Hindi Novel Kacche Dhage | Grehlakshmi
Kacche Dhage hindi novel by sameer

बड़ी मुश्किल से विवेक ने इन्टरवल तक के पीरियड गुजारे। रिसेस की घंटी बजते ही वह तेज-तेज बाहर निकला और एक स्टूडेंट से पूछा‒

“अरे…वो…प्रिन्सेस डायना कहां है?”

“कौन प्रिन्सेस?”

“अरे….अपन की प्रेमिका अंजला।”

कच्चे धागे नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

“उधर लायब्रेेरी में स्टडी कर रही है।”

विवेक तेज चलता हुआ लायब्रेरी में आया…जूतों की आहटें सुनकर सब चौंककर देखने लगे…लेकिन अंजला इतनी व्यस्त थी कि वह हिली तक नहीं…विवेक ने उसके पास पहुंचकर अपने हाथ में थमी फाइल जोर से मेज पर पटक दी। अंजला ने चौंककर गुस्से से विवेक को देखकर कहा‒”यह क्या बदतमीजी है?”

“बदतमीजी नहीं….प्यार का सिग्नल है।”

“व्हाट नॉनसेंस।”

“देखो अंजला…अब मैं तुम्हें प्रेम करना सिखाने के योग्य हो गया हूं…और सिखाकर ही रहूंगा।”

“क्या बकवास कर रहे हो?” गुस्से से लाल होती वह बोली।

विवेक ने झट उसे कंधों से पकड़ कर खींचकर अपने सीने से लगा लिया। अंजना बिलबिलाकर अपने आपको छुड़ाने की कोशिश करती रही…हॉल में बैठे सब लड़के-लड़कियां आश्चर्य से खड़े होकर देखने लगे थे…एकाएक लायब्रेरियन भी अपनी सीट से उठकर झपट कर उस मेज पर आ गया। बड़ी मुश्किल से कई लड़कों ने मिलकर विवेक को खींचकर अंजला को उससे छुड़ाया…विवेक की खासी पिटाई भी हुई।

थोड़ी देर बाद इस असाधारण मूर्खतापूर्ण घटना की खबर प्राक्टर तक पहुंची‒अंजला स्वयं बिफरी हुई शिकायत करने आई थी….अंजला और विवेक दोनों प्राक्टर के कमरे में थे‒बाहर लड़कों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी।

प्राक्टर ने गुस्से से विवेक को देखकर कहा‒”सीनियर स्टूडेंट होते हुए ऐसी नीच हरकत करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई‒वह भी लायब्रेरी में सबके सामने?”

“आपको शर्म आती है सर!”

“व्हाट नानसेन्स! बददिमाग लड़के…तुम होश में हो?”

“आप फिल्में देखते हैं…टी.वी. देखते हैं…हीरो जब अपनी हीरोइन को पाने की कोशिश करता है तो आप सब लोग मानसिक रूप से हीरो के पक्ष में होते हैं…अगर मैंने असली रूप में वही बात की है तो कौन-सा अपराध किया है…मैं इस ‘गधी’ से प्यार करता हूं।”

“क्या कहा?” अंजला गुर्रा कर बोली‒”मैं गधी हूं?”

“और क्या? साली, प्यार का जवाब प्यार होता है…दुलत्तियां झाड़ना नहीं….क्या तुम्हारे सीने में दिल नहीं….पत्थर है।”

“बहुत हो गया सर!” अंजला ने गुस्से से हांफते हुए प्राक्टर से कहा‒”आप इस नीच के मुंह में लगाम दीजिए….वरना….वरना।”

“वरना….क्या करेगी तू? यह तो प्रेम-ग्रंथ का पहला पाठ है‒अब भी तुम्हें मुझसे प्यार नहीं हुआ तो आगे कई लैसन और भी हैं।”

“सर!” अंजला ने प्राक्टर से कहा‒”मैं अपने पापा को फोन करती हूं।”

“बुला ले…इधर ही तेरा हाथ मांग लूंगा…कॉलेज कम्पाउण्ड से दूल्हा बनकर निकलूंगा।”

“शटअप।” प्राक्टर ने मेज पर हाथ मारकर कहा‒”तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें तमीज नहीं सिखाई?”

“सर! तमीज सिखाने के लिए ही तो यह स्कूल और कॉलेज खोले गए हैं…’को-एज्यूकेशन’ शुरू की गई है…लड़का और लड़की मिलेंगे…मेलजोल बढ़ेगा तो आपस में प्यार तो होगा ही…इसी में समाज की भलाई है।”

“तुम बदतमीज और मुंहफट हो‒अनसोशल…कॉलेज के प्रिन्सिपल से कहकर ‘रिस्टीकेट’ करा दूंगा‒कम से कम तीन बरस के लिए।”

“करा दीजिए रिस्टीकेट सर।” विवेक ढिठाई से बोला‒”मैं भी सच्चा प्रेमी हूं…और अंजला ही मेरी जीवनसाथी बनेगी…और उसे अपनाकर ही छोड़ूंगा।”

“गैट लास्ट! दफा हो जाओ…अभी कॉलेज कम्पाउण्ड से बाहर निकल जाओ।” और चपरासियों ने उसे धकेल कर गेट से बाहर निकाल दिया….उसकी फाइल भी लड़के ने लाकर दे दी।

विवेक ने गेट के बाहर खड़े होकर झुंझलाए स्वर में धमकी दी‒”साली अपन की प्रेमिका होशियार रहना…अब तेरे प्रेमी पर कोई पाबंदी नहीं रही…अब देखना विवेक कैसा ‘डैंशिग’ आशिक है।”

फिर वह तेज-तेज सड़क पर चल पड़ा….कुछ देर बाद ही पीछे से देवयानी की गाड़ी आ गई…उसने विवेक के पास पहुंचकर स्पीड कम कर ली और हाथ हिलाकर चिल्लाई‒”विवेक…रुक जाओ…लगता है कुछ बात हुई है?”

विवेक गुस्से से बोला‒”साली…अच्छी प्रेम शिक्षा दी। उस साली अंजला को कितना सिखाया, समझाया मगर कोई असर ही नहीं हुआ। तुम झूठ बोलती हो। दरअसल प्रेम शिक्षा तुम्हें स्वयं नहीं मालूम।”

“आज मैं तुम्हें असली प्रेम शिक्षा पढ़ाऊंगी।”

“पक्का।”

“एकदम पक्का।” और विवेक देवयानी के साथ बैठ गया और देवयानी ने कहा‒”तुम्हारा प्रेम-गुरु एकदम उल्लू का पट्ठा है।”

“वह तो है ही…वह साला बाप…इतनी दौलत इकट्ठी कर रखी है, मगर प्यार का एक ‘अक्षर’ नहीं आता।”

विवेक ने कहा‒”मिस्टेक अपने ही अन्दर है…मुझे उसने इतने लम्बे-लम्बे डायलॉग रटवाए कि मैं बौखला गया।”

“उसे मुहब्बत प्रकट करने का ढंग नहीं आता…किस समय, कौन-से डायलॉग के साथ चेहरे पर कैसे भाव आने चाहिए….वास्तव में अपना एक्सप्रेशन ऐसा होना चाहिए कि पूरे ‘इमोशन’ के साथ सामने वाले के दिल में उतर जाए…जैसे फिल्मों में ले लो…दिलीप कुमार और दारा सिंह….जब अपना प्यार व्यक्त करने में सफल नहीं होता तो जानते हो क्या करता है?”

“क्या करता है?”

“बी प्रेक्टिकल, वह लड़की को उठाकर ही ले जाता है और बाद में उससे शादी कर लेता है…और यही मैं बताना चाहती थी कि तुम दिलीप कुमार स्टाइल प्रेम के चक्कर में मत पड़ो….दारा सिंह स्टाइल की मुहब्बत करो…लड़की को उठाकर ले जाओगे तो शादी करनी ही पड़ेगी।”

“वही तो मैं भी सोच रहा हूं, लेकिन कैसे?”

“तुम्हारा प्रेम गुरु एकदम होपलेस आदमी है। आज तुमने अंजला को सबके सामने जो प्यार किया है…वही प्यार अगर तुम उसे अकेले में करते तो अंजला का व्यवहार और ही होता।”

“क्या मतलब?”

“खुलेआम में अच्छा खासा तमाशा बन जाता है…बदनामी होती है।”

“मगर वह साली एकांत में मिली ही कब?”

“अरे मौके का इन्तजार करते-शायद कुंज में पहुंच जाती।”

“मगर अब तो मुझे कॉलेज से ही निकाल दिया गया है।”

“देखो विवेक! कल मैं अपना ‘बर्थडे’ मनाने वाली हूं…अपने दोस्तों को बुला रही हूं…अंजला को भी बुलाऊंगी…तुम भी आमन्त्रित हो। आगे मैं तुम्हें ढंग बता दूंगी।”

“ठीक है…अपन को उधर ही छोड़ दो जहां से बस पकड़नी है।”

“नहीं…मैं अपनी गाड़ी से तुम्हें ड्रॉप किए देती हूं।”

“नहीं…मेरी मां मुझे किसी अनजान छोकरी के साथ देखना पसन्द नहीं करती।”

देवयानी हंस पड़ी…उसने गाड़ी साइड में रोकते हुए कहा‒”तुम्हारे अन्दर यही तो सबसे बड़ी कमजोरी है।”

“वह क्या?”

“अरे! जीवन में थोड़ा बहुत ‘डिप्लोमेट’ तो आदमी को बनना ही पड़ता है…थोड़े झूठ के सहारे बगैर इस दुनिया में कुछ नहीं होता।”

“मगर ये सारे धर्मग्रन्थ यही कहते हैं कि सच्चाई में बड़ी शक्ति है।”

“ये ‘नियम’ उस बीते युग के हैं जब रेलगाड़ियां और मोटरें नहीं थीं…आज तो विज्ञान ने ऐसे रॉकेट भी बना लिए हैं जो चन्द्र ग्रह और दूसरे अन्य आकाश में फैले ग्रहों की खबरें धरती पर पहुंचा देते हैं…आज अगर नेता लोग झूठ बोलकर जनता को प्रभावित न करें तो शासन की कुर्सी पर कैसे बैठ सकता है। झूठ का ही बोलबाला है।”

“अच्छा, तुम नेताओं और राजनीति का हवाला देकर बोर मत करो…आदेश दो कि मुझे क्या करना है?”

“आज तुम जाओ‒कल रात को आठ बजे मेरी बर्थ एनिवर्सरी की पार्टी में पहुंच जाना…मेरे डैडी सुबह की फ्लाइट से न्यूयार्क जा रहे हैं।”

“ओ. के….कल रात, आठ बजे।” और विवेक कार से उतर कर स्टॉप की ओर बढ़ गया।

दूसरे दिन विवेक ठीक आठ बजे देवयानी के बंगले पहुंच गया। बाहर ही से हल्ला-गुल्ला होने की आवाजें आ रही थीं…’डेक बज रहा था। लड़के-लड़कियों के मिले-जुले ठहाकों की आवाजें आ रही थीं।

विवेक ने देवयानी के गार्डन ही से गुलाब का एक फूल तोड़ा और अन्दर पहुंच गया जहां लड़के-लड़कियां जोड़े में डांस कर रहे थे। अंजला हाथ में छोटा पैग लिए बैठी थी। विवेक को देखकर उसने बुरा-सा मुंह बनाया मानो ‘कुनैन’ की गोली निगल ली हो।

देवयानी सब के बीच में बड़े अच्छे मूड में नाच रही थी। सबको इधर-उधर धकेलता हुआ वह देवयानी के पास पहुंच गया और फूल बढ़ाकर मुस्करा कर बोला‒”हैप्पी बर्थ डे टू यू।”

“मैनी मैनी थैंक्स।” कहते हुए उसने विवेक को अपनी ओर खींच कर एक लम्बा ‘किस’ ले लिया…लेकिन कई लड़कों के चेहरों से ऐसे लगा जैसे विवेक का आना उन्हें अच्छा न लगा हो।

“Carry on friends।” देवयानी ने जोर से कहा…फिर विवेक का हाथ पकड़ कर काउंटर पर लाई…एक बड़ा-सा गिलास भर कर उसने विवेक को दिया तो विवेक ने कहा‒

“ओ…नो…अपन में अभी साहस पैदा हो जाएगा।”

“वही तो मैं चाहती हूं।”

“साली! तुमने बोला था कि आज…।”

“अरे…आज मैं तुम्हें अंजला को प्रेम शिक्षा देने के लिए तैयार कर रही हूं‒असल प्रेम शिक्षा‒तुम यह गिलास तो खाली करो।”

“लो! अपन में अब पूरा साहस आ गया।”

“व्हाट! अब अंजला खुद भी प्रेम सीखना चाहती है।” वह लड़खड़ाती आवाज में बोला।

देवयानी उसे संभालकर एक अलग रूम में ले आई, जहां अंजला पहले ही से लुढ़की हुई पड़ी थी। विवेक उछल पड़ा…

“हाय…यह तो अंजला है!”

“दे..व…यानी…मुझे…ग…ग…गाड़ी तक…पहुंचा…दो…प…प्लीज।”

विवेक अचम्भे से बोला‒”इसको इतनी कैसे चढ़ गई?”

“तुमको इससे क्या…?” और फिर वह विवेक को छोड़ कर बाहर निकल आई…उसके होंठों पर एक अर्ध पूर्ण मुस्कराहट उभर आई थी। वह बड़बड़ाई‒

“अंजला…तूने देवी बनकर देवयानी को शैतान मशहूर कर दिया था…आज तू भी मेरी ही लाइन में आन खड़ी हुई…।”

फिर वह चिढ़ गई…उसने दरवाजा भेड़ दिया था।

विवेक अंजला के पास बैठ गया। अंजला ने आंखें फाड़कर उसे पहचानने की कोशिश की‒फिर बोली‒

“कौन हो तुम?”

“मैं‒तुम्हारा प्रेमी…तुम्हें असल प्रेम करना सिखाऊंगा।”

“तो सिखाओ न…देर क्यों करते हो?”

विवेक ने अंजला को बांहों में जकड़ लिया…अंजला ने भी कोई आपत्ति नहीं की…विवेक ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए अंजला बेसुध होकर उससे लिपट गई।

अचानक ही विवेक को ऐसा लगा जैसे उसकी बांहों में अंजला नहीं देवयानी हो…एकाएक अंजला से उसे जोरदार घिन्न आई और उसने अंजला को बैड पर धकेल दिया…वह बेसुध पड़ी रही‒विवेक उठता हुआ बड़बड़ाया‒”साली तुझमें और देवयानी में फर्क ही क्या है? काहे को लोग केवल देवयानी को बुरी समझते हैं?”

फिर वह न केवल कमरे से बल्कि देवयानी के बंगले से भी बाहर निकलता चला गया….उसका सारा नशा हिरण हो गया था…उसने अपने कपड़े ठीक किए और स्टॉप की और चल पड़ा। एक लड़की चुपके से खाली अंजला को देखकर चली गई थी।

पता नहीं कितने घंटे बाद अंजला का नशा टूटा। उसने आंखें खोलीं तो उसके सामने देवयानी खड़ी ठहाका लगा रही थी। अंजला झटके से उठकर बैठ गई। उसने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए।

देवयानी के हाथ में गिलास था। उसने कहा‒

“कैसा रहा प्रेम शास्त्र का पहला पाठ?”

“व्हाट प्रेम शास्त्र?”

“आज तुम्हारे प्रेमी ने तुम्हें प्यार का पहला प्रेक्टिकल पाठ पढ़ाकर कली से फूल बना दिया है।”

“कौन लाया था मुझे यहां?”

“विवेक….प्यार सिखाने।”

अंजला का दिल जोर से धड़क उठा‒फिर उसने अपने शरीर को ध्यान से टटोला और थूक निगल कर बोली‒”नहीं…नहीं…उसने मेरे साथ कुछ नहीं किया।”

देवयानी फिर ठहाका लगा कर बोली‒”अब छुपाने से क्या जो कुछ हो गया, क्या वह लौट आएगा?”

“तू झूठ बोल रही है…मैं बाई गॉड कहती हूं मेरे साथ कुछ भी ऐसा नहीं हुआ….जो तुम समझ रही हो।”

अचानक एक लड़के ने देवयानी का हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा‒”बोर मत करो यार…रात आधी से ऊपर हो गई है…बस, एक राउंड और हो जाए।”

देवयानी चली गई…अंजला हक्का-बक्का सी खड़ी रही। अचानक वही लड़की अंदर आ गई जिसने कमरे में झांका था…अंजला ने पूछा‒

“जूली! क्या मुझे विवेक उठाकर यहां लाया था?”

“नहीं…यह सब देवयानी की करतूत है…जैसी कि वह खुद है…सब लड़कियों को वैसी ही बनाना चाहती है…मगर हर लड़की उसकी चाल में थोड़ी आएगी…मनोरंजन, मिलना-जुलना अपनी जगह है…और यह शरीर बेचते फिरना…धत्।”

“तू मुझे ठीक से बता।”

“देवयानी ने मुझे बताया था कि साली अंजला बहुत सती-सावित्री बनती है…आज उसका भी चीरहरण हो जाएगा।”

“नहीं।”

“भगवान की कसम है…उसने नशे की झोंक में बताया था कि तेरे छोटे पैग में उसने कोई नशा करने की गोली डाल दी थी।”

“ओ गॉड!”

“फिर वह खुद ही तुम्हें यहां पहुंचा गई-विवेक तेरे सामने ही आ चुका था…उसने एक पूरा गिलास भरकर विवेक को पिला दिया था…जब उसे बहुत नशा हो गया तो देवयानी उसे भी यहां पहुंचा गई।”

“माई गॉड!”

“विवेक ने तुझे लिपटा कर प्यार किया‒मैं छुपकर देख रही थी…कि देवयानी अपने उद्देश्य में सफल हुई या नहीं‒मैं चुपके से आ गई।”

“फिर क्या हुआ?”

“विवेक ने नशे में तुझे एक लम्बा किस्स करना चाहा…तूने कोई आपत्ति नहीं की…फिर जाने क्या हुआ?

विवेक ने गुस्से से तुझे धकेल दिया और हड़बड़ाकर बोला था, “साली तुझमें और देवयानी में फर्क क्या है?”

“फिर…?”

“फिर वह तुझे छोड़कर तेजी से बाहर निकला और पार्टी छोड़कर चला गया।”

“इसका मतलब है…अगर विवेक की जगह कोई दूसरा होता तो इस समय मैं भी देवयानी ही की लाइन में खड़ी होती।”

“निःसंदेह….वह स्पष्टतया बुरा सही, मगर वास्तव में हीरा है…याद रखना, तूने ऐसे आदमी का सम्मान नहीं किया तो जीवन भर पछताना पड़ेगा।”

अंजला सन्नाटे में खड़ी रह गई।

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