किशोरावस्था में हर लड़की में शारीरिक बदलाव के साथ हार्मोनल बदलाव भी आते हैं। जैसे-जैसे युवा होते हैं कई अंदरूनी बदलावों को महसूस करते हैं। प्यूबर्टी के दौरान कई बार हम इन बदलावों को सहज रूप में नहीं ले पाते और हमारी झिझक कई समस्याओं को जन्म दे देती है। यौवनावस्था के शुरुआती लक्षण  लड़कियां समझ नहीं पाती हैं, भारत में ज्यादातर मांए भी ऐसे वक्त बातें करने से झिझकती हैं जिसकी वजह से अक्सर पीरियड का पता लड़कियों को नहीं लग पाता है न ही वो इसके लिए मानसिक रूप से तैयार होती हैं। यह बता पाना नामुमकिन है कि पहले पीरियड की शुरुआत कब, कैसे और किन परिस्थितियों में हो जाए। यह अवस्था हर लड़की में अलग-अलग होती है। यह शरीर की अवस्था पर निर्भर करता है कि कब हार्मोनल बदलाव के बाद पीरियड शुरू हो। एलकेमिस्ट हॉस्पिटल की डॉ. शैली कपूर माहवारी संबंधित कई समस्याओं और उससे निपटने के उपाय बता रही हैं-

क्या है पीरियड
प्रकृति ने मां बनने या संतान पैदा करने की क्षमता सिर्फ औरतों को दी है। महिलाओं का गर्भाशय वो जगह है, जहां से एक नया जीवन एक नई संतान का विकास होता है। जब एक लड़की यौन परिपक्वता तक पहुंचती है तो उसके गर्भाशय के अंदरूनी सतह पर मोटी और मुलायम सतह बन जाती है जो भविष्य में होने वाले बच्चे के लिए एक मुलायम गद्देदार बिस्तर का काम करती है। अगर महीने में गर्भधारण नहीं होता तो यह पुरानी सतह झड़ जाती है और नई आ जाती है। पुरानी सतह पेशाब के रास्ते रक्तस्राव के रूप में शरीर से बाहर हो जाती है। यह प्रक्रिया लगभग 3-5 दिनों की होती है और पूरी साइकिल लगभग 25 से 35 दिनों की होती है, जिसे मेन्सुरेशन साइकिल कहते हैं।

माहवारी से पूर्व तनाव

बदलते समय के साथ-साथ हमारी लाइफ स्टाइल भी बदल रही है और इन सब बदलावों का असर हमारी सेहत पर भी पड़ रहा है, जिसके कारण अक्सर माहवारी से पहले महिलाओं में तमाम तरह की दिक्कतें होती रहती हैं। यह शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी होती है। अक्सर इस वक्त महिलाओं में तनाव, अवसाद, आत्मसम्मान में कमी, ध्यान में कठिनाई, नींद की समस्या, भूख में बदलाव, थकावट, सूजन, सर में दर्द, स्तन में सूजन और घबराहट, चक्कर आना आदि दिक्कतें हो जाती हैं।

अनियमित माहवारी और भारी रक्तस्राव

 आजकल महिलाओं की जीवनशैली बहुत व्यस्त है। घर-बाहर के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए वे अक्सर स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति अधिक  जागरूक नहीं रहती। इसकी वजह से जब माहवारी प्रारंभ होती है तो कामकाज के बीच तालमेल ना बिठाने की वजह से तनावग्रस्त हो जाती हैं जिसके कारण पीरियड के समय में दर्द व तकलीफ की शिकायतें या अनियमित माहवारी व भारी रक्तस्राव की समस्या हो जाती है। इसके अलावा सबसे बड़ी वजह है गलत खान-पान, जंक फूड और तनाव भरी जिंदगी। कई औरतें तो सिगरेट व एल्कोहल के नशे से भी परहेज नहीं करतीं, उन्हें पीरियड संबंधी कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है।

पीरियड में दर्द
पीरियड्स में थोड़ा दर्द तो साधारण स्थिति है, लेकिन बहुत दर्द गंभीर समस्या हो सकती है। ज्यादा लंबे समय से दर्द भरे पीरियड्स के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लें। साथ ही दर्द को कम करने के कुछ घरेलू उपाय भी अपनाए जा सकते है।

  • पेट के निचले हिस्से में हीटिंग पैड लगाएं पर उसके साथ सोये नहीं।
  • पेट के निचले हिस्से पर उंगलियों के सहारे हल्की मालिश करें।
  •  गर्म पेय पदार्थ पीयें।  हल्का किंतु बार-बार खाएं।
  •  खान-पान ऐसा रखें जिसमें कार्बोहाइड्रेट जैसे- साबुत अनाज, फल और
  • हरी सब्जियां शामिल हों लेकिन ध्यान रहे इनमें चीनी, नमक, एल्कोहल और कैफीन की मात्रा कम से कम हो।
  •  छोटे-छोटे व्यायाम करें जैसे- सीधे लेटे हुए पैर उठाये रखें और साइड लेते समय घुटना मोड़ लें। नियमित रूप से वॉक करें।  आराम की चीजें जैसे ध्यान और योग करें।
  •  विटामिन-बी 6, कैल्शियम और मेगनीशियम वाली दवाएं लें।
  •  गर्म पानी से नहाएं।
  •  अगर आप मोटी हैं तो वजन कम करें, एरोबिक व्यायाम करें।
  •  अच्छी किताबें एवं मनोरंजन के लिए समय निकालें।

पीरियड के दौरान होने वाली छोटी-छोटी समस्याओं से हम आसानी से निपट सकते हैं, बस जरूरत है तो इतनी कि हम अपनी जीवनशैली सुधार लें और साथ ही तनावमुक्त रहने का प्रयास करें। माहवारी के दौरान अपना खान-पान और जीवनशैली सुधार कर इससे होने वाली समस्याओं को कम किया जा सकता है। हालांकि यह हर माह होने वाला चक्र है इसलिए अतिरिक्त तनाव लेने से बचें। हाइजीन का ख्याल रखें और समय-समय पर अंत:वस्त्र भी बदलती रहें। मेडीटेशन का सहारा लें जिससे चिड़चिड़ापन नहीं होगा और माहवारी के दिनों का समय कठिन नहीं लगेगा।