Hindi Novel Kacche Dhage | Grehlakshmi
Kacche Dhage hindi novel by sameer

“अरे मां सुन तो सही।”

“कमीने…कॉलेज से निकलकर अपना भविष्य बर्बाद कर लिया।”

“मां…वह तो।”

“मुझे सब कुछ मालूम हो गया है…तूने एक शरीफ लड़की के साथ बेहूदगी की थी…इस कारण तुझे कॉलेज से निकाल दिया गया है।”

कच्चे धागे नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

“मां…मैं उस लड़की से मुहब्बत करता था।”

“मुहब्बत के बच्चे…तू कल रात शराब पीकर आया था।”

“वह तो कोई बुरी लड़की है देवयानी‒क्लासफैलो है उसका बर्थडे था।”

“तो अब तू बुरी लड़कियों की संगत में रहने लगा है?”

“तुम्हारी सौगन्ध मां…अब नहीं रहूंगा।”

“आज तेरी खाल उधेड़ कर रख दूंगी।” और सचमुच उसकी मां रीमा ने दो-एक सोटियां उसकी पीठ पर टिका ही दीं।

“मां, अब तो सच्चे मन से सौगन्ध खाएला है…अब किसी लड़की की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखूंगा। सब साली एक जैसी होती हैं।”

रीमा ने दांत किचकिचाकर कहा‒”क्या बकता है? बहनें, बेटियां, मांएं, मौसियों तू सबको बुरा बोलता है।”

“नहीं मां… तेरे पाय लागूं। मेरे मन में कुछ नहीं…मैं सबका मान करता हूं… यह तो अचानक वास्ता साथ पढ़ती एक लड़की से पड़ गया…उसने मुझे बहकाने की कोशिश की थी। मगर मां का आशीर्वाद मेरे साथ था…बच गया।”

“अच्छा! तूने सबके सामने उसे छेड़ा होगा न…तभी तुझे कॉलेज से निकाल दिया होगा।”

“अब क्या बताऊं मां…तेरी समझ में नहीं आएगा।”

अभी वह कुछ और कहने ही वाला कि अचानक विवेक की निगाहें अंजला पर पड़ीं जो थोड़े फासले पर खड़ी उनकी बातें सुन रही थी…अचानक उसके तेवर बदल गए और उसने छलांग लगाकर अन्दर घुसने की कोशिश की। रीमा हाथ में सोटी लिए बेटे को मारने के लिए लपकी तो आवाज सुनकर ठिठक गई‒असल में अंजला ने पुकारा था।

“विवेक…मेरी बात सुनो।”

विवेक ने अंजला को गुस्से और घृणा से घूरकर कहा‒”साली…चल भाग यहां से…वरना दूंगा एक झापड़, थोबड़े का नक्शा बदल जाएगा….मुझे बेकार मां से पिटवाया…मुहल्ले-भर में बदनाम कर दिया…यहां तक कि कॉलेज से भी निकलवा दिया।”

“अरे रे…क्या बकवास कर रहा है?” रीमा ने हड़बड़ाकर कहा‒”क्या लड़कियों से बात करने का यही ढंग है?”

“मां! ऐसी बिगड़ी लड़कियां यही जबान समझती हैं।”

“यह लड़की है कौन?”

“वही साली जिसको अपन ने प्यार करना शुरू किया था।”

“हाय राम! जिससे प्यार करते हैं उससे इस तरह बात करते हैं? चल भाग अंदर।”

विवेक हडबड़ाता हुआ अन्दर चला गया तो रीमा ने नर्मी से अंजला से पूछा‒”क्या नाम है तुम्हारा बेटी?”

“जी….अंजला…अंजला भाटिया।”

“अच्छा…तुम ही वह अंजला हो जिसके कारण इस पागल लड़के को कॉलेज से निकाल दिया गया है।”

“जी…मगर मुझे अपनी भूल का एहसास है‒मैं इनका नाम दोबारा कॉलेज में लिखवा दूंगी।”

“क्या करेगी बेटी लिखवा के…यह नालायक पढ़ने-लिखने वाला नहीं।”

“मां जी! आप गलत समझ रही हैं…विवेक तो सबसे अच्छा स्टूडेंट है…सिविल इन्जीनियरिंग कॉलेज का आखिरी साल है।”

“सिविल…काहे का इन्जीनियर होता है?”

“जी…जो बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बनवाते हैं…आप देखिएगा, वह कॉलेज में फर्स्ट आएगा…उसे नौकरी मिलने में भी देर नहीं लगेगी।”

“अच्छा तू बता कि तूने इसे कॉलेज से बदनाम करके क्यों निकलवाया?”

अंजला के चेहरे पर जैसे गुलाल छिड़क गया। उसने कहा‒”बस गुस्सा आ गया।”

“मैंने सुना है इसने बहुत सारे लोगों के सामने तुमसे बदतमीजी की थी।”

“जी….विवेक बहुत भला और सीधा-सादा होनहार लड़का है‒मैंने समझने में गलती की थी।”

“फिर अच्छाई क्या है इसमें…यह नालायक तो कल रात दारू भी पी कर आया था।”

“मां जी शराब ही एक ऐसा नशा है जो आदमी के असली व्यक्तित्व से पर्दा हटा देता है। कल रात अगर विवेक शराब न पीता तो मुझे भी मालूम न होता कि विवेक के अन्दर कितना नेक और शरीफ इन्सान छुपा हुआ है।”

“अच्छा!”

“हां मांजी…मैं विवेक से मिलना चाहती हूं।”

“लेकिन बेटी…हम लोग तो तुम्हारे बराबर के नहीं…गरीब लोग हैं‒छोटी-सी मामूली खोली में रहते हैं।”

“तो क्या हुआ! खोलियों में भी इन्सान ही रहते हैं…और फिर हीरे तो प्रायः गुदड़ी में ही छिपे मिलते हैं।”

“धन्य हो बेटी‒सुना था…बड़े होकर लोग घमण्डी हो जाते हैं…विवेक के पिताजी का भी एक लंगोटिया दोस्त था…पढ़-लिखकर कारोबार किया तो सेठ बन गया…अब देखता है तो मुंह फेर लेता है।”

“हां मांजी…पांचों उंगलियां तो बराबर नहीं होती।”

“धन्य हैं बेटी वो मां-बाप जिनकी तू सन्तान है…चल, मेरे साथ आकर देख ले।”

रीमा उसको साथ लेकर जब बस्ती में दाखिल हुई तो बस्ती के लोग उसे ऐसे देखने लगे जैसे कोई ‘अजूबा’ आ गया हो। रीमा उसे खोली तक लाई…विवेक जल्दी से शर्ट बदलकर बाहर निकल आया। फिर अंजला को देखते ही उसके नथुने फूल गए।

“काहे को लाई हो…इस नीच को इधर?”

“बताऊं तुझे।” रीमा ने आंखें निकालकर सोंटी उठाई‒”कॉलेज में पढ़कर भी तमीज नहीं आई, अरे यह तेरा कॉलेज में दोबारा दाखिला कराने आई है।”

“अपन को नहीं चाहिए इसका उपकार।”

“विवेक!” अंजला ने कहा‒”मैं तुमसे अकेले में कुछ बात करना चाहती हूं।”

रीमा ने कहा‒”तुम लोग बातें करो…मैं चाय बनाकर लाती हूं।”

जब मां चली गई तो विवेक ने अंजला को घूरकर कहा‒”तबियत खुश हो गई मां से मार खिलाकर।”

“मां की मार तो खुशनसीबों को मिलती है।”

फिर विवेक ने एक स्टूल साफ करके उसे सरकाकर कहा‒”ले बैठ इधर…और कान खोलकर सुन ले, मैं देवयानी जैसी लड़कियों पर धिक्कार भेजता हूं।”

“फिर भी तुमने देवयानी के साथ जुहू बीच पर रंगरलियां मनाई थीं।”

“अरे…वह तो मुझे तुम्हारे योग्य बनाने को ही तो ले गई थी।”

“मेरे योग्य!”

“और क्या? अपन का प्रेम-गुरु है महेश…उसकी दी हुई शिक्षा फेल हो गई…तू टस से मस नहीं हुई….तब देवयानी ने कहा कि वह मुझे ऐसी शिक्षा दे सकती है कि मैं तुझे राजी कर लूं।”

“इसीलिए तुमने लायब्रेरी में मुझे खींचकर अपने सीने से चिपटा लिया।”

“हां, बिल्कुल यही।”

“मैंने तुम्हें कॉलेज से निकलवा दिया‒क्या तुम इसका बदला लेना चाहते थे?”

“बदला मर्द मर्द से लेता है…मर्द औरत से बदला नहीं लेता।”

“फिर क्या करना चाहते थे तुम मेरे साथ?”

“वही जो देवयानी के साथ किया था।”

“फिर तुमने वह क्यों नहीं किया?”

“एकाएक किसी अज्ञात शक्ति की चेतावनी ने मुझे झिंझोड़ दिया‒अचानक विचार आया कि देवयानी भी तो यही कुछ कराती है…इसका मतलब हुआ कि तुझमें और देवयानी में कोई फर्क ही नहीं रहा…धिक्कार ऐसी लड़की पर जो सबको अपनी तरह एक हमाम में नंगा करके नाच नचाना चाहती है…विलासिता की भी सीमा होती है…सतीत्व ही स्त्री का सबसे बहुमूल्य गहना होता है। धिक्कार है उस लड़की पर।

“जूली ने भी मुझे यही बताया था। जानते हो, जब तुम यह सब कुछ कर रहे थे तो मैं होश में नहीं थी।”

“जानता हूं…मगर मैं पूरे होश में था इसीलिए ईश्वर ने मुझे इस पाप से बचा लिया।”

देवयानी ने मेरी विस्की में तेज नशे की गोली डाल दी थी।”

“फिर भी देवयानी जैसी भी है सबके सामने है…उसका चरित्र सभी जानते हैं।”

“मेरी बात का यकीन करो…वह मुझसे जलती है, इसलिए कि उसके मुकाबले में लोग मुझे शरीफ समझते हैं।”

“और जूली के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?”

“जूली एक-सच्ची क्रिश्चियन है…उससे क्राइस्ट की कसम देकर पूछ लेना कि जो उसने देखा और समझा वह सब सच था या नहीं‒तुम्हारे सामने यह सफाई मैं इसलिए दे रही हूं कि मुझे तुम्हारे भीतर एक अच्छा आदमी छुपा महसूस हो रहा है…और…और मैंने अभी तुम्हारी मां को देखा है‒कितनी मेहनत कितने अरमानों से उन्होंने तुम्हें इतना पढ़ाया है…उनकी मेहनत बेकार न जाए…उनका बुढ़ापा अच्छा कटे इसीलिए मैं तुम्हें दोबारा दाखिला दिलाना चाहती हूं…और फिर यह तुम्हारा आखिरी साल भी है‒अगर तुम्हें जूली की बात पर विश्वास है और मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी का जरा भी एहसास है तो कल कॉलेज चले आना…और अगर नहीं तो तुम्हारी इच्छा…मुझे तुम्हारी कोई परवाह नहीं…।” इतना कहकर वह तेजी से बाहर चली गई….विवेक हक्काबक्का खड़ा रह गया‒उसे यह भी मालूम नहीं था कि उन दोनों की सारी बातें उसकी बूढ़ी मां छुपकर सुन रही थी।

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