Hormones Puberty and Menopause: महिलाओं के शरीर में हार्मोन सिर्फ पीरियड्स ही नहीं, बल्कि पूरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नियंत्रित करते हैं। इसलिए समय रहते स्वास्थ्य पर ध्यान देना जीवन गुणवत्ता के लिए बेहद जरूरी है।
महिलाओं के हार्मोन स्वास्थ्य का महत्व आज के समय में पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है, क्योंकि
हार्मोन शरीर की लगभग हर प्रक्रिया जैसे मासिक धर्म चक्र, मानसिक संतुलन, ऊर्जा का स्तर, नींद, फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं। बदलती जीवनशैली, तनाव, अनियमित खान-पान और पर्यावरण में होने वाले बदलावों के कारण हार्मोनल असंतुलन की समस्याएं अधिक देखने को मिल रही हैं।
इसलिए जरूरी है कि महिलाएं अपने शरीर के संकेत समझें, नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं और संतुलित आहार, व्यायाम तथा मानसिक शांति पर ध्यान दें। आज इस लेख में नई दिल्ली मदर्स लैप आईवीएफ सेंटर की मेडिकल डायरेक्टर, फाउंडर व इंफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. शोभा गुप्ता से जानते हैं कि महिलाओं के हार्मोन स्वास्थ्य पर ध्यान देना क्यों और कैसे जरूरी है।
क्या होते हैं हार्मोन और शरीर में क्या है इनकी भूमिका
हार्मोन हमारे शरीर के छोटे-छोटे केमिकल मैसेंजर (रासायनिक संदेशवाहक) हैं, जो खून के जरिए अलग-अलग अंगों तक संकेत पहुंचाते हैं। ये मेटाबॉलिज्म, रिप्रोडक्शन, मूड, ऊर्जा, भूख, त्वचा, बाल और पीरियड्स को नियमित रखते हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, थायरॉइड हार्मोन और इंसुलिन सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जब ये संतुलन में होते हैं, तो शरीर सहज रूप से काम करता
है, लेकिन जरा-सा असंतुलन भी पीरियड अनियमितता से लेकर वजन और मूड बदलाव तक असर डाल सकता है। इसलिए हार्मोन स्वास्थ्य को समझना महिलाओं के सम्पूर्ण स्वास्थ्य का आधार है।
क्यों बढ़ रहा है महिलाओं में हार्मोन असंतुलन
आज की महिलाओं में हार्मोन असंतुलन का सबसे बड़ा कारण तनाव, अनियमित दिनचर्या, नींद की कमी और प्रोसेस्ड फूड का सेवन है। इसके अलावा देर से शादी, देर से गर्भावस्था, जंक फूड, प्लास्टिक में पैक भोजन और गतिहीन जीवनशैली भी हार्मोन को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। काम-काज और घर दोनों संभालते हुए लगातार कॉर्टिसॉल बढ़ता है, जिससे बाकी हार्मोन गड़बड़ाने लगते हैं। स्क्रीन पर बहुत समय देना, रात में जागना और लगातार डाइट करना भी महिलाओं के हार्मोन स्वास्थ्य को कमजोर कर रहे हैं। यही कारण है कि पहले जो समस्याएं केवल 35 की उम्र के बाद महिलाओं में दिखती थीं, अब 20-25 की युवतियों में भी आम हो गई हैं।
पीरियड, पीसीओडी, थायरॉइड और हार्मोन स्वास्थ्य का संबंध
पीरियड में देरी, भारी फलो या दर्द तब बढ़ता है जब एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का संतुलन बिगड़ता है। वहीं, पीसीओडी में इंसुलिन रेजिस्टेंस, एंड्रोजन बढ़ना और अनियमित ओव्यूलेशन मुख्य कारण हैं। थायरॉइड हार्मोन धीमा हो जाए तो पीरियड अनियमित, वजन बढ़ना, थकान, बाल गिरना जैसी समस्याएं हो जाती हैं। ये तीनों आपस में जुड़े हुए हैं और एक के बिगड़ने पर दूसरे पर असर डालते हैं।
इसलिए महिलाओं को पीरियड पैटर्न पर ध्यान देना और समय-समय पर थायरॉइड और
पीसीओडी की जांच कराना बेहद जरूरी है।
हार्मोन बिगड़ने के आम और अनदेखे लक्षण
महिलाएं कई लक्षणों को सामान्य थकान समझकर टाल देती हैं, जैसे- लगातार वजन बढ़ना, अचानक बाल गिरना, एक्ने, चेहरे पर पिग्मेंटेशन, पीरियड्स का बिगड़ना, नींद न आना या बार-बार चिड़चिड़ाहट होना। पेट फूलना, भूख में गड़बड़ी, लो लिबिडो और ज्यादा थकान भी हार्मोन असंतुलन के संकेत हैं। कई महिलाएं सालों तक इन लक्षणों को तनाव या उम्र बढ़ने का असर मानकर
नजरअंदाज करती रहती हैं, जबकि समय पर जांच और इलाज से इन्हें आसानी से नियंत्रित
किया जा सकता है। हार्मोन शरीर का अलार्म सिस्टम हैं और लक्षणों को सुनना बेहद
जरूरी है।
हार्मोनल बदलाव का वजन, त्वचा और बालों पर असर
एस्ट्रोजन प्रोजेस्टेरोन, इंसुलिन और थायरॉइड का जरा-सा भी असंतुलन वजन को प्रभावित कर सकता है। खासकर पेट के आसपास चर्बी बढ़ना, पानी जमा होना और बार-बार मीठा खाने का मन करना. इसके संकेत हैं। त्वचा पर हार्मोनल एक्ने, बेजान त्वचा, पिग्मेंटेशन, और समय से पहले उम्र के असर नजर आने लगते हैं। बालों का पतला होना, बालों का ज्यादा गिरना या कई बार थोड़ी पर
अतिरिक्त बाल नजर आना भी हार्मोन की समस्या का हिस्सा है। महिलाएं चाहे जितना भी अपनी त्वचा की देखभाल या डाइटिंग करें, जब तक हार्मोन संतुलित नहीं होते, परिणाम सीमित ही रहते हैं।
हार्मोन और इससे जुड़ा मानसिक स्वास्थ्य हार्मोन सीधे-सीधे दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर को प्रभावित करते हैं। प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन का उतार-चढ़ाव मूड स्विंग्स, रोने की प्रवृत्ति, गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ा सकता है। थायरॉइड कम होने पर एंजायटी और मूड का खराब होना बहुत आम हैं। पीसीओडी वाली महिलाओं में इंसुलिन और एंड्रोजन असंतुलन, मानसिक स्वास्थ्य को और अस्थिर करता है। यही वजह है कि कई महिलाएं पीएमएस, पोस्टपार्टम पीरियड या पेरिमेनोपॉज के दौरान भावनात्मक रूप से ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं। समय पर मदद लेना कमजोरी नहीं बल्कि शरीर की भाषा को समझना है।
गलत लाइफस्टाइल का हार्मोन पर असर
खराब जीवनशैली आज का सबसे बड़ा हार्मोनल अवरोधक है। कम नींद कॉर्टिसॉल को बढ़ाती है, जिसका असर थायरॉइड, इंसुलिन और प्रजनन हार्मोन पर सीधे पड़ता है। लगातार तनाव भी ओव्यूलेशन रोक सकता है। प्रोसेस्ड भोजन, मीठे स्नैक्स और असंतुलित डाइटिंग इंसुलिन को अस्थिर करते हैं, जिससे पीसीओडी, वजन बढ़ना और एक्ने जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। रात में देर तक स्क्रीन देखना मेलाटोनिन को प्रभावित करता है, जिससे नींद और हार्मोन दोनों बिगड़ते हैं। जीवनशैली को सुधारना हार्मोन थेरेपी से भी ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है।
हार्मोन संतुलित रखने के आसान घरेलू तरीके

रोजमर्रा की कुछ आदतें हार्मोन को स्वाभाविक रूप से संतुलित रख सकती हैं, जैसे- 30 मिनट की ब्रिस्क वॉक, समय पर सोना, हाई प्रोटीन के साथ हाई फाइबर वाली डाइट लेना और पानी की पर्याप्त मात्रा।
कैफीन और चीनी कम करना, अलसी, कद्दू, तिल जैसे बीजों का सेवन और तनाव प्रबंधन तकनीकें जैसे ध्यान या गहरी सांस लेने के कई फायदे देते हैं। साइकिल ट्रैकिंग से महिलाओं को समझ आता है कि उनका शरीर कैसे बदलता है।
गर्भावस्था और मेनोपॉज में हार्मोन की भूमिका

प्रेग्नेंसी के दौरान हार्मोन शरीर को भ्रूण के विकास के लिए तैयार करते हैं। एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, एचसीजी और प्रोलैक्टिन तेजी से बढ़ते हैं, जोमूड से लेकर त्वचा में कई बदलाव लाते हैं। वहीं मेनोपॉज में एस्ट्रोजन तेजी से गिरता है, जिससे हॉट फ्लैशेज, मूड में बदलाव, योनि में सूखापन और वजन में उतार-चढ़ाव जैसे लक्षण आते हैं। दोनों अवस्थाएं री तरह हार्मोन पर निर्भर हैं, इसलिए इस दौरान सही खान-पान, मानसिक रूप से मदद और चिकित्सकीय मार्गदर्शन जरूरी हैं। महिलाएं यदि इन चरणों को समझदारी और तैयारी के साथ अपनाएं, तो यह यात्रा काफी सहज हो सकती है।
