sarzameen Review
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Summary: काजोल की दमदार वापसी ‘सरज़मीन’ में, OTT पर मचाया धमाल

काजोल ने फिल्म ‘सरज़मीन’ में अपनी दमदार परफॉर्मेंस से दर्शकों का दिल जीत लिया है। सोशल मीडिया पर उनकी तुलना फिर से 'गुप्त' वाली काजोल से की जा रही है।

Sarzameen Movie Review: जब परिवार के भीतर ही जंग छिड़ जाए, तो जीत किसकी होगी प्यार की या सिद्धांतों की? कायोज़े इरानी की फिल्म सरज़मीन इसी सवाल को उठाती है, एक ऐसे सैन्य परिवार की कहानी के ज़रिए जो बाहर से अनुशासित और मजबूत दिखता है, लेकिन अंदर से टूट रहा है। काजोल, पृथ्वीराज सुकुमारन और इब्राहीम अली खान इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। देशभक्ति, परवरिश, पीढ़ियों से चले आ रहे ज़ख्म और मौन विद्रोह को एक साथ जोड़ने की कोशिश करती यह फिल्म, दर्शक के मन में कई सवाल छोड़ जाती है खासकर तब जब बेटा अपने ही पिता के खिलाफ बंदूक उठाने को तैयार हो जाए। फिल्म जियोहॉटस्टार पर रिलीज़ हो गई है।

मेजर विजय मेनन (पृथ्वीराज सुकुमारन) एक अनुशासित फौजी हैं जो अपने बेटे हरमन (इब्राहीम अली खान) पर अनजाने में वही कठोरता थोपते हैं जो कभी उन्होंने अपने पिता से पाई थी। हरमन का हकलाना, आत्मग्लानि और अस्वीकार होने का डर, उसे धीरे-धीरे उस राह पर ले जाता है जहां से लौटना आसान नहीं होता। बीच में है मेहर (काजोल), जो बेटे के दर्द को समझती है पर पति की ज़िद के आगे चुप है।

एक ऑपरेशन की असफलता के बाद हरमन उस पक्ष में चला जाता है जिससे उसका पिता लड़ रहा है। यह मोड़ फिल्म को भावनात्मक और वैचारिक उथल-पुथल में डाल देता है। सवाल उठता है कि क्या प्यार, चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, उस घाव को भर सकता है जो वर्षों की उपेक्षा से बना है?

फिल्म की सबसे सशक्त कड़ी काजोल हैं। उनके चेहरे की भाव-भंगिमाएं, संवादों की सादगी और बेटे के प्रति संवेदनशीलता दर्शकों को छूती है। जब कहानी बहकती है, काजोल उसमें स्थिरता लाती हैं।

पृथ्वीराज दमदार हैं, लेकिन खराब डबिंग उनके प्रभाव को कमजोर कर देती है। इब्राहीम ने पिछली फिल्मों की तुलना में बेहतर किया है, खासकर जब उनके किरदार में गहराई या चुप्पी होती है। हालांकि, भावनात्मक दृश्यों में वह थोड़े सीमित नज़र आते हैं। कश्मीर की वादियों को कैमरे ने खूबसूरती से कैद किया है और एक्शन दृश्य सधे हुए हैं।

सरज़मीन उन फिल्मों में से है जो बड़ी बात कहने का इरादा रखती है, लेकिन उसे स्पष्टता से कह नहीं पाती। पात्रों का व्यवहार अचानक बदलता है और कई भावनात्मक मोड़ जल्दी-जल्दी गुजर जाते हैं। यह फिल्म देखने लायक है अगर आप इसके विचारों को महसूस करना चाहते हैं, पर एक ठोस अनुभव की उम्मीद न करें।

कश्मीर की वादियों को देखना मंत्रमुग्ध करता है। एक्शन सीन कसे हुए हैं। लेकिन स्क्रिप्ट बार-बार रास्ता भटकती है। कुछ मोड़ समझ नहीं आते, पात्रों का व्यवहार अचानक बदलता है और दर्शक कहानी से जुड़ नहीं पाते।

अगर आप काजोल की सशक्त परफॉर्मेंस देखना चाहते हैं, तो फिल्म जरूर देखिए। लेकिन अगर आप एक संतुलित और परिपक्व स्क्रिप्ट की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म थोड़ी अधूरी लग सकती है। सरज़मीन दिल छूना चाहती है, पर वह दिल तक पहुंचने से पहले ही भटक जाती है।

एक दर्शक ने सोशल मीडिया पर लिखा, एक बार देखने लायक फिल्म है। कहानी में गहराई है, लेकिन अगर निर्देशन उतना ही दमदार होता, तो फिल्म और पकड़ बना सकती थी। काजोल की एक्टिंग दिल जीत लेती है, कहीं-कहीं ‘गुप्त’ की याद भी आ जाती है। पृथ्वीराज भी अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं और इब्राहीम अली खान पहले से बेहतर लगे। कुल मिलाकर 2.8/5 दूंगा।”

वहीं एक अन्य यूज़र का कहना था, ‘सरज़मीन’ एक औसत से थोड़ी बेहतर फिल्म है, और इसका मुख्य कारण है काजोल, पृथ्वीराज और इब्राहीम अली खान की ईमानदार परफॉर्मेंस। हालांकि फिल्म की कहानी और प्रेज़ेंटेशन कुछ-कुछ ‘मिशन कश्मीर’ जैसे लगते हैं, जिससे मौलिकता का अभाव महसूस होता है। फिर भी, कोशिश ईमानदार है एक बार देख सकते हैं।”

इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि फिल्म में कलाकारों का अभिनय सराहनीय है, लेकिन स्क्रिप्ट और ट्रीटमेंट की वजह से फिल्म उतना असर नहीं छोड़ पाती, जितना इसका विषय छोड़ सकता था।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...