छांव- गृहलक्ष्मी की कहानी
Chaav

Grehlakshmi ki Kahani: मन को छूकर जाती हवा, संतोष को एक मीठा सा एहसास दिला रही थी। गांव की पगडंडियां और शहर जाते दोनों रास्ते धूल से भरे हुए थे। पगडंडियों से घर का सफर उसे एक सुखद अनुभूति से भर रहा था। सुबह-सुबह कुएं पर पनिहारिनियों को देखकर वह उन औरतों में अपनी मां को भी खोज रहा था।
शहर की भागा-दौड़ी से गांव की शांत बयार उसे एक नई ऊर्जा से भर रही थी। मन के उहापोह में वह गांव तो आ गया था लेकिन भविष्य की चिंता उसे बहुत बेचैन कर रही थी। तभी उन पनिहारिनियों की खिलखिलाहट उसके कानों पर पड़ी, वह कुछ पल वहीं ठहर गया। तभी अचानक उसकी नजर निम्मो पर पड़ी। निम्मो भी शहरी बाबू को देख ठिठक गई। जब वह कुछ पल वहीं खड़ा रहा तब उसने हौले से मुस्कुरा कर उसका स्वागत झुकी नजरों से किया। वह मुस्कुरा कर जवाब देकर वहां से चल पड़ा।
उसने अपने घर का संकरा सा दरवाजा खोला और आंगन में प्रवेश किया। तभी उसने देखा कि पूरा आंगन पत्तों से बिखरा पड़ा था मानों कई दिनों से आंगन में किसी ने बुहारा नहीं हो। पेड़ अमिया से लदा पड़ा था। वह चरमराते पात पर पांव रखकर घर में प्रवेश कर गया।
लाइट टिमटिमा रही थी, मां पलंग पर लेटी थी वह मां के करीब आकर बोला, ‘मां देखो मैं आ गया।’
मां की आवाज में दर्द था बोली, ‘बेटा कितने दिनों के लिए आया है, कहीं तेरी तनख्वाह तो नहीं कट जाएगी।’
‘मां, तू उसकी चिंता ना कर, मुझे तेरी चिंता ज्यादा है।’ मां की आंखों में वह दिन चलचित्र की तरह चल पड़ा। जिस दिन संतोष के पिता की अर्थी जल रही थी उसी दिन संतोष ने शराब के नशे में मां को कितना कुछ सुनाया था। इस छोटे से गांव में क्या रखा है, सब शहर जाकर बड़े आदमी बनते हैं। मुझे भी कुछ करना है, बड़ा आदमी बनना है। मुझे नहीं रहना इस दो कमरों के कच्चे मकान में, तुमने मुझे क्या सुख दिया है। सारी जिंदगी रो-रोकर मेरे स्कूल की फीस भी नहीं भरी मुझे मालूम है। मैंने स्कूल मास्टर और औरों से कितने ताने सुने। लोग मुझे कितने हीन भाव से देखते थे। अनेक बातें मां को सुनाकर वह मां को भाग्य के सहारे अकेला छोड़ कर शहर भाग गया था।
आज पूरे 7 साल बाद शंकर के साथ अचानक मां की सुध लेने आ गया। वह सोच रही थी कि सूटकेस की चटकनी ने उसकी तंद्रा भंग की वह हौले से उठ बैठी। उसने सूटकेस खोला एक साड़ी मां के आंचल में रख कर बोला, ‘मां यह तुम्हारे लिए है।’ सुंदर सी साड़ी देख मां बोली, ‘अब कहां इस उम्र में चटक रंग पहनूंगी, तेरे बापू होते तो एक बार सोच भी लेती। रख दे तेरी शादी होगी तो लाडी को पहना दूंगी, तू ने शहर में तो कहीं शादी नहीं कर ली। मां ने उसकी आंखों में आंखें डालकर संशय से पूछा।’
‘नहीं मां, शहर की लड़कियां सिर्फ जरूरतमंद लोगों से ही दोस्ती करती हैं, हम जैसे फकीरों से नहीं!’ कहते हुए शहर के प्रति बनी उसकी छवि अंधकार में विलीन हो रही थी। तभी दरवाजे की सांकल बजी। मां तो उसके कदमों की आहट पहचान लेती थी क्योंकि वह रोज ही आकर मां की जरूरतों का सामान दे जाती थी। कदमों की आहट पहचान मां संतोष से बोली, ‘जा, सांकल खोल दे, निम्मो आई होगी।’
उसने सांकल खोली तो देखा निम्मो हाथ में दूध का लोटा लिए खड़ी थी, उसने दरवाजे से अपना हाथ हटाया और उसने निम्मो को आंखों से अंदर जाने का संकेत दिया। आंगन में पड़े पात पर उसकी पायल और पत्ते की चरमराहट एक मधुर धुन की तरह बज रही थी। निम्मो ने दूध का लोटा चूल्हे पर रखते हुए कहा, ‘अम्मा अब कल से हम नहीं आएंगे, संतोष आ गया है।’
संतोष की मां उसे अपने पास बैठाते हुए बोली, ‘अरे यह तो परदेसी है बेटा, पता नहीं कब निकल जाएगा, तू तो मेरी जरूरत है, रोज आ जाया कर।’
संतोष ने निम्मो को देखा उसकी नागिन सी चोटी उलझे बालों में भी सुंदर नजर आ रही थी। पांव की पायल हाथों में लाल चूड़ियां उसके रंग को और निखार रहे थे। आज पहली बार निम्मो को इतने करीब से देखा था। स्कूल में तो घमंडी-सी, बिना नहाए आती थी। अब देखो कितनी साफ-सुथरी है। वह सोच ही रहा था कि तभी मां बोली, ‘खड़ा क्या है, चल चाय बना दे। मुझे दवा खानी है, रोज निम्मो ही बनाती है, आज तू बना दे।’
तभी निम्मो बोली, ‘रहने दो अम्मा, थक कर आया है बेचारा। आज सुस्ताने दे, मैं ही चाय चढ़ा देती हूं।’ कहते हुए उसने अपनी चोटी को घुमाकर पीछे किया, वह चोटी संतोष के चेहरे पर एक कोमल स्पर्श दे गई। वह मां के करीब बैठ चाय की चुस्कियां ले रहा था उसकी नजर आम के बौराए पेड़ पर पड़ी।
नन्ही-नन्ही बौरो से पूरा पेड़ एक भीनी-भीनी खुशबू दे रहा था। चाय का कप उठाकर वह उस पेड़ के नीचे खड़े होकर पेड़ को ध्यान से देख रहा था। तभी पायल और चूड़ियों की मिली-जुली आवाज उसको अपने पीछे महसूस हुई। पीछे से आकर निम्मो बोली, ‘देख संतोष, तू इस पेड़ पर नजर मत डाल मैं इसे बेचने नहीं दूंगी, इतना पुराना पेड़ है। इस बार भरभरा कर आम देगा। सात सालों से गांव के लोगों की नियत इस पेड़ पर लगी है। लोग आम तोड़कर मार्केट में बेच देते थे, अम्मा को पता ही नही चलता था। दो सालों से मैंने किसी को भी आने नहीं दिया मंडी के दीनू काका को बोल देती हूं। वह यहां आकर आम तोड़ कर ले जाते हैं और पैसे अम्मा को दे जाते हैं। अम्मा की दवा का खर्च निकल आता है। तुम्हारा क्या तुम तो फिर दो दिनों के बाद शहर चले जाओगे।’ कहते हुए निम्मो ने उसके हाथ से खाली कप लिया।
संतोष टकटकी लगाए उस घने वृक्ष को गौर से देख रहा था। मन में उम्मीदों के दिए जगमगाने लगे। उसने पास पड़ी झाड़ू उठाई और आंगन बुहारने लगा। निम्मो विस्मयी नेत्रों से उसे देखने लगी शहरी बाबू के हाथों में झाड़ू देख वह खिलखिला उठी। उसकी खिलखिलाहट संतोष को रोमांचित कर रही थी।
मां अंदर खाट से दोनों को देख कर बोली, ‘यह क्या हंसी-थट्टा लगा रखा है। सुबह-सुबह कुछ काम नहीं है क्या? निम्मो इतनी देर तो तू कभी रुकती नहीं है।’ अचानक इन शब्दों को सुनते ही निम्मो शर्माकर सकुचाती हुई घर के बाहर निकल गई।
संतोष उसकी मटकती चोटी को दूर तक जाते देख रहा था। वह अम्मा के करीब आकर उसकी गोद में सिर रखकर गहरी सांस लेकर बोला, ‘अम्मा क्या तुम्हें मेरा यहां आना अच्छा नहीं लगा?’ अम्मा उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘कौन सी मां ऐसी होगी, जिसे अपने बेटे का करीब आना अच्छा ना लगे।’
बीमारी में एक निम्मो ही है, जो आकर दूध दे जाती और थोड़ा बहुत काम भी कर देती है।’
‘तू परेशान ना हो अम्मा, अपना और तेरा काम हम कर लिया करेंगे।’ कहते हुए उसने पास पड़ी झाड़ू उठाई और कमरा झाड़ने लगा। उसने आंगन के चबूतरे पर पड़े पत्तों के ढेर को देखा। उसने सारे पत्ते इक्कठे किए उन्हें बाहर फेंका और नहा-धोकर तैयार हो गया।
तभी सांकल बजी। सामने निम्मो हाथ में टिफिन लिए खड़ी थी। उसने सोचा नहीं था कि कुछ ऐसा भी देखने को मिलेगा। संतोष उसे देखा बोला, ‘अब हम आ गए हैं, तुम्हें अब अम्मा की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं!’
निम्मो की आंखें नम होने लगी, वह मुड़कर वापस जाने लगी। तभी अम्मा की आवाज उसके कानों पर पड़ी, ‘काहे उसके पीछे पड़त है, वह मेरी सुख-दुख की साथी है। निम्मो तू इसकी बेफिजूल की बातों पर ध्यान नाहीं दे।’
उसने चूल्हे की खिचड़ी उतारकर वहीं पास के आले में रखी, थाली-कटोरी निकाली और अम्मा और संतोष की थाली लगाने लगी। तुम भी जीम लो हमारे साथ आज, संतोष ने पास रखी चौकी पर बैठते हुए कहा।
निम्मो जब सात साल की थी तभी उसकी अम्मा गुजर गई थी। सारे घर की जिम्मेदारियों को निम्मो ने संभाल ली थी। संतोष की अम्मा से ही मां का दुलार मिलता रहा। तब से ही इस घर से उसका लगाव बन गया था। तब से लेकर आज तक दोहरी जिम्मेदारियां निभा रही थी। जिसने मां का दुलार दिया उसके प्रति भी तो कोई जिम्मेदारी होती है वही पूरा कर रही हूं। यही सोच निम्मो खाली टिफिन समेटने लगी और घर की ओर निकलने लगी।
संतोष उसके पीछे-पीछे अपनी थाली वहीं छोड़कर भागा और फूलती सांस को रोकते हुए बोला, ‘रुको- रुको…तो, तुमसे कुछ कहना है।’ कहते हुए उसने निम्मो का हाथ पकड़ लिया।
निम्मो के कदम अचानक ठिठककर रुक गए। उसे ऐसा लगा जैसे हवा के तेज झोखे ने उसके पांव को जकड़ लिया हो। वह सहम गई, ‘काहे अकेले में रोका’, कहते हुए वह कंक्रीट की सड़क पर तेज-तेज चलने लगी और नीम के पेड़ के पास आते-आते उसकी चप्पल टूट गई। संतोष ने लपककर उसकी टूटी चप्पल उठाई और गहरी सांसे लेते हुए बोला, ‘हमसे ब्याह करोगी?’
निम्मो आंखें चुराकर पूछ बैठी, ‘काहे? तुम्हें यह खयाल कैसे आया, तुम तो फिर भाग जाओगे। यहां हमारे बापू और अम्मा का ख्याल कौन रखेगा?’
‘हम रखेंगे दोनों का ख्याल, अब हम शहर नहीं जाएंगे। बहुत धक्के खाकर आए हैं, अब यहीं काम करेंगे।’
‘यहां क्या काम है तुम्हारे लायक, तुम तो शहरी बाबू हो।’ कहते हुए निम्मो के शब्दों में नाराजगी झलकने लगी।
‘नहीं-नहीं ऐसे ताने मत मारो, हम भी यहीं की माटी में पले-बढ़े हैं। हम अब नहीं जाएंगे, हमने सोच लिया है।’
‘तुम्हारी बात तो ठीक है पर काम क्या करोगे?’
‘इस बार आम के पेड़ पर बहुत बौर आया है, हम और आम के हाइब्रिड पौधे लगाएंगे और आम का व्यापार करेंगे।’ कहते हुए उसने निम्मो का हाथ और कस कर पकड़ लिया।
निम्मो शर्म से लाल होते हुए बोली, ‘हमारे लायक कोई काम हो तो बताना, हम मिलकर काम करेंगे।’ निम्मो को संतोष का यह फैसला एक नई ऊर्जा से भर गया। बचपन का साथी जीवन साथी बनने की बात कर रहा था।
गांव की हवा आज उसे कुछ अलग ही सुखद अनुभूति से भर रही थी। वह अपने घर जाकर बापू को यह खुशखबरी सुनाना चाहती थी वह भागकर घर की ओर चल दी। संतोष उसे दूर तक जाते देख रहा था। वह घर आया तो आम के बौरों से लदा-फदा पेड़ देखकर उसकी खुशियां दुगनी हो गई। अम्मा को अपने मन की बात कही तो अम्मा ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेर कर आशीर्वाद देते हुए बोली, ‘बेटा तेरा यह फैसला, मेरे लिए तो स्वर्ग के सुख जैसा है। बुढ़ापे में यदि बेटा पास हो तो उससे बड़ा सुख बड़े बुजुर्गों के लिए और क्या होगा। तभी सांकल बजी हल्की बूंदाबांदी पानी के छींटे गिरने लगे थे। निम्मो खुशी से चहकते हुए बोली, ‘बापू राजी हो गए हैं।’

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