Hindi Vyangya: आज के जमाने के युवा नारी के कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। वे उनका पग-पग पर साथ देते हैं।
व्यक्ति की नाक का उसके गुस्से से क्या लेना-देना हो सकता है भला? ऐसा होना भी नहीं चाहिए। भई नाक अपनी जगह है और गुस्सा अपनी जगह। नाक, नाक है और गुस्सा, गुस्सा। नाक बड़ी, छोटी, मोटी, चपटी या भौंडी हो सकती है, लेकिन गुस्सा केवल कम या ज्यादा होता है। अंग्रेजी में कहें तो नाक ‘टेंजिबल’ है जबकि गुस्सा ‘इनटेंजीबल।’ मतलब व्यक्ति की नाक को छुआ जा सकता
जबकि गुस्से को छूना संभव नहीं है। वह अदृश्य है। बावजूद इसके सर्वसाधारण यह मानता आ रहा है कि व्यक्ति का गुस्सा उसकी नाक पर आ बैठता है। गुस्सा एक न दिखाई देने वाली चीज होते हुए भी,
जब नाक पर आकर बैठ जाता है तब दिखाई पड़ने लगता है। लोग कह देते हैं-
भाई साब गुस्सा न दिखाओ। आपकी तो नाक पर गुस्सा रखा रहता है! बहरहाल, पुरुष का गुस्सा जब नाक पर आ बैठता तब थरथराहट पैदा कर देता है। जबकि स्त्री का गुस्सा कई बार अलग ही गुल खिलाता है। एक प्रेमी अपनी प्रेमिका की नाक पर रखे गुस्से को देखकर कह उठता है, ‘वाह…गुस्सा तेरा सुभानल्ला!’
पिछले दिनों श्रीमती जी इस बात को लेकर गुस्सा थीं कि मैं दकियानूसी और पुराने जमाने के मर्दों जैसा हूं। केवल ऑफिस और बाहर के कामों से मतलब रखता हूं। घर के सारे काम उसके सिर पर
लाद दिए गए हैं। उसके काम में तनिक भी हाथ नहीं बंटाता। जबकि आज के जमाने के युवा नारी के कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। वे उनका पग-पग पर साथ देते हैं। एक शादीशुदा मर्द अपनी
पत्नी के कामों में यथासंभव सहायता करता है।
श्रीमती जी मुझसे दुखी थी। हालांकि मैं यदा-कदा भोजन पकाने में इतनी मदद जरूर कर देता था कि स्वाद के लिए बढ़िया चटनी बना लेता हूं। एकदम स्वादिष्ट और चटपटी चटनी। चटनी का
चटखारा लेकर बच्चे तारीफ किया करते हैं- पापा इज ग्रेट… चटनी स्पेशलिस्ट हैं पापा!
श्रीमती जी का गुस्सा उनकी खूबसूरत नाक पर आकर न बैठ जाए, यह सोचकर मैं एक दिन रसोई के काम में हाथ बंटाने उनके सामने हाजिर हो गया। मैं चटनी बनाने के लिए धनिया की पत्ती और हरी मिर्च लेकर मिक्सी खोजने लगा तभी श्रीमती जी ने टोका, ‘ज़रा सुनिए! आज आप कुछ अलग काम करिए। सीख भी जाएंगे। जरूरत पड़ने पर खाना बना सकेंगे। भूखे पेट नहीं रहना पड़ेगा।’ श्रीमती
जी आटा गूंदने की तैयारी कर रही थीं सो उन्होंने वह थाली मेरी ओर सरका दी। मैंने चटनी की तैयारी में हाथ में ली हुई धनिया मिर्च उनकी ओर बढ़ा दी और मुस्कुराते हुए कहा, ‘जो आज्ञा भागवान। अब आप ही बताइए मुझे क्या करना है।’
श्रीमती जी बड़ी शान से साड़ी का पल्लू कमर पर कसते हुए चहकीं, ‘ऐसा करते हैं, आप मेरा आटा गूंथ दो, मैं आपकी चटनी बना दूंगी।’
‘मेरी चटनी बनाए’ जाने की बात कुछ इस तरह कही गई कि मतलब किसी और राह पर निकल गया। हमारा तनाव ठहाकों में बदल गया। उनकी नाराजगी भरा बनावटी गुस्सा उनकी नाक पर आ बैठा और लौंग का लश्कारा दमकने लगा। मैंने अपने हाथों का गीला आटा उनकी नाक पर लगा दिया। मुझे लगा यही तो है गृहस्थ जीवन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का सुख!
