ऑस्कर के सेमिफाइनल में पहुंची 'चंपारण मटन', एक भारतीय मिडिल क्लास जीवन को दर्शाती है यह फिल्म: Champaran Mutton Film
Champaran Mutton Film

Champaran Mutton Film: चंपारण मटन की रेसिपी के बारे में तो हम सभी जानते हैं। बिहार का यह मटन अपने स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है। लेकिन उमा कुमार की फिल्म चंपारण मटन इस मटन के स्वाद नहीं बल्कि इसके जरिए एक मिडिल क्लाास फैमिली के हालात को बयां करने के लिए काफी है। अच्छी बात यह है कि यह फिल्म ऑस्कर के सेमिफाइनल तक पहुंच गई है। यह फ़िल्म पुणे के फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट रंजन उमा कृष्ण कुमार ने बनाई है।

फिल्म में क्या है खास?

फिल्म में अक्सर ही एक नायक अपनी नायिका की फरमाईशों को पूरा करता नजर आता है। लेकिन बात अगर मिडिल क्लास लोगों की होती है तो उनकी जिंदगी की बेसिक जरुरतें भी शौक ही बन जाता है। इस फिल्म के सब्जेक्ट को ही देख लें। नायक नायिका की फरमाईश पर 800 रुपए किलो का मटन लेकर आता है। लेकिन उसकी खुशबू को सूंघकर पड़ोसी चखने आ जाते हैं। वहीं अचानक से मेहमान भी आ जाते हैं। फिल्म कहीं न कहीं इस बात को भी बयां करती है कि महंगाई एक आम इंसान के जीवन को किस हद तक प्रभावित करती है। यह 24 मिनट की फिल्म आपको जरुर पसंद आने वाली है। उमा ने अपने फाइनल सेमेस्टर में प्रोजेक्ट के तौर पर उन्होंने 24 मिनट की यह फ़िल्म बिहार की वज्जिका बोली में बनाई है।

दुनिया भर से आई फिल्मों में बनाई जगह

इस फ़िल्म का सब्जेक्ट उसे आम लोगों से जोड़ता है। फ़िल्म ऑस्कर के स्टूडेंट एकेडमी अवार्ड की नैरेटिव कैटेगरी के सेमीफ़ाइनल में पहुंच गई है। आपको बता दें कि स्टूडेंट एकेडमी अवार्ड चार कैटेगरी में दिया जाता है। 1972 से इस कैटेगरी के तहत फिल्मों का चयन किया जाता है। हर साल एफटीआई अपनी स्टूडेंट्स की फिल्मों को इस कैटेगिरी में भेजता है। इस साल एफ़टीआईआई की कुल तीन फ़िल्मों को ऑस्कर के लिए भेजा गया था। इस बार दुनिया भर से इस कैटेगरी में 2400 फिल्में पहुंची थीं।