‘मेम साहब… मेम साहब, जल्दी बाहर आइए…, सकूबाई की आवाज सुन कर नंदनी भाग कर बाहर आई। उसने देखा गली में घूमने वाली पगली दरवाजे पर बेहोश पड़ी थी।

‘लगता है रात को ठंड से मर गई सकूबाई ने कहा। नंदनी ने सकुचाते हुए उसके पास जाकर देखा उसकी सांस चल रही थी। नंदनी ने अपनी पेईंग गेस्ट वृंदा को, जो एक डॉक्टर थी, आवाज दी। वृंदा ने आकर देखा और बताया कि सर्दी के कारण तेज बुखार की वजह से वह बेहोश हो गई है। नंदनी भागकर कंबल ले आई। वृंदा ने उसे एक इंजेक्शन लगा दिया, पगली को कंबल ओढ़ा कर दोनों अंदर आ गईं।

वृंदा को अस्पताल जाना था, वह तैयार होकर नाश्ते की टेबल पर आ गई। दोनों नाश्ता करते हुए पगली के बारे में ही बातें कर रही थीं, कि सकुबाई ने आकर बताया कि पगली को होश आ गया है और वह रो रही है। दोनों भाग कर बाहर आईं। नंदनी ने सकूबाई से चाय नाश्ता लाने को कहा। नाश्ते की प्लेट देखते ही पगली के चेहरे पर चमक आ गई। वह ऐसे खा रही थी मानो बरसों की भूखी हो। खाते-खाते वह उन दोनों की तरफ एक मूक पक्षी की तरह देख रही थी, जैसे आंसुओं से आभार प्रकट कर रही हो।

अगले दो दिन तक पगली वहीं बैठी रही। नंदनी उसको दवा दे देती और वो हर चीज आराम से खा-पी लेती। पगली जब पूर्णत: स्वस्थ हो गई तो वृंदा ने कहा, ‘नंदनी, अगर आप चाहें तो इसे आंगन में ले आएं और नहला कर साफ कर दें। इतनी गंदी है कि छूने में भी कोफ्त होती है। फिर सकूबाई की मदद से उसे नहलाकर उसके बाल धो कर नए कपड़े पहना दिए। पगली भी आराम से तैयार हो गई। सकूबाई ने उसके लंबे काले घने बालों में तेल लगा कर चोटी बांध दी, उसके इस संवरे रूप को देख कर नंदनी आश्चर्यचकित रह गई। 20-22 साल की सांवली, तीखे नैन-नक्श वाली लड़की को देख कर वह सोचने पर मजबूर थी कि इसकी यह हालत कैसे हुए। नंदनी ने उससे उसके बारे में जानना चाहा, पर शायद वह सुन बोल नहीं सकती थी, परंतु आंखें शुक्रिया अदा करती थीं। अब पगली वहीं एक कोने में पड़ी रहती। एक दिन नंदनी घर पर नहीं थी, सकूबाई ने उसे खाना दिया, खाना खाने के बाद वह बाहर निकल गई।

सकूबाई ने सोचा घूमकर आ जाएगी। रात हो गई लेकिन पगली नहीं आई। सुबह वृंदा नाईट डयूटी के बाद वापिस आई तो उसने नंदनी को बाहर बुलाया। बाहर का दृश्य देख कर नंदनी की चीख निकल गई। पगली दरवाजे के पास पड़ी थी। अस्त-व्यस्त कपड़े और बिखरे बालों ने सारी कहानी कह दी। उसके शरीर के साथ-साथ आत्मा भी घायल हो चुकी थी। उसने एक लुटे हुए सौदागर की भांति नजरें उठाईं और कुछ इशारा करते हुए चीखकर रो पड़ी। जैसे एक मासूम चिडिय़ा को कई बाजों ने मिल कर नोच खाया हो। नंदनी का हृदय घृणा से भर गया। जालिमों ने पगली को भी नहीं छोड़ा। शायद इसका संवरना ही इसका दुश्मन बन गया, गंदी थी तो कोई छूता भी नहीं था। वह स्वयं को कोसने लगी, ‘क्यूं संवारा मैंने इसको? वृंदा और नंदनी ने पगली का हाथ पकड़ा और अंदर ले आई। वह दर्द से कराह रही थी, उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। उन्होंने उसके हाथमुंह धुलवाए, वृंदा ने मरहम पट्टी करके साफ कपड़े पहना दिए।

अब पगली बिल्कुल शांत एक कोने में बैठी रहती, सिर्फ आकाश को देखती रहती और रोती रहती। इसी बीच नंदनी का भाई भानू भी अपना तबादल करवाकर दिल्ली आ गया। भानू बैंगलूर में एक सीनियर डॉक्टर था, एक हवाई दुर्घटना में मां-बाबूजी दोनों के देहांत हो जाने की वजह से नंदनी अकेली रह गई थी, इसीलिए भानू भी यहीं आ गया। भानू पगली को देखकर चौंक गया, जब नंदनी ने सारी घटना बताई तो उसे बहुत दु:ख हुआ। पर फिर भी वह पगली को घर में रखने को तैयार नहीं था। वृंदा और नंदनी के आग्रह से वह मान गया। नंदनी एम.ए. कर रही थी, उसकी परीक्षा नजदीक थी। पगली को सकूबाई ही खाना देती, नंदनी आते-जाते उसे देख लेती। परीक्षा समाप्त होने के बाद वह नौकरी के लिए इंटरव्यू की तैयारी में लग गई। पगली की तरफ से ध्यान हट गया।

एक दिन सकूबाई ने वृंदा को बताया कि पगली का पेट कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। वृंदा ने जांच की तो बताया कि पगली मां बनने वाली है। नंदनी घबरा गई, अब क्या करे? वृंदा ने सुझाया कि अभी वक्त है, जब प्रसव का समय आएगा तो मैं अपने अस्पताल ले जाऊंगी। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। कुछ ही दिन बीते, एक रात पगली की चीखें सुनकर वृंदा की नींद खुली। नंदनी भी उठकर आ गई। वृंदा ने बताया कि पगली समय से पहले ही बच्चे को जन्म दे सकती है। भानू भी आवाज सुन कर आ गया। उसने गाड़ी निकाली, ‘चलो इसे अस्पताल ले चलते हैं भानू ने कहा।

परंतु वृंदा ने मना कर दिया कि अब समय नहीं है। थोड़ी ही देर में पगली ने एक बच्ची को जन्म दिया। वृंदा और भानू बच्ची को लेकर अस्पताल चले गए। उधर उसी समय पगली ने दम तोड़ दिया। भानू ने वापिस आकर पगली का शव पुलिस को सौंप दिया। अब तो नंदनी को दिन भर ऐसा लगता जैसे घर सूना हो गया है। उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। उदास नंदनी आंगन में बैठी-बैठी पौधों की पत्तियां गिनती, अकेली बैठी उकताती झुंझलाती रहती, बेवजह सकूबाई को डांटती, वह समझ नहीं पा रही थी कि उसको क्या हो रहा है।

कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद बच्ची स्वस्थ होकर घर आ गई। वृंदा अपनी जिम्मेदारी पर उसे घर ले आई कि शायद कोई पहचान वाला ही उसे गोद ले ले। बच्ची बहुत ही सुंदर थी, हिरनी जैसी प्यारी आंखें, गोल चेहरा, नंदनी खुद को रोक नहीं पाई, उसने झट से बच्ची को गोद में ले लिया। उसकी गोद में आते ही बच्ची ने नंदनी को देखा जैसे पूछ रही हो मेरा क्या होगा? नंदनी की आंखों से अश्रू सारे बांध तोड़ कर बह निकले। हिचकियां लेती नंदनी ने उसे सीने से लगा लिया। मैं तेरी मां बनूंगी, यही सोचती वह कितनी देर तक उसी मुद्रा में खड़ी रही। वृंदा और भानू उसे निहार रहे थे। कोई नहीं जानता था कि उसने क्या फैसला ले लिया था।

वृंदा उसके लिए दूध ले आई, नंदनी उसे दूध पिलाते हुए सतृष्ण नेत्रों से ऐसे निहार रही थी जैसे वह उसी की बेटी हो, उसकी आंखों में प्रेम का अथाह सागर दिखाई दे रहा था। दूध पीने के बाद बच्ची नंदनी की गोद में ही सो गई। वृंदा ने नंदनी का चेहरा भांपते हुए कहा, इससे ज्यादा ममता नहीं रखना। हमने दो-तीन जगह बात की है, शायद कोई इसे गोद ले ले और इसका जीवन संवर जाए।

नंदनी चुप रही, रात को बच्ची को उसने अपने पास सुलाया और अपने फैसले पर गहराई से विचार किया। रात भर वह सोच-विचार करती रही और सुबह उठकर उसने अपना फैसला सुना दिया। वृंदा और भानू तो स्तब्ध रह गए। वृंदा ने समझाया कि बच्चे को पालने के लिए सिर्फ एहसास जरूरी नहीं, अनुभव भी होना चाहिए।

परिवार में बड़े-बूढ़े का होना भी सहायता करता है। एक अकेली मां बन कर बच्चा पालना आसान नहीं। किस-किस को जवाब दोगी, कौन है ये बच्ची? भानू ने भी टोका, नंदनी जरा सोचो पता नहीं वो पगली कौन थी? इस बच्ची में किसका गंदा खून है हम बिरादरी में क्या जवाब देंगे? हजारों सवाल उठेंगे, इससे बेहतर है कि तुम अपना इरादा बदल लो। लेकिन नंदनी नहीं मानी और कानूनी तरीके से बच्ची को गोद लेकर अपने मामा-मामी के पास लंदन चली गई। उसे एक स्कूल में नौकरी मिल गई और फिर मामा-मामी को छोड़कर वह अपने घर में रहने लगी। भानू की शादी में भारत आई थी, पर लोगों की नजरों में अपनी बच्ची के लिए तिरस्कार देख कर उसने फैसला किया कि अब वह भारत नहीं आएगी।

आज बीस साल बाद नंदनी अपनी बेटी के साथ भारत आई, भानू और भाभी ने दिल से स्वागत किया। नंदनी के साथ आई उसकी बेटी तृष्णा। डॉ. तृष्णा को देखकर सब हैरान थे। वृंदा भी अपने पति और बच्चों के साथ नंदनी से मिलने आई। वृंदा ने देखा एक सुंदर, मृगनयनी, गोरा रंग सुनहरे भूरे बालों वाली लड़की सामने खड़ी है। नंदनी ने मिलवाया इनसे मिलो, यह हैं डॉ. तृष्णा मेरी बेटी। वृंदा तो जैसे पलक झपकाना ही भूल गई, एकटक निहारते हुए उसने तृष्णा को गले लगा लिया।

वृंदा नंदनी को गले लगाते हुए बोली, ‘तुम्हारी तपस्या रंग लाई है। बच्चा कोई अच्छा बुरा नहीं होता, यह सब संस्कार और परवरिश का असर होता है। तुमने साबित कर दिया कि तुम सही थी हम गलत। 

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