summary: अब और नहीं: आत्म-सम्मान की ओर रूपल का कदम

रूपल ने तानों, उपेक्षा और मानसिक तनाव से जूझते हुए अंततः अपने आत्म-सम्मान और बेटे के लिए एक नया रास्ता चुना। उसने अपने दर्द से निकलकर खुद को प्राथमिकता देना सीखा और हिम्मत के साथ रिश्ता पीछे छोड़ दिया।

Sad Story in Hindi: रूपल की ज़िंदगी बीते कुछ सालों से एक खालीपन से भरी थी। उसके और अमन के रिश्ते में धीरे-धीरे दूरियाँ आ गई थीं। अमन को लगता था कि रूपल बेवजह की बातें करती है, हर समय नेगेटिव सोचती है।

अमन महीने में मुश्किल से 4-5 दिन घर रहता था, बाकी समय टूर पर होता। रूपल खुद को बेहद अकेला महसूस करती थी। जब उसने अमन को बताया कि उसे पैनिक अटैक और डिप्रेशन हो रहा है, तो अमन ने बात को हल्के में टाल दिया।

रूपल चाहती थी कि उनके पास अपना एक छोटा सा घर हो, एक गाड़ी हो ताकि वे कहीं घूम सकें, बेटे को स्कूल छोड़ने-जाने की सुविधा हो। मगर अमन हर बार बहाना बना देता — “घर और गाड़ी लेना आसान नहीं होता। तुम क्या जानो पैसे कमाना कितना मुश्किल है!”

फिर एक दिन अमन ने चौंकाते हुए कहा कि उसने एक घर देखा है, और वे उसे खरीद सकते हैं। रूपल को लगा उसकी दुआ कबूल हो गई हो। घर खरीदा गया और धीरे-धीरे वक्त बीत गया।

पिछले दो साल से घर किराए पर चढ़ा था, और किराया रूपल के खाते में आता था। एक दिन अमन ने फ़ोन पर रूपल से कहा, “इस बार का किराया सोसाइटी की मेंटेनेंस में दे देना।”

रूपल ने धीरे से कहा, “तुम महीने के खर्च के पैसे भी 20 तारीख के बाद ही देते हो, उसके लिए भी मुझे याद दिलाना पड़ता है। किराया आएगा तो दे दूंगी।”

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इस बात पर अमन तिलमिला गया, “वाह रूपल! घर के लिए लाखों मैंने खर्च किए, तुमने क्या किया इसमें?”

अमन की बात रूपल के सीने में चुभ गई। उसने धीरे से कहा, मैंने कोई नौकरी नहीं की, पर घर सम्हाला, तुम्हारा और बेटे का ख्याल रखा। क्या मेरा कोई योगदान नहीं?

अमन ने बात को मजाक कहकर टालना चाहा, लेकिन अमन की इस बात पर रूपल बहुत रोई और रोते- रोते अचानक रूपल की साँसें तेज़ होने लगी थीं, ऐसा लग रहा था जैसे अब वह साँस नहीं ले पाएगी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और हाथ कांप रहे थे। यह कोई पहली बार नहीं था, लेकिन आज की बेचैनी हद पार कर चुकी थी। इस हालत में सबसे पहले उसे याद आया उसका 9 साल का बेटा – वेदांश। काँपती आवाज़ में उसने पुकारा, “वेदांश… बेटा ज़रा इधर आना।

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अपने कार्टून में डूबा वेदांश माँ की घबराई आवाज़ सुनकर दौड़ा आया। “माँ, क्या हुआ? आप ठीक तो हो? आपकी आवाज़ कांप रही है!

रूपल के पास बैठकर वेदांश ने अपनी टीशर्ट से माँ का पसीने से भीगा चेहरा पोंछा। बेटे के इस निस्वार्थ प्रेम ने रूपल को थोड़ी राहत दी और उसी पल उसने खुद से वादा किया अब वो खुद को इतना तनाव नहीं देगी कि एंग्जायटी अटैक आ जाए। उसने खुद से कहा अब फैसला लेना जरुरी है।

हफ्ते भर बाद, जब अमन टूर से वापस आया, रूपल ने अपना और वेदांश का सामान पैक किया।

उसने कहा, मैं माँ के घर जा रही हूँ। शायद अब कभी वापस न आ सकूं। माफ करना, मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकी, शायद बहुत कुछ ले ही लिया तुमसे। अब से तुम आज़ाद हो। जब बेटे से मिलना हो, माँ के घर चले आना।

रूपल ने बेटे का हाथ पकड़ा, दरवाज़ा खोला और लिफ्ट का बटन दबा दिया — अपने लिए, अपने आत्म-सम्मान के लिए रूपल ने ये कदम उठाना ही ठीक समझा।

उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली तरूणा ने 2020 में यूट्यूब चैनल के ज़रिए अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद इंडिया टीवी के लिए आर्टिकल्स लिखे और नीलेश मिश्रा की वेबसाइट पर कहानियाँ प्रकाशित हुईं। वर्तमान में देश की अग्रणी महिला पत्रिका...