50 से भी ज़्यादा राजस्थानी फ़िल्मों में काम करने वाली थिएटर की मंझी हुई अदाकार नीलू वाघेला को स्टार प्लस के सीरियल “दिया और बाती हम” से एक अलग पहचान मिली। भाभो के किरदार ने उन्हें रातों रात घर-घर में पहुँचा दिया । 2011 से 2016 तक लगातार चलने वाले इस सीरियल ने नीलू की ज़िंदगी ही बदल दी। कठोर सास किंतु आदर्शो को मानने वाली नरम दिल माँ की भूमिका में अनेक रंग थे जिन्हें नीलू ने बख़ूबी जिया। सीरियल बंद होने पर दर्शकों ने दिया और बाती को बेहद मिस किया। चैनल के पास अनेकों रिक्वेस्ट आई कि संध्या और सूरज को फिर से छोटे परदे पर लाया जाये। हाल ही में स्टार प्लस ने दर्शकों की चहेती भाभो के साथ इस सीरियल के सीक्वेल की घोषणा की। इसी अवसर पर हुई नीलू से एक मुलाक़ात मुम्बई ब्यूरो चीफ़ गरिमा चंद्रा की। आइए पढ़ते हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश –
 
नए सीरियल में भाभो के किरदार में क्या परिवर्तन आएँगे ?
 
दर्शकों की माँग पर उनकी उम्मीद को पूरा करने के लिए दिया और बाती का सिक्वेल आ रहा है “तू सूरज मैं साँझ पिया की “और मैं उसमें भी भाभो के किरदार में नज़र आऊँगी। भाभो का सिर्फ़ लुक बदल जाएगा। २० साल का लीप लिया है तो उम्र बड़ी दिखेगी ,व्यवहार, ग़ुस्सा और भाभो का फलवेर वही रहेगा ,भाभो के स्वभाव में कोई चेंज नहीं आएगा। अपने नए लुक के लिए मैंने एक चश्मा भी पहना है जिसे पहन कर मुझे मेरी नानी दादी की याद आ गई ,मेरी आँखें नम हो गई और मुझे लगता है कि इस केरेक्टर को जीने में बहुत मज़ा आएगा।
 
सुन ने में आया था कि आप दिया और बाती छोड़ना चाहती थी ?
 
मेरी तबियत बीच में बहुत ख़राब हो गई थी,आप जानते है कि डेली सोप में कितना काम करना पड़ता है, हम बीस- बीस घंटे शूट कर रहे थे, फिर बीच में शो शनिवार और रविवार को भी आने लगा था तो काम का प्रेशर बढ़ गया था। एक भी दिन ऑफ़ नहीं मिल रहा था जिस वजह से मैंने शो छोड़ने का मन बना लिया था किंतु मेरे इस सीरियल का परिवार बहुत स्ट्रॉग है सबने मुझे हिम्मत दी ,मेरा साथ दिया और मैं काम कर पाई।
 
एक ही किरदार को लगातार करने से आपकी प्रतिभा कही दब तो नहीं गई ?
 
टेलिविज़न पर दिया और बाती मेरा पहला शो था और मुझे इस शो के माध्यम से नेम फ़ेम प्यार सब मिला। यह भाभो का किरदार मेरे दिल के बहुत ही क़रीब रहा है मुझे इस रोल को कर के संतोष और सुकून भी मिला। मैंने बहुत सारी फ़िल्में की थिएटर भी किया उस समय भी मैं ऐक्टिंग कर रही थी। लेकिन भाभो का किरदार करके मेरा सब कुछ बदल गया। मैं आज भी थियेटर करती हूँ मैंने अपने उन दर्शकों को बिल्कुल भी नहीं छोड़ा है। मैं आज भी वैसी ही हूँ जैसी पहले थी। थियेटर बैक ग्राउंड का फ़ायदा भी होता है तो आप में कॉन्फ़िडेन्स ज़्यादा होता है, कैमरा का डर नहीं होता और अगर आप में लगन है तो फिर सोने में सुहागा हो जाता है। अभी मुझे कॉमडी करने का मन है लोगों को हँसाने का मन है ।
 
ज़िंदगी का सबसे कठिन समय कब था ?
 
सबसे कठिन समय था जब दिया और बाती का आखिरी एपिसोड की शूटिंग हुई दरअसल लोगों को शायद ये बात समझ ना आए लेकिन हम सब उस सीरियल से इतना जुड़ गए थे कि उसका अंत होना हमारे लिए बहुत कठिन था। जैसे अगर परिवार का कोई सदस्य कहीं चला जाए तो हम सब उसे मिस करते है वैसे ही हम अपने सीरियल को मिस कर रहे थे । यह भाभो का किरदार तो मेरे घर तक चला जाता था जब मैं ज़्यादा अनुशासन करती थी तो मेरे दोनो बच्चे कहते थे कि मम्मा इतना कंट्रोल मत करो आप सेट पर नहीं है। आप घर पर है।
 
गृहलक्ष्मी की रीडर्ज़ के लिए सन्देश ?
 
महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में काम करने की आज़ादी है उनमें एक अलग शक्ति होती है जो भी करना चाहे कर सकती है परिवार का सहयोग ना मिले तो डरना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें समझना चाहिए। वे घर परिवार की सम्भालने की ताकत रखती है साथ ही बाहर का काम भी होशियारी से कर सकती है ।