह मुझे किसी सिफारिश पर क्षमा नहीं करे, दिल की गहराइयों से मेरी इज्जत करे, जैसा कि मैं उसके लिए करता हूं और फिर यदि आपने मेरी खातिर उससे कुछ कहा तो संभवतः वह एक बार फिर वहां से भाग निकलेगी। उसे मुझसे इतनी अधिक घृणा हो चुकी है कि इस घृणा को प्यार में बदलने के लिए अब मुझे ही कोई ऐसा कार्य करना पड़ेगा, जो उसके दिल पर एक गहरा प्रभाव डाल सके।’

 फादर जोजफ ने अपने नौकर को कुछ इशारा किया। फिर विजयभान सिंह की ओर पलटे‒‘आप ठीक कहते हैं। मनुष्य जब किसी को दिल की गहराई से चाहता है, तो यही इच्छा करता है कि उसका सब कुछ दिल, दिमाग, उसकी सोच-फिक्र, उसके स्वप्न तक केवल उसी के लिए सुरक्षित हों। मरते-मरते भी उसके होंठों पर केवल उसी का नाम रहे, जो उसे दिल की गहराई से प्यार करता है। राधा का मन यदि आप इस प्रकार जीतना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको बड़ी तपस्या करनी पड़ेगी। बहुत सब्र से काम लेना पड़ेगा।’

 ‘मैं उसके लिए सब कुछ करने को तैयार हूं फादर!’ विजयभान सिंह ने बहुत भावुक होकर कहा‒‘उसके लिए मैं अपना सब कुछ बर्बाद कर दूंगा। सब कुछ लुटा दूंगा। केवल वह मुझे क्षमा कर दे। दिल की गहराई से मुझे प्यार करने लगे। मैं उसके सपनों में समा जाऊं‒वह मेरे प्रति दीवानी हो जाए।’

 ‘इसके कई रास्ते हैं…।’ फादर ने कुछ सोचकर कहा।

 विजयभान सिंह ने आशा से आंखें बिछाईं। प्रताप सिंह पूरे समय ख़ामोश ही रहा, परंतु कान-आंखें उसकी सदा ही हरकत में थीं।

 तभी नौकर ने कॉफी की ट्रे सामने लाकर रख दी। नौकर तौर-तरीके जानता था, इसलिए पहले उसने ट्रे विजयभान सिंह की ओर बढ़ाई, फिर प्रताप सिंह की ओर। अंत में फादर की ओर बढ़ाकर कप थामने के बाद ट्रे वहीं एक मेज़ पर रखकर वह चला गया। फादर हाथ में प्याला लिए विजयभान सिंह के कॉफी पीना आरंभ करने की प्रतीक्षा करते रहे, परंतु वह कॉफी की चुस्की लेने के बज़ाय फादर की बात का बहुत बेचैनी से इंतज़ार कर रहे थे। नौकर को कॉफी भी इसी समय लानी थी।

 ‘शुरू कीजिए।’ फादर ने उनके खोयेपन से प्रभावित होकर कहा और विजयभान सिंह ने लज्जित होकर झट अपने होंठ प्याले से लगा दिए।

 ‘हां, तो मैं कह रहा था…।’ फादर जोजफ ने भी एक चुस्की ली और कहा‒ ‘राधा का दिल जीतने के लिए भी कई रास्ते हैं। मेरा मतलब, राधा एक गरीब लड़की है। उसका बाबा एक खुद्दार आदमी है, जो अकारण किसी प्रकार की सहायता स्वीकार करना पसंद नहीं करता। इसलिए आप चाहें तो उन दोनों की ही कठिनाइयां दूसरे तरीकों से हल कर सकते हैं। राधा के बाबा एक मूर्तिकार हैं, आप चाहें तो उनकी मूर्तियां किसी विश्वास योग्य आदमी के द्वारा अधिक-से-अधिक दाम पर ख़रीद सकते हैं। उसे कोई अच्छा काम दिला सकते हैं। राधा आपके बच्चे की मां है। आप चाहें तो उस बच्चे को अच्छी-से-अच्छी ट्रेनिंग किसी दूसरे के बहाने दिला सकते हैं। उसे पढ़ा सकते हैं, पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप इत्यादि का प्रबंध हो सकता है। रास्ते तो आपको कई मिल जाएंगे, परंतु इन पर चलने वाला भी तो होना चाहिए। आपकी इस प्रकार की सहायता से राधा को किसी बात का पता भी नहीं चलेगा और जब बात बहुत आगे बढ़ जाएगी तो एक दिन यह राज़ अपने आप ही खुल जाएगा। सत्यता किसी साक्षी की मोहताज़ नहीं होती, जब राधा को मालूम होगा कि आपने निःस्वार्थ छिप-छिपकर ऐसा किया है, उसका जीवन सुधार दिया, उसके बच्चे का भविष्य बनाने में कोई कमी नहीं रखी, तो निश्चित है यह सारी घृणा अचानक ही अपने आप उस समय एक अथाह प्यार के सागर में परिवर्तित हो जाएगी। वह दौड़कर आपके कदमों में आ गिरेगी। आपसे अपनी गलती के लिए रो-रोकर क्षमा मांगेगी। अपने आंसुओं से आपके चरण धोना अपना सौभाग्य समझेगी।’

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‘उफ! बस-बस फादर, बस मुझे राधा का ऐसा ही प्यार चाहिए। ऐसी ही चाहत मैं अपने प्रति उसके दिल में प्रतीत करना चाहता हूं।’ विजयभान सिंह तड़प उठे। इस तड़प में कितनी मिठास थी, इस मिठास में सपनों की एक दुनिया थी, इस दुनिया में प्यार-ही-प्यार था‒केवल प्यार‒राधा उन्हें इसी प्रकार प्यार करे, बिलकुल इसी प्रकार, इस आस-भरे सपने में कितना बड़ा विश्वास था‒कितना बड़ा विश्वास!

 प्रताप सिंह की आंखें भी चमक उठीं। फादर जोजफ द्वारा दी हुई सलाह की उसने दिल-ही-दिल में प्रशंसा की। अब तो कोई कारण नहीं कि राधा का मन विजयभान सिंह जीत न सके। अपनी मूंछों को ताव देकर वह दबे होंठों मुस्कराया।

 कॉफी ठंडी हो चुकी थी, फिर भी उन्होंने इसे बहुत चाव से पिया, दिल को संतोष हो तो ज़हर भी अमृत बन जाता है, फिर यह तो कॉफी थी।

 कुछ देर और बातें करने के बाद विजयभान सिंह ने एक कागज का ‘रोल’ फादर जोजफ की ओर बढ़ाया।

 ‘यह क्या है?’ उन्होंने इसे लेते हुए उत्सुक होकर पूछा।

 ‘आपके अस्पताल के लिए यह हमारी एक छोटी-सी भेंट है।’ विजयभान सिंह ने कहा।

 ‘भेंट!’

 ‘जी हां! आपके अस्पताल के पीछे जो हमारी हवेली है, उसे हम आपके सुपुर्द कर रहे हैं ताकि अस्पताल की वृद्धि में उसे भी सम्मिलित कर लिया जाए।’

 ‘ओह।’ फादर ने उनसे हाथ मिलाकर धन्यवाद दिया। फिर बोले, ‘अस्पताल को एक बनी बनाई इमारत मिल गई। और हमें क्या चाहिए! यूं भी हम शीघ्र ही अस्पताल बढ़ाने की योजना बना चुके थे।’

 ‘तब तो बहुत मौके से हमने इसे आपके हवाले कर दिया है।’ विजयभान सिंह ने मुस्कराने का प्रयत्न किया।

 ‘बेशक…।’

 ‘फादर…।’ अचानक विजयभान सिंह ने एक गहरी सांस लेकर समीप रखी यीशु मसीह की मूर्ति को देखा। बोला‒ ‘क्या इसे राधा के बाबा ने तो नहीं बनाया है?’

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