डायबिटीज को लाइफस्टाइल डिजीज़ कहा जाता है क्योंकि यह भले मातापिता की देन हो, लेकिन लाइफस्टाइल बदल कर इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। आजकल अधिकतर लोगों का लाइफस्टाइल ही डायबिटीज का प्रमुख कारण है और यादातर के लिए लाइफस्टाइल बदलना संभव नहीं है। इससे यह रोग दिन दूनी रात चौगुनी गति से पांव पसार रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में डायबिटीज़ के मरीजों की संख्या वर्ष 2000 में 3.2 करोड़ थी जो 2013 तक बढ़कर 6.3 करोड़ हो गई और अनुमान है कि यह अगले 15 सालों में 10 करोड़ से भी अधिक हो जाएगी।

डायबिटीज़ दरअसल क्या है, इस बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। दरअसल डायबिटीज़ शरीर की वह स्थिति है जब पाचक ग्रंथियों द्वारा खून में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए बनाये जाने वाले हार्मोन इन्सुलिन का निर्माण पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता या हमारा शरीर उत्पादित इन्सुलिन को पूर्णतया और प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। टाइप 1 डायबिटीज़ में शरीर में इन्सुलिन के कम उत्पादन के कारण रोज इन्सुलिन की खुराक लेने की जरूरत होती है। लेकिन अक्सर टाइप 1 डायबिटीज़ होने का लोगों को पता नहीं लग पाता और इसीलिए ऐसे मामले रोके नहीं जा पाते हैं। डायबिटीज़ के प्रमुख लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, अधिक प्यास, निरंतर भूख, वजन में कमी, थकान आदि हैं। टाइप 2 डायबिटीज़ तब होती है, जब मोटापे और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण शरीर में निर्मित इन्सुलिन का उपयोग ठीक से नहीं हो पाता। इसके लक्षण भी टाइप 1 डायबिटीज़ जैसे ही होते हैं लेकिन अलग से नजर नहीं आते। गर्भावस्था में डायबिटीज़ ग्लूकोज की अधिकता के कारण होती है। गर्भावस्था की तीसरी तिमाही के दौरान कुछ महिलाओं के ब्लड शुगर लेवल हाई हो जाता है जिससे डिलिवरी के वक्त जोखिम बढ जाता है। 

भारत में डायबिटीज़ के जोखिम का सबसे बड़ा कारण मोटापा है, जिससे देश की 21.4 प्रतिशत जनसंख्या प्रभावित है। इसे संपन्न तबके की बीमारी कहा जाता है क्योंकि शुगर और फैट इसके प्रमुख कारक हैं। इसके अलावा शहरी सुस्त जीवनशैली में शारीरिक गतिविधियों का अभाव भी इसका प्रमुख कारण है। अध्ययनों में पाया गया है कि दक्षिण एशियाई लोगों में टाइप 2 डायबिटीज़ का खतरा अन्य इलाकों के मुकाबले अधिक है। इसकी प्रमुख वजहों में आनुवांशिक कारक, पेट के आसपास चर्बी जमा होने की प्रवृत्ति, मेटाबॉलिम, गैर-एल्कोहॉलिक होने के बावजूद फैटी लीवर होना, संतुलित आहार की कमी, वसायुक्त भोजन करना, सब्जी-फल कम खाना, खूब मिठाई खाना, शारीरिक श्रम का अभाव, बाहरी खानपान पर निर्भरता और गर्भावस्था के दौरान सुस्त जीवन हैं। डायबिटीज़ से बचाव के मामले में अनेक तरह के शोध और अध्ययन किए जा रहे हैं। किडनी के विशिष्ट रिसेप्टर्स और जीएलपी-1 जैसी नई दवाओं से टाइप 2 डायबिटीज़ में सुधार हो रहा है। साथ ही दवाओं की 5 और श्रेणियों पर कार्य चल रहा है और डायबिटीज़ कंट्रोल करने के लिए लंबे समय तक चलने वाले इन्सुलिन की खोज की गई है।

इसके अलावा वर्जीनिया विश्वविद्यालय के शोधार्थी कृत्रिम पैनक्रियाज़ बनाने के तरीकों पर काम कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल टाइप-1 डायबिटीज़ से पीडि़त व्यक्तियों के ब्लड ग्लूकोज को सीमित दायरे में रखने के लिए किया जा सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो डायबिटीज़ से बचाव मुश्किल नहीं है, जैसे- प्रतिदिन 4-5 फलों और हरी सब्जियों को भोजन में शामिल कर संतुलित आहार लें। प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट नियमित रूप से व्यायाम करें जिसमें 30 मिनट की सैर शामिल हो। बाकी ड्ड भी एक्टिव बने रहें। अपने कार्य के दौरान 15 मिनट चलें-फिरें और 15 मिनट वजन उठाने का अभ्यास करें। दोस्तों से मेल-मिलाप या पार्टी के दौरान खाने-पीने की जगह खेल और शारीरिक गतिविधियों को प्राथमिकता दें। अगर कभी अधिक प्यास, भूख, वजन में कमी, थकान, नजर में धुंधलापन जैसे लक्षण नजर आएं तो स्वास्थ्य जांच कराएं। अपने चिकित्सक की सलाह के मुताबिक दवा लें, रक्तचाप नियंत्रित रखें और तंबाकू और शराब का सेवन न करें। तनाव को सकारात्मकता के साथ योग और ध्यान लगाकर दूर रखें। यूं भी &0 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को नियमित रूप से शुगर की जांच कराते रहना चाहिए।