Not mine, your doll
Not mine, your doll

Funny Stories for Kids: निक्का को गाना नहीं आता था । तो भी कभी-कभी मौज में आकर वह गाता था, “ला लला ला, ला लला ला, ला लला…!” और भी न जाने क्या -क्या । कुछ नए-नए गाने भी बना लेता । फूलों के, चिड़िया के, तितली के, बाग-बगीचे के, मोर और हिरनों के । यहाँ तक कि अपने खेल-कूद और दोस्तों की शरारतों पर भी उसने गाने बना लिए । एक से एक संदुर गाने । काॅपी में पढ़कर सब हैरान होते । फिर कहते, “निक्का , अब जरा इन्हें गाकर सुनाओ न !” सुनकर निक्का परेशान हो जाता । भला गाना उसे कहाँ आता था ? कभी-कभी कोशिश करके गाता भी । पर उसका गाने का ढंग इतना बेसुरा होता था कि सुनकर दोस्त ही नहीं, घर के लोग भी हँसने लगते । निक्का बेचारा शरमा
जाता । और कभी-कभी तो शर्म के मारे उसके गाल इस तरह लाल हो जाते कि उसे लगता, वह भागकर कहीं चला जाए ।
एक दिन निक्का उदास बैठा था । सोच रहा था, ‘भला मैं अच्छा क्यों नहीं गा सकता ? क्या मैं हमेशा बेसुरा ही बना रहूँगा ?’ तभी उसके पड़ोस में रहने वाली नन्ही रीमा अपनी गुड़िया लेकर आई ।
बोली, “आओ निक्का , खेलें !” रीमा की वह गड़िुया काठ की खबू बड़ी सी, संदुर गड़िुया थी । खबू
लंबी गरदन , बड़े-बड़े कान । और मजे की बात यह कि काठ की वह गुड़िया गाती भी थी और उसका गाना बड़ा सुरीला था । गाने के साथ-साथ वह ताली बजा-बजाकर नाचती भी थी ।

रीमा बोली, “मेरी प्यारी काठ की गुड़िया, जरा निक्का को भी तो दिखा दे अपने नाच का जादू ।” और झट रीमा की गुड़िया नाचने लगी । नाचते समय उसका छींटदार गोल घाघरा हवा में उड़ता, तो गुड़िया का नाच और भी अच्छा लगता ।
उसे देखकर निक्का का दिल खुशी से भर गया । रीमा से बोला, “ओ री रीमा, एक दिन के लिए मुझे भी दे दोगी अपनी यह काठ की गुड़िया ?” “एक दिन के लिए क्यों ? जब तक रखना चाहो, रखो । जब तुम कहोगे, ले जाऊँगी ।” रीमा मुसकराकर बोली ।
फिर उसने गुड़िया से कहा, ‘मेरी अच्छी गुड़िया, अब तुम निक्का के पास रहना । निक्का मेरा प्यारा दोस्त है । वह तुम्हें बहुत प्यार करेगा ।’
इस पर रीमा की गुड़िया ने हँसते हुए गरदन मटकाई । जैसे कह रही हो, “हाँ- हाँ, हाँ…हाँ ! मैं जानती हूँ, निक्का अच्छा है, बहुत अच्छा । इसीलिए तो सब लोग इसे इतना प्यार करते हैं ।” निक्का खुश होकर बोला, “आजकल तो क्रिसमस की छुट्टियाँ हैं । मैं इससे रोज खेला करूँगा । तुम भी आ जाया करो न प्लीज !” रीमा बोली, “जरूर ।…आखिर मुझे भी तो अपनी प्यारी गुड़िया की याद आएगी न ।”

फिर एक दिन की बात है, रात का समय । निक्का अपनी हिंदी की किताब पढ़ रहा था । उसमें एक संदुर सी कविता थी, ‘आसमान के प्यारे तारे, घर आ जाएँ यदि ये सारे…!’ कविता उसे बहुत अच्छी लगी । वह सोच रहा था, ‘वाह, कितनी अच्छी बात । आसमान के सारे तारे अगर मेरे घर आ जाएँ, तब तो कितना मजा आएगा !’ वह कविता पढ़ रहा था । साथ ही गुनगुना भी रहा था । फिर मस्ती में आकर वह अचानक गा उठा – आसमान के प्यारे तारे घर आ जाएँ यदि ये सारे, यदि ये सारे, यदि ये सारे…
सारे के सारे ये तारे,
मोती जैसे प्यारे-प्यारे,
होंगे फिर तो मजे हमारे,
आसमान के प्यारे तारे
संदुर-संदुर, प्यारे-प्यारे…!

निक्का गाने में लीन था । तभी अचानक उसे आवाज सुनाई दी, ‘नहीं-नहीं निक्का , ऐसे नहीं ऐसे गाओ, ऐसे…!’ कहकर काठ की गुड़िया बड़े सुरीले ढंग से गा उठा –

आसमान के प्यारे तारे
घर आ जाएँ यदि ये सारे,
आहा, आहा, आहा, आहा
कितने सारे, कितने सारे,
आसमान के प्यारे तारे…!

“अरे, क्या सचमुच, तुम बोल रही हो ? और गा भी रही हो, तुम…?” निक्का ने अचरज से काठ की गुड़ि या की ओर देखा । उसने हँसकर कहा, “और क्या ? इतना अच्छा गाना है । थोड़ा सँभलकर गाओ, तो कितना रस आएगा ! तुम्हारे दोस्त भी खुश होंगे । तो फिर थोड़ी प्रैक्टिस क्यों नहीं कर लेते ? गाओ-गाओ, थोड़ा सुर में गाओ ।” काठ की गुड़िया बोली ।
कहकर वह काठ की गोलमटोल गुड़िया फिर से गाने लगी । बड़े ही सुरीले
कंठ में वह गा रही थी –
आसमान के प्यारे तारे
घर आ जाएँ यदि ये सारे…
सारे…सारे…सारे…सारे..,

तारे…तारे…तारे…तारे,
घर आ जाएँ यदि ये सारे—
इनको चमचम खिलवाऊँगा,
इनको माजा पिलवाऊँगा
आ जाएँ यदि घर ये सारे,
आसमान के हँसते तारे…!

‘जादू…! अरे, यह तो जादू हो गया ।’ निक्का हैरान । काठ की गुड़िया का गाना गाने का अंदाज इतना प्यारा था कि उसने सुना तो बस, सुनता ही रह गया । लगा, जैसे किसी ने उस पर जादू कर दिया हो ।
अब तो निक्का के मन में भी ऐसे ही मीठे ढंग से गाने की इच्छा हुई । उसे लगा, मुझे भी काठ की गुड़िया की तरह लोचदार आवाज में गाना चाहिए ।
खूब अच्छा गाना चाहिए और सुर में गाना चाहिए । और जब उसने गाया, तो सचमुच खुद उसे भी अच्छा लगा । दो-तीन बार गाया तो उसका सुर निखर गया । अगले दिन रीमा ने देखा, खेल-खेल में निक्का बीच-बीच में गा उठता है, “सारे के सारे के सारे…आसमान के हँसते तारे, आहा, आहा, आहा, आहा… तारे, तारे, तारे, तारे…आसमान के सारे तारे…!” “अरे, तुम तो अच्छा गाने लग गए ।” रीमा ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा ।
“यह तुम्हारी काठ की गुड़िया की वजह से है । उसी ने मुझे सुर में गाना सिखाया है ।” निक्का ने खुश होकर कहा । आज पहली बार किसी ने उसके गाने को सराहा था । “मेरी नहीं तुम्हारी गुड़िया, क्योंकि उसने तुम्हें इतने प्यार से सिखाया है । अब तुम्हीं इसे रखो ।” रीमा ने बड़े प्यार से कहा, “समझो, मेरी ओर से वह तुम्हें एक छोटा सा उपहार है । दोस्ती का उपहार !”

सुनकर निक्का को लगा, जैसे उसे दुनिया का सबसे अनमोल खजाना मिल गया हो । “थैंक्यू रीमा…! तुम अच्छी , बहुत अच्छी हो ।” निक्का ने कहा, “यह छोटा नहीं, अनमोल उपहार है । दुनिया की हर चीज से बढ़कर ।…इससे ज़्यादा खुशी मुझे किसी और चीज से नहीं मिल सकती थी ।”
फिर वह उस सुरीली काठ की गुड़िया से मीठी-मीठी बातें करने लगा । और काठ की गुड़िया कह रही थी, “तुम अच्छे हो, बहुत अच्छे हो निक्का । तुम्हारा दिल बहुत साफ है, इसलिए सब तुम्हें प्यार करते हैं । और अब तो तुम बहुत अच्छा गाने भी लगे हो ।…पर अब रोज-रोज गाना, ताकि इसमें और भी
निखार आए ।” “हाँ, मेरी प्यारी गुड़िया, जरूर !” निक्का झूमकर बोला । वह खुश था, बहुत खुश ।
और रीमा इस बात से खुश थी कि उसने निक्का को सचमुच एक अच्छा उपहार दिया ।

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ