जैसा आहार वैसा व्यवहार: Benefits of Healthy Food
Benefits of Healthy Food

Benefits of Healthy Food: अमूमन हम अपने व्यवहार, स्वभाव एवं व्यक्तित्व तथा बर्ताव आदि का जिम्मेदार अन्य लोगों, रिश्तों, किस्मत एवं परिस्थितियों आदि को ही समझते हैं। हमें लगता है इन्हीं सब के कारण हम चिंतित एवं दुखी हैं, परंतु क्या आप जानते हैं कि हमारे व्यवहार का कारण हमारा आहार भी हो सकता है? नहीं, तो जानिए किस तरह हमारा आहार हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है।

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भूख मिटाने का एकमात्र साधन है भोजन। यह भोजन जिसे हम आहार के रूप में दिन भर तथा उम्र भर लेते हैं वह न केवल हमारा पेट भरता है बल्कि हमें ऊर्जा भी प्रदान करता है। हमारे आहार में हम क्या, कैसा व कितना खाते हैं वह हमें स्वस्थ रहने तथा रोगों से लड़ने में हमारी मदद भर करता है। यह मनुष्य जीवन का इतना अहम हिस्सा है कि इसके बिना मनुष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

भोजन के ही माध्यम से हमारे शरीर में प्रोटीन-विटामिन, लवण-खनिज आदि जरूरी तत्त्व पहुंचते हैं जो हमारे शरीर का विकास करते हैं। सच तो यह है कि आदमी इसी भोजन के लिए कमाता व मेहनत करता है। भोजन का सही अनुपात यदि हमें बनाता है तो इसका असंतुलन हमें रुग्ण भी बना देता है। यह भोजन हमारे शरीर को ही नहीं हमारे मन को भी जिंदा रखता है। यह हमारे शारीरिक ढांचे को ही नहीं हमारे व्यवहारिक जीवन को भी प्रभावित करता है। इसकी तासीर, इसकी सुगंध, इसमें पड़ने वाले मसाले तथा बनाने वाले का मन सब कुछ हमारे व्यवहार पर अप्रत्यक्ष रूप से अपना असर दिखाता है। इसलिए जब भी खाने की मेज पर आप भोजन के लिए जाएं तो इस बात का भी अवश्य ध्यान रखें कि यह आपके शरीर की ही नहीं मन की भी खुराक है। जिस तरह पेट एवं स्वास्थ्य की गड़बड़ी हमारे भोजन से जुड़ी है। वैसे ही हम जो, जैसा तथा जितना खाते हैं उसका असर हमारे मन पर भी पड़ता है और मन का सीधा संबंध स्वास्थ्य से है जो कई रोगों के रूप में हमारे शरीर को प्रभावित करता है। कैसे? आइए, जानते हैं।

भोजन से हमारा पेट ही नहीं भरता हमारा मन भी यानी मूड भी बनता है। आपने महसूस किया होगा कि आहार यदि हमारे मन का हो तो हमारी भूख दोगुनी हो जाती है, वहीं यदि आहार मन अनुसार न हो तो हमारी भूख उड़ जाती है, जिसका सीधा प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। भोजन स्वादिष्टï एवं मन अनुसार होगा तो मन खुश रहेगा। मन खुश रहेगा तो मन शांत रहेगा। मन शांत रहेगा तब हम क्रोध, चिड़चिड़े पन से दूर रहेंगे। इन सब से दूर रहेंगे तो संबंध ठीक रहेंगे और संबंध ठीक रहेंगे तो हमारा जीवन ठीक रहेगा। साथ ही यदि हम क्रोध से बचेंगे तो हमारा रक्तचाप ठीक रहेगा। रक्तचाप सही रहेगा तो न केवल रक्त से संबंधित बल्कि हृदय-मस्तिष्क संबंधी रोग भी नहीं रहेंगे।

बासी खाना जहां स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न करता है वहीं उसका रूप और गंध हमारे मन को भी प्रभावित करता है। इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जो भोजन आप कर रहे हैं वह ताजा, साफ व पूरी तरह पका हुआ हो। गंदा, बासी व अधपका भोजन तन के साथ-साथ मन को भी नुकसान पहुंचाता है।

भूख बढ़ाने व मन बनाने में आहार के प्रस्तुतिकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। सुंदर ढंग से सजाया गया एवं अच्छे बर्तनों में परोसा गया भोजन, भोजन के प्रति आकर्षण पैदा करता है, जिसके चलते हमारा मन शांत होता है और हमारा व्यवहार निर्मल व सकारात्मक बनता है।

भोजन को हम उसकी ऊर्जा अनुसार तीन भागों में बांटते हैं सात्विक, राजसी और तामसिक। परंतु रोजमर्रा में हम भोजन को दो (शाकाहार और मांसाहार) भागों में बांटते हैं। शाकाहार न केवल सुपाच्य होता है बल्कि इसकी ऊर्जा हमें शांत व निर्मलता भी प्रदान करती है। वहीं मांसाहार, अधिक चटपटे, तीखे व मसालेदार भोजन हमारे भीतर गुस्से, आक्रोश व काम वासना को जगाते हैं। फल-सलाद, हरी सब्जियों एवं दालें आदि खाने से न केवल पेट स्वस्थ रहता है बल्कि मन भी हल्का रहता है। मांस, लहसुन-प्याज एवं मसाले आदि हमें आक्रोश व अतिरिक्त ऊर्जा से भरते हैं, जिसके कारण कई रोग तथा व्यवहार में उत्तेजना पैदा होती है।

यदि यह सच है कि ‘जैसा भोजन वैसा मन तो यह भी सही है ‘जैसा मन वैसा भोजन। सामने थाल में भोजन कितना भी सुंदर व सुगंधित क्यों न हो यदि हमारा मन बेचैन, अशांत, दुखी व तनावपूर्ण होगा तो हमारा स्वादिष्टï भोजन भी पेट में जाकर जहर बनने में देर नहीं लगाएगा। सब कुछ मन पर निर्भर करता है। कुड़कर, गुस्से में या बेमन से किया गया भोजन कभी भी ठीक से नहीं पचता। भोजन कितना ही स्वादिष्ट क्यों न हो, यदि मन ही दुखी या उचाट होगा तो सब कुछ न केवल बेस्वाद लगेगा बल्कि खाने की इच्छा भी नहीं रहेगी। हम जिस भाव से खाते हैं वैसा ही व्यवहार करते हैं।

मन और भोजन का इतना गहरा संबंध है कि इसे बनाने वाले के मन का भी इस पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आपको जान के हैरानी होगी कि भले ही किसी भोजन को कितने ही आराम से, विधिपूर्वक बनाया जाए पर यदि बनाने वाले का मन या मंशा सही नहीं है तो उसका प्रभाव भोजन पर अवश्य पड़ता है। आपने, खास तौर पर महिलाओं ने यह जरूर अनुभव किया होगा कि जब आप बीमार, थके हुए या चिड़चिड़े होते हैं तो खाना बनाना भी एक बोझ लगता है, जिसके कारण या तो कभी नमक ज्यादा हो जाता है या पड़ता ही नहीं है। चावल या रोटी कभी या तो जल जाती है या कच्ची रह जाती है। वहीं दूसरी ओर जब आप खुश होते हैं या किसी ऐसे के लिए खाना बनाते हैं जिससे आपको बेहद प्यार होता है तो खाने का स्वाद चौगुना हो जाता है। क्योंकि उस भोजन में सिर्फ सब्जी व मसाले नहीं होते, आपका सात्विक व शांत मन भी होता है। यही कारण है कि पूजा के प्रसाद या लंगर आदि का जो स्वाद होता है वह चाहकर भी घर के थोड़े खाने में नहीं आता। इसलिए भोजन में स्वाद भोजन बनाने वाले के मन से बहुत गहराई से जुड़ा होता है। जिसका प्रभाव भोजन तथा भोजन खाने वाले मन-व्यवहार पर भी पड़ता है।

मन और भोजन से जुड़े संबंध के बारे में कुछ और शोध भी सामने आए हैं, मसलन जिस भोजन को हम ग्रहण करते हैं उसमें उसको उगाने वाले एवं खरीदने वाले की ऊर्जा व नीयत का भी गहरा असर पड़ता है। भले ही यह संबंध सूक्ष्म है या आप इसे नहीं मानते हों परंतु यह सत्य है। इससे जुड़े शोध तो यह तक बताते हैं कि साग-सब्जी या घर के राशन को खरीदने के लिए जिन रुपयों-पैसों का इस्तेमाल किया जाता है उस माध्यम तक का असर हमारे राशन-पानी पर पड़ता है। यदि यानी जिस कमाई को हम अपने खाने-पीने के लिए खर्च करते हैं वह कमाई किसी गलत धंधे का नतीजा तो नहीं। क्योंकि गलत कमाई से खरीदा गया अन्न भी नकारात्मक ऊर्जा देता है और उससे बना भोजन भी वैसा ही शरीर पर प्रभाव डालता है।

अन्न खरीदना तो दूर, कहते हैं जो किसान जिस मंशा एवं पूंजी से बीज खरीदकर फसल उगाता है उस फसल तक में उसके कमाए धन व लगाए श्रम की ऊर्जा छिपी होती है। जिस मन से हम बीज बोते हैं, फसल उगाते हैं, उसकी रक्षा करते हैं, उसकी कटाई-छंटाई करते हैं, उसे बोरों एवं दाम आदि में पैक करते हैं, सब में ऊर्जा संलग्न होती है। यहां तक कि खेत-खलिहान के पास का वातावरण कैसा है, उसको सींचा जाने वाला पानी कैसा है आदि सबका असर फसल पर पड़ता है। प्रदूषित वातावरण एवं जल से सींची व उगाई गई फसल भी कहीं न कहीं हमें, हमारे भोजन को प्रभावित करती है, जिसके कारण हमारा मन प्रभावित होता है और मन के कारण हमारा व्यवहार प्रभावित होता है।

जैसा हमारा भोजन होगा वैसा हमारा स्वास्थ्य होगा। जिसे हम शुद्ध समझकर पकाते हैं वह भोजन चाहकर भी शुद्ध नहीं होता। आजकल जिस तरह के फार्टिलाइजर एवं पेस्टीसाइज खेतों में उपयोग किए जा रहे हैं उनसे पौधों की पैदावार में बेशक उन्नति हुई हो परंतु उनकी गुणवत्ता में गिरावट आई है। समय से पहले फल-सब्जियों को बड़ा करने के लिए तरह-तरह के कैमिकल प्रयोग में लाए जाते हैं और मुनाफे के लालच में खाद्य पदार्थों में खूब मिलावटें की जा रही हैं। सब कुछ ताजा और रंग-बिरंगा दिखाने के लिए कृत्रिम रंगों का उपयोग किया जा रहा है। नकली सुगंध, नकली स्वाद में डिब्बा बन्द चीजों को बेचा जा रहा है। आज रेडिमेड मसाले हैं, सूप हैं, चटनी हैं तथा कई तरह के व्यंजन एवं मिष्ठन हैं जो पहले से ही हाफ कुक्ड मिलते हैं जिन्हें बस थोड़ा मिलाना या गर्म करना होता है। ऐसे भोजन में क्या ताजगी होगी? कितनी शुद्धता होगी?

ताजे टमाटर एवं धनिया-पुदीने की सिल पर हाथ से पिसी चटनी का जो स्वाद है वह रेडिमेड मिलावटी चटनी में कहां? फिर गाजर का हलवा हो या खीर, मां के हाथों का अचार हो या चूल्हे की रोटी सबका अपना अलग ही महत्त्व और आनंद होता है। ताजा, शुद्ध व अपने हाथों का बना भोजन सदा दिल पर दस्तक देता है पर आजकल लोग या तो बाहर होटल-दुकान का खाना खाते हैं या फिर घर में कुक रखते हैं जो उनके लिए खाना बनाते हैं। जिस भोजन को काटने-पकाने, बनाने-परोसने में न मन लगा न भाव उस भोजन की ऊर्जा कैसी होगी? बड़े-बड़े रेस्टोरेंट एवं होटलों में कितनी सफाई व शुद्धता से भोजन बनाया जाता है यह हम सभी जानते हैं। परंतु फिर भी इनकी सुगंध, रंग व प्रस्तुति सब इतनी आकर्षक होती है कि हम सब कुछ भूल कर इसे रोजमर्रा के जीवन में शामिल कर लेते हैं। यही कारण है कि आज का आदमी पहले की तुलना में अधिक व शीघ्र बीमार पड़ता है। क्योंकि यह भोजन कई हाथों से गुजरता है और हाथ वाले के भाव भी उसमें शामिल होते हैं इसलिए यह सब मिलकर हमारे मन को भी प्रभावित करते हैं। इतनी सारी अशुद्धता और मिलावटें जब भोजन बनकर सामने आती हैं तो हमारे मन-व्यवहार पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती हैं, जिसका हमें पता भी नहीं चलता।

भोजन का ही नहीं हम जिस ढंग से भोजन करते हैं उसका भी हमारे मन-व्यवहार पर, स्वास्थ्य-शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जब भी हम समूह में खाना खाते हैं तो हम सोचते क म हैं बाते ज्यादा क रते हैं। खाना बिना किसी तनाव के आराम से खाया जाता है। भूख न होते हुए भी खाना खा लिया जाता है। वही जब हम अकेले भोजन करते हैं तब हमारी खाना खाने की गति भी धीमी हो जाती है। भूख भी आधी रह जाती है। विचार अधिक आते हैं। खाना कम स्वाद लगता है, जिसके कारण भूख पर फर्क पड़ता है। मन तनाव पूर्ण व बेरुखे पन से भरने लगता है। एक नीरसता एवं अकेलेपन का भार घेरने लगता है। इसलिए कभी-कभार तो ठीक है। परंतु रोज अकेले भोजन करने से बचें वरना इसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ने लगता है तथा हमारे व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगता है।
हम खाना किस वातावरण में किन लोगों के साथ कर रहे हैं इसका भी बहुत फर्क पड़ता है। खाना स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित जगह पर खाएं। ऐसे लोगों से बचें जिनके पास मुंह की बदबू, पसीने की बदबू, सिगरेट-शराब की बदबू आदि की बदबू आती है। इससे भोजन के प्रति उत्साह एवं भूख प्रभावित होती है तथा मन भी खिन्न होता है। साथ ही जिन बर्तनों में खाएं उन बर्तनों की सफाई का भी ध्यान रखें। बर्तन में लगा साबुन, बाल, गंदे हाथों के निशान या उनमें पड़ा कोई मच्छर-कीड़ा आपके मूड को खराब कर सकता है। इसलिए इन सब का भी विशेष ध्यान रखें।

हो सके तो भोजन आराम से बैठकर चुपचाप करना चाहिए। इससे खाना खाने में सुविधा तो होती ही है साथ में खाना पचता भी है और शरीर को लगता भी है। जल्दबाजी में किया गया भोजन बस मुंह में ठूसने जैसा होता है, जो आगे दिक्कत करता है। ध्यान रखें कि हमें भोजन को निगलना नहीं है बल्कि उसे अच्छी तरह चबाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि हमें एक कौर को इतना चबाना चाहिए कि उसे पानी की तरह पी सकें तथा जब एक कौर पेट में पहुंच जाए तभी दूसरे कौर को मुंह में डालना चाहिए। रहा सवाल खाते वक्त बात करने का उससे गला, होठ या जीभ आदि कटने का डर तो होता ही है साथ ही खाना अटकने का भी भय बना रहता है। और तो और भोजन के दौरान हम जिस तरह की, जिन विषयों की बातें करते हैं उसका प्रभाव भी हमारे अंदर जाते भोजन पर पड़ने लगता है। मसलन खाना खाते-खाते बहस करना, चुगली या बुराई करना, भाषण बाजी करना, रोना-चिल्लाना आदि करने से हमारा मन व भोजन दोनों प्रभावित होते हैं जिसके चलते हमारा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

यूं तो टी.वी. के साथ भोजन का ट्रेंड है। परंतु हम भोजन करते वक्त क्या देख व सुन रहे हैं इसका प्रभाव भी हमारे मन-भोजन को प्रभावित करता है। आक्रोश भरा दृश्य, उत्तेजना भरा गाना, गोली-बारूद की आवाजें, बहता रक्त, जहरीले-जंगली जानवरों आदि की तस्वीरें हमारे मन-मस्तिष्क एवं रक्तचाप को प्रभावित करती हैं, जिसके चलते हमारा आहार और व्यवहार प्रभावित होता है। ध्यान रखें हम जिस मूड से भोजन करते हैं वैसी ही ऊर्जा को हम अपने भीतर विस्तार देते हैं। कई लोग खाते वक्त कानों में मोबाइल की ‘लीड लगाकर रखते हैं, इससे न केवल ध्यान भ्रमित होता है बल्कि हानिकारक विद्युत तरंगें हमारे स्नायु तंत्र एवं कानों को तो प्रभावित करती ही हैं साथ मेें हमारे भोजन एवं मन के रिश्ते को भी दूषित करती हैं। कहने को भोजन मुंह से किया जाता है परंतु असली खाना वही है जिसे मुंह के साथ-साथ मन से खाया जाए।

भोजन को बस यूं ही रोज की एक आदत या जरूरत समझ कर न खाएं। इसे पूर्ण समग्रता के साथ स्वीकार करते हुए, धर्म एवं होशपूर्वक ग्रहण करें। जब भी भोजन के सामने बैठें तो बड़े प्यार से, धैर्य के साथ थाली में भोजन को देखें। उसके रूप, आकार, रंग एवं ताजगी को ध्यान से देखें। उसकी सुगंध का अनंद लें। भोजन की खेत से थाली तक की यात्रा पर कुछ क्षण विचारें। फिर परमात्मा या प्रकृति को इस बात का धन्यवाद दें कि आपको आज भोजन मिल रहा है। आप भाग्यशाली हैं कि भोजन कर पा रहे हैं।

हाथ जोड़कर अन्न का सम्मान करते हुए अपना आचार व्यक्त करें और फिर भोजन ग्रहण करें।
रोजमर्रा की भागती जिंदगी में यह थोड़ा मुश्किल व अव्यवहारिक लगता है परंतु यदि आप ऐसी आदत डाल सकें तो आप अपने भोजन को एक औषधि के रूप में पाएंगे। एक भिन्न ताजगी, एक भिन्न ऊर्जा को अपने भीतर महसूस करेंगे और धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आपके व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है।

भोजन को पूरे होश और ईमानदारी के साथ खाएं। यह न भूलें कि भोजन हमें ऊर्जा देता है। वह हमारा पेट ही नहीं मन भी भरता है। इसके प्रति पूर्ण समर्पण और स्वीकारोक्ति का भाव रखना चाहिए। यह हमें जीवन ही नहीं सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा भी देता है। हम इसे जिस ढंग व भाव के साथ ग्रहण करेंगे, जीवन व व्यवहार में वही भाव परिलक्षित होगा।