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जांच के नतीजे आ चुके हैं; आप मां बनने वाली हैं। गर्भाशय के बढ़ते आकार के साथ-साथ उत्तेजना और प्रश्नों की सूची भी बढ़ रही है। इसमें कोई शक नहीं कि आप कई अजीबो गरीब लगने वाले, गर्भावस्था के लक्षणों से जूझ रही हैं लेकिन इनमें से कई तो आपके प्रेगनेंसी प्रोफाइल से जुड़े हो सकते हैं। 

‘‘मैं गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करने के दौरान ही गर्भवती हो गई। मैं पूरा महीना गोलियां लेती रही क्योंकि मुझे गर्भावस्था का पता ही नहीं चला। क्या इससे मेरे शिशु पर कोई असर पड़ेगा?”
वैसे तो गोलियों का सेवन बंद करने के बाद एक मासिक चक्र पूरा होता और फिर आप गर्भ धारण करतीं तो ठीक रहता लेकिन यह तो अचानक ही हुआ इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता। इसमें इतना गंभीर होने या चिंता करने वाली कोई बात नहीं है। इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि ऐसी अवस्था में शिशु को कोई हानि हो सकती है। अगर मन की तसल्ली चाहती हैं तो अपने डॉक्टर की राय भी ले लें।       
                                                               

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
‘‘मैंने कंडोम और स्पर्मीसाइड्स इस्तेमाल करने के दौरान ही गर्भधारण कर लिया और अनजाने में उनका इस्तेमाल करती रही। क्या मुझे शिशु की तरफ से कोई परेशानी हो सकती है?”
अगर आप कंडोम स्पर्मीसाइड के साथ डाइफरागम या फिर स्पर्मीसाइड युक्त डाइफरागम वगैरह रखने के दौरान गर्भवती हो गई हैं तो जान लें कि स्पर्मीसाइड और जन्मजात विकारों में कोई लेने-देन नहीं है। यह भी पता चला है कि गर्भावस्था के आरंभ में इनके इस्तेमाल से कोई समस्या नहीं होती। चाहे आप अनजाने में ही गर्भवती हो गई हैं लेकिन इसका पूरा आनंद लें। 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
‘‘मैं गर्भनिरोधक के तौर पर आई यू डी इस्तेमाल करती आ रही थी, लेकिन मुझे हाल ही में पता चला कि मैं गर्भवती हूं। क्या मेरा गर्भकाल स्वस्थ व सुरक्षित होगा?” 
हालांकि गर्भनिरोधक के इस्तेमाल के बावजूद गर्भवती हो जाना थोड़ा परेशान कर देने वाला हो सकता है। वैसे 1000 में से 1 मामला ही ऐसा होता है, जब आई यू डी होने के बावजूद गर्भ ठहर जाए या तो यह अपने स्थान से खिसक गया होगा या सही तरह से लगा ही नहीं होगा। आपके सामने दो ही विकल्प हैं, जिनके बारे में जल्द से जल्द डॉक्टर से बातचीत करनी चाहिए। आई यू डी रखना है या निकालना है। डॉक्टर जांच के बाद बताएंगे कि आपके मामले में क्या करना चाहिए। अगर आई यू डी अपने स्थान से खिसक गई है और उसका धागा दिख रहा है तो उससे निकाला जा सकता है वरना वह प्रसव के समय बाहर आएगी अगर इसका धागा गर्भावस्था के प्रारंभ में ही दिखाई दे जाता है तो संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। यदि इसे जल्दी से निकाल दिया जाए तभी सफल व स्वस्थ गर्भावस्था की उम्मीद की जा सकती है। यदि इसे न निकाला गया तो गर्भपात भी हो सकता है। अगर पहली तिमाही के दौरान भी यह अंदर ही हो तो किसी भी तरह के रक्तस्राव,ऐंठन या बुखार के लिए सावधान रहें क्योंकि आपको इसकी वजह से कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। डॉक्टर को सभी लक्षण बताने में देर न करें।
 
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‘‘मुझे काफी समय से फायब्रायड थे पर उसकी वजह से मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई। क्या गर्भावस्था में उनकी वजह से कोईपरेशानी हो सकती है?”
उम्मीद तो यह है कि फायब्रायड आपके और गर्भावस्था के बीच दीवार नहीं बनेंगे।गर्भाशय की दीवारों पर बने ये नॉनमैलिगनेट उभार, गर्भावस्था में कोई रुकावट नहीं बनते।  हालांकि ऐसी गर्भवती स्त्री को कभी-कभी पेट के निचले हिस्से में दबाव या दर्द की शिकायत हो सकती है। वैसे यह चिन्ता की बात तो नहीं है, पर अपने डॉक्टर से अवश्य कहें। चार-पांच दिन के आराम या सुरक्षित दर्द निवारक दवा लेने से सब ठीक हो जाएगा। कभी-कभी फायब्रायड के कारण प्लेसेंटा के अलग होने, प्रीटर्म बर्थ या ब्रीच बर्थ का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन सावधानी बरतने पर इन खतरों को भी टाला जा सकता है।अपने डॉक्टर से इस बारे में खुलकर बात करें ताकि वे सभी खतरों और सावधानियों के विषय में बता सकें। यदि डॉक्टर को लगता है कि फायब्रायड की वजह से सामान्य प्रसव में दिक्कत आ सकती है तो वे सी-सैक्शन प्रसव की राय दे सकते हैं। अधिकतर मामलों में, जब प्रसव में गर्भाशय का विस्तार होता है तो बड़ा फायब्रायड भी निकल आता है।
 
‘‘मैंने कुछ साल पहले दो फायब्रायड निकलवाए थे, क्या इससे मेरी गर्भावस्था प्रभावित हो सकती है।”
अधिकतर मामलों में गर्भाशय के फायब्रायड ट्यूमर निकालने की सर्जरी लैपरोस्कोपिक होती है इसलिए गर्भावस्था में कोई दिक्कत नहीं आती। हालांकि बड़ा फायब्रायड निकला हो तो गर्भाशय कमजोर हो जाता है।उसमें प्रसव के लिए ताकत नहीं बचती। यदि चिकित्सक आपके रिकॉर्ड देखकर यही महसूस करें तो वे सी-सैक्शन से प्रसव की राय दे सकते हैं। अगर सर्जरी के समय से पहले ही प्रसव का दर्द शुरू हो जाए तो उन लक्षणों की पहचान कर, जल्दी से जल्दी डॉक्टर तक पहुंचें।
 
 

 
‘‘वर्षों तक एंडोमैट्रिओसिस से पीड़ित रहने के बाद अब मैं गर्भवती हुई हूं। क्या मेरी गर्भावस्था में कोई समस्या हो सकती है।”
इससे दो तरह की चुनौतियां जुड़ी हैं। गर्भधारण में परेशानी व दर्द! गर्भवती होने का मतलब है कि आपने पहली चुनौती तो पार कर ली है। (मुबारक हो) गर्भवती होने के बाद दूसरी चुनौती पार करने में मदद मिलेगी।गर्भावस्था में, एंडोमैट्रिओसिस के लक्षणों व दर्द में सुधार होता है। ऐसा हार्मोनल बदलावों की वजह से होता है। ओव्यूलेशन के बाद एंडोमैट्रीयल छोटा व नरम पड़ जाता है। कई महिलाओं में तो और भी बेहतर नतीजे सामने आए हैं। कई महिलाओं में तो सारी गर्भावस्था में इसके लक्षण ही सामने नहीं आते। कुछ महिलाओं को दर्द व झटकों की शिकायत हो सकती है लेकिन शिशु के जन्म में कोई परेशानी नहीं होती। यदि गर्भाशय का आपरेशन हो चुका हो तो डॉक्टर सी सैक्शन की राय दे सकते हैं। गर्भावस्था में एंडोमैट्रिओसिस के लक्षणों से छुटकारा मिलता है पर इसका इलाज नहीं होता। गर्भावस्था व उसकी देखभाल के बाद वही लक्षण फिर से उभर जाते हैं।
 
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‘‘एक वर्ष पहले मैं गर्भवती हुई तो मुझे कोलोपोस्कोपी और सर्वाइकल बायोप्सी कटवानी पड़ी (क्या मेरी गर्भावस्था खतरे में है)।”
अगर पैप स्मीयर में कुछ अनियमित सर्वाइकल कोशिकाएं दिखाई दें तो कोलोपोस्कोपी की जाती है। साधारण प्रक्रिया में योनि व सर्विक्स को एक खास माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जाता है। पैप स्मीयर में असामान्य कोशिका दिखाई दें तो डॉक्टर सर्वाइकल या कोन बायोप्सी करते हैं, जिसमें संदिग्ध जगह से नमूना लेकर, लैब में जांच की जाती है। इसके लिए क्रायोसर्जरी (असामान्य कोशिकाएं जमा दी जाती हैं) या लीप चिकित्सा की जाती है, जिसमें प्रभावित सर्वाइकल ऊतकों को दर्द रहित इलैक्ट्रिकल करंट से निकाल दिया जाता है। अच्छी खबर यह है कि इस प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद गर्भवती महिलाएं स्वस्थ शिशुओं को जन्म देती हैं हालांकिनिकाले गए ऊतकों की मात्रा के हिसाब से,कुछ महिलाओं को गर्भावस्था में दिक्कतें आ सकती हैं। अपने डॉक्टर को ऐसी किसी सर्जरीया टेस्ट के बारे में अवश्य बताएं ताकि वेज्यादा बेहतर तरीके से देखभाल कर सकें। अगर पहली प्रसव पूर्व जांच में असामान्य कोशिकाओं का पता चले तो डॉक्टर कोलोपोस्कोपी की राय दे सकते हैं लेकिन बायोप्सी वगैरा तो शिशु के जन्म के बाद ही की जाती ।
 

 
‘‘क्या जैनीटल एचपीवी मेरी गर्भावस्था को नुकसान पहुंचा सकता है?”
एच.पी.वी. एक सेक्सुअली ट्रांसमीटिड वायरस है। आमतौर पर इसके लक्षण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते व यह 6 से 10 माह में अपने-आप ठीक हो जाता है। कई बार ऐसा होता है, जब इसके लक्षण सामने आकर उभरते हैं पैप स्मीयर से कुछ कोशिकाओं की अनयिमितता का पता चलता है। कई बार हल्के पीले या गुलाबी मस्से भी उभर आते हैं जो कि योनि, गुदा व वल्वा पर दिखाई देते हैं। हालांकि इनमें दर्द नहीं होता लेकिन कभी-कभी जलन होती है या फिर खून भी निकल सकता है। अधिकतर मामलों में ये मस्से एक-दो महीने में अपने-आप ठीक हो जाते हैं। जेनिटल एचपीवी गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करता है? हालांकि इसका कोई सीधा असर नहीं होता लेकिन कुछ गर्भवती महिलाओं में ये मस्से अधिक सक्रिय हो जाते हैं। अगर आपके मस्से भी अपने-आप ठीक होने में न आ रहे हों तो डॉक्टर की सलाह लेने में देर न करें। वे इन्हें फ्रीजिंग,इलैक्ट्रिक या लेज़र थैरेपी से हटा देंगे। कुछ मामलों में इलाज को प्रसव तक टालना पड़ता है।यदि आप भी एचपीवी से ग्रस्त हैं तो डॉक्टर को सर्वाइकल सैल की भी जांच करनी होगी। यदि बायोप्सी करनी भी पड़ी तो उसे शिशु के जन्म तक टाल दिया जाएगा। एचपीवी संक्रमण जनित रोग है इसलिए किसी एक ही साथी के साथ सुरक्षित सेक्स करें। अब 26 वर्ष से कम आयु की महिलाओं के लिए इसका वैक्सीन भी उपलब्ध है, लेकिन गर्भावस्था में इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। यदि आप वैक्सीन शुरू करने के बाद गर्भवती हो जाती हैं तो बाकी शिशु के जन्म तक रोकनी होगी। इस सीरीज को तीन खुराक में पूरा किया जाता है।
 
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‘‘मुझे जेनिटल हर्पीज है। क्या यह मेरे शिशु को भी हो सकती है।”
गर्भावस्था में हर्पीज होने का मतलब है कि आपको काफी सावधानी रखनी होगी लेकिन यह कोई बहुत बड़े खतरे की घंटी नहीं है। अगर आप और आपका डॉक्टर सारी सावधानी रखेंगे तो गर्भावस्था और प्रसव के समय कोई परेशानी नहीं होगी और शिशु भी स्वस्थ रहेगा। सबसे पहले तो नवजात में ऐसे संक्रमण की संभावना 1 प्रतिशत के करीब होती। ऐसा बहुत कम होता है कि मां के संक्रमण (इंफेक्शन)की वजह से शिशु भी रोगग्रस्त हो जाए।हालांकि पहली तिमाही में होने वाले इंफेक्शन से मिसकैरिज और प्रीमेच्चयोर डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन वहां भी ऐसा होता है. वैसे भी आजकल शिशुओं में यह खतरा न के बराबर ही होता है। अच्छी चिकित्सीय देखभाल से आप इसे काफी हद तक संभाल सकती हैं। हर्पीज ग्रस्त मांओं के शिशुओं के बचाव के लिए उन्हें एंटी वायरल दवाएं दी जाती हैं।यदि शिशु को भी संक्रमण हो जाए तो उसे भी एंटी-वायरल दवाएं दी जाती हैं। प्रसव के बाद भी संक्रमण बना रहे तो भी अपेक्षित सावधानी के बाद मां अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है।
 

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