Hindi Motivational Story
Hindi Motivational Story

Hindi Motivational Story: घर जल्दी पहुँच चुके राजेश ने अपनी पत्नी सुनीता को फोन लगाया.
“सुनीता, कहाँ हो? अभी तक ऑफिस से घर नहीं आईं?”.
“मैं लेडी डॉक्टर के पास रूटीन चेकअप के लिए आई हूँ. तुम घर पहुँच गए क्या?”
“हाँ, आज थोड़ा जल्दी आ गया.”
“बस, …निकल ही रही हूँ.” कहकर सुनीता ने फोन रख दिया.
नोएडा के एक फ्लैट में सुनीता और राजेश का छोटा सा परिवार रहता था. राजेश के माता-पिता भी उनके साथ थे. दोनों ने प्रेम विवाह किया था और अब शादी को तीन साल बीत चुके थे. इस बीच वे बच्चे की ज़िम्मेदारी के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन अब जब सुनीता गर्भवती हुई, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई.
राजेश हर पल सुनीता का ख्याल रखता. गर्भ के पाँचवें महीने में तो सुनीता को प्रमोशन भी मिला. ऑफिस में सभी सहकर्मी उसे बधाइयाँ देते और सलाह देते कि डिलीवरी के तुरंत बाद नौकरी ज्वाइन करना.
राजेश भी कहता,“बच्चे की देखभाल दादी-दादा कर लेंगे, नौकरानियाँ भी होंगी. तुम बस अपनी जॉब पर ध्यान दो.”
सुनीता बस मुस्कुराकर चुप रह जाती. लेकिन उसके मन में कुछ और ही विचार चल रहे थे.
गर्भावस्था के सातवें महीने में डॉक्टर ने विशेष सावधानियाँ बताईं – बाईं ओर करवट लेकर सोना, आगे झुकने से बचना, खाने-पीने पर ध्यान देना, और समय-समय पर चेकअप कराना.
डॉक्टर ने यह भी कहा-“यह महीना बहुत अहम होता है. कई बार समय से पहले बच्चा पैदा हो सकता है. खुद का ध्यान रखना और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत आना.”
सुनीता डॉक्टर की बातों को गंभीरता से लेती रही. घर आकर उसने राजेश को सब बताया. लेकिन तभी खबर आई कि राजेश के ताऊजी का एक्सीडेंट हो गया है और माता-पिता गाँव चले गए. अब घर में केवल राजेश और सुनीता रह गए.
राजेश बार-बार कहता रहा कि जल्दी छुट्टी मत लो, लेकिन सुनीता ने आठवें महीने से ही मैटरनिटी लीव ले ली.
आखिरकार वो दिन भी आया जब सुनीता ने भीषण प्रसव पीड़ा झेली और एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया.
पहली बार जब बच्चा रोया, तो सुनीता की आँखों से भी आँसू बह निकले. डॉक्टर ने उसे बच्चे से स्किन-टू-स्किन संपर्क कराया. सुनीता भावविभोर हो उठी।
डॉक्टर ने समझाया—“अब माँ और बच्चे दोनों का ख्याल रखना ज़रूरी है. माँ का आहार पौष्टिक होना चाहिए, क्योंकि वही दूध बनकर शिशु तक पहुँचेगा.”
सुनीता पूरी लगन से बेटे कृष्णा की देखभाल करने लगी. राजेश ने नौकरानियाँ रख दीं, लेकिन सुनीता अपना बच्चा किसी को हाथ नहीं लगाने देती. जब कृष्णा सोता, तभी वह थोड़ा आराम कर लेती.
एक दिन सुनीता की बड़ी बहन आई. बच्चे को देखकर उसकी आँखें नम हो गईं. उसने कहा –“सुनीता, बहुत अच्छा कर रही हो कि खुद बच्चे का ध्यान रखती हो. काश! मैंने भी ऐसा किया होता… तो आज मेरा विजय ज़िंदा होता.”
राजेश चौंक गया। बहन ने अपनी कहानी सुनाई -,“नौकरी के चक्कर में मैंने अपने पहले बेटे को नौकरानी के भरोसे छोड़ दिया. मुझे लगता था कि मैं ऑफिस में रहकर बड़ा योगदान कर रही हूँ, लेकिन असल में मैं अपनी संतान से दूर हो रही थी. नौकरानी दूध में अफीम मिलाकर विजय को पिलाती रही. उसके पेट में संक्रमण फैल गया और एक रात मेरा लाल हमेशा के लिए चला गया. उसके बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और जुड़वाँ बच्चों का पालन-पोषण खुद किया. तब जाकर समझ आया कि माँ का साथ किसी भी बच्चे के लिए कितना अनमोल होता है.”
यह सुनकर सुनीता का संकल्प और मजबूत हो गया.
दीदी ने सुनीता को समझाया –“बच्चे को माँ का दूध ही देना, समय पर डायपर बदलना, बच्चे के रोने का तुरंत जवाब देना, जब बच्चा सोए तो तुम भी आराम कर लिया करो. बाकी सारे काम नौकरानी कर सकती है, लेकिन माँ की जगह कोई नहीं ले सकता.”
सुनीता ने यह सबक अपने दिल में उतार लिया.
चालीस दिन बाद सुनीता कृष्णा को लेकर डॉक्टर के पास गई. डॉक्टर ने उसे टीकाकरण की पूरी जानकारी दी,-“दो, चार और छह महीने की उम्र में कुछ ज़रूरी वैक्सीन हैं – हेपेटाइटिस, पोलियो, खसरा, फ्लू, काली खाँसी आदि. मैं तुम्हें एक कार्ड बना देती हूँ, जिसमें सब तारीखें लिखी होंगी।”
फिर डॉक्टर ने कहा –“तुम्हें भी अब अपनी डाइट का ध्यान रखना होगा। अनाज, दूध, फल, हरी सब्जियाँ, प्रोटीन सब कुछ लो. खूब पानी पीओ. और हाँ, बच्चे को गाल पर कभी किस (पप्पी) मत करना ,इससे संक्रमण हो सकता है.”
सुनीता ने मुस्कुराकर धन्यवाद दिया और कृष्णा को सीने से लगा लिया.
कुछ दिनों बाद सास-ससुर गाँव से लौट आए. सुनीता ने उन्हें कृष्णा को गोद में देने से पहले हाथ धोने को कहा. माँ ने नाराज़गी दिखाई —“क्या हम गंदे हैं?”
लेकिन बाबूजी ने हँसते हुए हाथ धोए और पोते को गोद में लिया. सुनीता ने चैन की साँस ली कि उन्होंने उसकी भावनाएं समझी.
इसी बीच एक रिश्तेदारी में शादी थी. सुनीता ने साफ़ कह दिया—“जब तक बेटा दो साल का नहीं हो जाता, मैं कहीं नहीं जाऊँगी.”
रिश्तेदारों ने उसकी आलोचना की, लेकिन सुनीता को किसी की परवाह नहीं थी.
छुट्टियाँ खत्म हुईं तो राजेश ने कहा– “अब ऑफिस ज्वाइन करो.”
सुनीता अगले दिन ऑफिस पहुँची और बॉस से बोली –“सर, यह मेरा इस्तीफा है. मुझे अपने नन्हे साथी के लिए समय चाहिए.” राजेश और बॉस दोनों हैरान रह गए।
“इतना बड़ा प्रमोशन छोड़ दोगी? सोच लो सुनीता…”
लेकिन सुनीता ने दृढ़ स्वर में कहा –
“नौकरी फिर मिल जाएगी, लेकिन मेरे बच्चे का बचपन दोबारा नहीं आएगा. उसके लिए माँ का साथ सबसे बड़ा धन है. यही मेरा सौभाग्य है.”
उसकी बातों ने सबको चुप करा दिया.
समय बीता, कृष्णा बड़ा हुआ. सुनीता ने अपने हर पल को उसके संग जिया. उसने समझ लिया था कि धन-दौलत या नौकरी बच्चे की परवरिश से बड़ी नहीं है.
माँ और संतान का रिश्ता जीवनभर का अनमोल रिश्ता है. सुनीता का नन्हा साथी उसके जीवन का सबसे कीमती दोस्त बन गया.