Congenital Heart Defect: एक महिला के लिए मां बनना सुखद अनुभव होता है। स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट बच्चा पाकर जहां वो सारी पीड़ा भूल जाती है, वहीं बच्चे में किसी तरह का कमी या विकार परेशानी का सबब बन जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर रोजाना तकरीबन 4 लाख बच्चे पैदा होते हैं, लेकिन उनमें कई जन्मजात विकारों से ग्रस्त होते हैं। ऐसा ही एक विकार है- जन्मजात हृदय विकार या कंजेनाइटल हार्ट डिफेक्ट। दुनिया भर में पैदा होने वाले तकरीबन 1 प्रतिशत बच्चे इसका शिकार होते हैं। द पीडिएट्रिक कार्डिएक सोसाइटी ऑफ इंडिया के मुताबिक जन्मजात हृदय विकार के शिकार कुल बच्चों में 46 प्रतिशत भारत में होते हैं। हर 100 में से 1 बच्चा इस विकार से ग्रस्त है। जागरूकता की कमी और मेडिकल सुविधाओं की कमी के कारण देश में हर साल तकरीबन 2 लाख बच्चे एक साल से कम उम्र में मर जाते हैं।
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क्या है कंजेनाइटल हार्ट डिफेक्ट

जैसा कि नाम से विदित है यह विकार जन्म के साथ ही बच्चे की हृदय-संरचना को प्रभावित करता है। जैसे-बच्चे के हृदय में छेद होना, हृदय के किसी हिस्से का न होना या हृदय का पूरी तरह विकसित न होना। इससे हृदय की सामान्य रूप से कार्य करने की क्षमता में गिरावट आ जाती है। शरीर में प्रवाहित होने वाले ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होती है जिसका असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ता है।
इसमें से तकरीबन एक-तिहाई डिफेक्ट माइल्ड कैटेगरी के होते हैं जिन्हें किसी तरह की ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं होती, हार्ट में छेद होते हैं जो समय के साथ-साथ भर जाते हैं। 25-30 प्रतिशत माइनर कैटेगरी के डिफेक्ट होते है। 15-20 प्रतिशत मेजर डिफेक्ट होते हैं जिन्हें जन्म के 2 महीने के अंदर ही ठीक करना पड़ता है।
बच्चा मां के पेट में होता है, उस समय 16-18 सप्ताह में हार्ट का विकास होता है। अगर उसमें कोई प्रॉब्लम रहे, तो ये विकार आते हैं। जैसे उस समय मां मिर्गी जैसी बीमारी की मेडिसन ले रही हैं, मां की उम्र ज्यादा है, कैंसर जैसी बीमारी के चलते रेडिएशन मिला हो, वो एल्कोहल या स्मोकिंग करती हैं, या आनुवांशिक कारण है।
गर्भावस्था के 18-20 सप्ताह के बीच में अल्ट्रासाउंड करने पर डायगनोज किया जाता है। बच्चा जब पेट में होता है। बच्चे की हार्ट की सर्कुलेशन मां पर निर्भर करती है। इसलिए स्पाइन हार्ट डिफेक्ट होने पर भी बच्चा विकसित होता रहता है। 10 प्रतिशत मामलों में बहुत सीवियर मामलों में गर्भावस्था के दौरान ही मां के पेट में गर्भपात हो जाता है।
जब ये बच्चे पैदा होते है आमतौर पर पहले 4 सप्ताह तक तो कुछ लक्षण नजर नहीं आते, उसके बाद में स्किन पर नीलापन, सांस तेज चलना, बार-बार निमोनिया होना, वजन न बढ़ना-बच्चों में पाया जाता है। जब डॉक्टर स्टेटसस्कोप से दिल की धड़कन की जांच करते हैं, तो अजीब-सी आवाज सुनाई देती है।
उपचार

माइल्ड तरह के डिफेक्ट्स में 25 प्रतिशत मरीजों के हार्ट के छेद इतने बड़े नहीं होते और बच्चे का विकास प्रभावित नहीं होता। ऐसे मरीजों की सर्जरी नहीं की जाती, उन्हें दवाई की सपोर्ट या मेडिकल मैनेजमेंट पर रखा जाता है। उनके हार्ट में मौजूद छेदों को कैथटेराइजेशन तकनीक से बंद कर दिया जाता है। इसमें कोई निशान नहीं पड़ता, न ब्लड की जरूरत होती है। उन्हें 3-6 महीने तक फोलो-अप पर रखा जाता है जिसमें विकास होने पर कई बार विकार खत्म भी हो जाता है, कई बार उसकी स्थिति के हिसाब से बाद में सर्जरी भी करनी पड़ती है।
अगर यह डिफेक्ट काफी मेजर है जिसके कारण बच्चे की ग्रोथ नही हो रही, ऑक्सीजन लेवल मेंटेन नही कर पा रहा है, बार-बार चेस्ट इंफेक्शन हो रहा है, तो ऑपरेशन करना पड़ता है। 95-97 प्रतिशत ऑपरेशन सफल रहते हैं। अगर बच्चे के हार्ट का एक हिस्सा विकसित ही न हुआ हो, उनके 2-3 ऑपरेशन किए जाते हैं। ऐसे बच्चे 80-90 प्रतिशत नॉर्मल लाइफ बिता पाते हैं। अगर नवजात शिशु की हार्ट प्रॉब्लम ज्यादा है, तो पैदा होने के तुरंत बादडेढ से दो किलो वजन के बच्चों को भी ऑपरेशन करना पड़ सकता है। जबकि बच्चे की स्थिति गंभीर नहीं है, तो उसे 3-4 महीने तक विकसित होने दिया जाता है।
आजकल ऐसी आधुनिक तकनीकें भी आ गई हैं जिसमें इन बच्चों का ओपन हार्ट सर्जरी के बिना भी ट्रीटमेंट कर सकते हैं। हार्ट के कई विकार डिवाइज के माध्यम से भी ठीक कर सकते हैं। इनके अलावा वॉल्व के विकार बैलून सर्जरी से ठीक किए जाते हैं। बैलूनिंग में तो बच्चे को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की भी जरूरत नहीं पड़ती। डॉक्टर की निगरानी में 2-3 दिन के लिए अस्पताल में रहने के बाद बच्चा नॉर्मल हो जाता है, जबकि सर्जरी के बाद उन्हें 7-8 दिन तक अस्पताल में रखा जाता है। पोस्ट-ऑपरेटिव केयर आमतौर पर मरीज को 2-3 महीने तक दी जाती है। उसके बाद ज्यादातर मरीज बिना दवाई के नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं।
15-20 प्रतिशत बच्चों में जिनकी हार्ट की बनावट में डिफेक्ट हो, उनकी आगे भी फोलो-अप और सर्जरी की जरूरत पड़ती है। स्थिति के हिसाब से ऐसे बच्चों को 3 सर्जरी सिंगल वेन्ट्रीकल हार्ट कहते हैं। उनकी पहली सर्जरी जन्म लेने के 6 महीने के अंदर, दूसरी 2 साल के होने पर और तीसरी सर्जरी 7-8 साल में की जाती है। उन्हें 5 साल की उम्र तक साल में एक बार चैकअप कराना पड़ता है। सर्जरी के बाद भी अगर मरीज की स्थिति में सुधार नहीं आता, तो उनका हार्ट ट्रांसप्लांट करना पड़ता है।
(डॉ वीरेश महाजन, पिडियाट्रिक कार्डियोलॉ जिस्ट, दिल्ली)
