Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “मेरे लिए पति ख़रीदा जा रहा है या मुझे बेचा जा रहा है, समझ नहीं पा रही हूँ।” उसके रिश्ते की बातें कई जगह चल रही थी। देखने-दिखाने, बजट की बातों से उसे बहुत चिढ़ होती थी। कभी उसे लगता जैसे वह कोई बोझ है और उसके कारण पूरा ख़ानदान परेशान है।

“हा…हा…हा…तुम्हें बिक जाना पसंद है या ख़रीद लेना?” मैं कोई गंभीर मसला बनाना नहीं चाहता था।

“दोनों ही नहीं।” उसका स्वर स्थिर था।

“तो शादी तुमसे होगी नहीं। छोड़ दो उस काली दुनिया के हसीन ख़्वाब।” मैं मुस्काया।

“मैंने कौन से ख़्वाब पाल रखे हैं यार। बस अपने पैदा होने का क़र्ज़ चुका रही हूँ।” थोड़ा रुककर जैसे उसे कुछ याद आया हो- “वैसे मेरी पसंद जानने के लिए,तुमने दो ही ऑब्शन दिए।”

“तो चलो, तीसरा तुम ख़ुद की पसंद का चुन लो।”

“मुझे तुम पसंद हो।” उसने भी शायद उस गंभीरता से निकलना चाहा हो।

“डार्लिंग! ख़रीद-बिक्री तो यहाँ भी होगी, बस क़ीमत मोहब्बत से लगेगी। रिश्ते का नाम कुछ और भी हो सकता है या बेनाम भी रह सकता है।”

“तो लगाओ क़ीमत, मैं बिकने को तैयार हूँ।” फिर से उसकी आवाज़ में वही स्थिरता थी,जिससे मूड भाँप पाना कठिन हो जाता है कि मस्ती में कही गई बात है या मस्ती की आड़ में गंभीर प्रश्न पूछ लिए जाने की राह।

“पर मैं ख़रीदने को नहीं।” मैंने मुस्काते हुए ही कहा।

“ओके। तो अपनी क़ीमत बताओ?”

“बिकने को भी तैयार नहीं डार्लिंग।”

इससे पहले की वह किन्हीं ख़्यालों में ग़ोते लगाते संजीदगी ओढ़े, मैंने उसका हाथ ज़ोर से दबाया और आगे कहा- “सौदों से बाहर आ जाओ; जो पहले कहा था वही अब भी कहता हूँ। जब तक हमारे दिलों में मोहब्बत ज़िंदा है, तब तक का ही साथ है।”

मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा और वह खिड़की से बाहर झांकने लगी; जैसे उसे शक हो, बे-रहम वक़्त जब रास्तों को कुचलते चला जाएगा; दुनिया की बेपर्दा होती बदसूरती के सामने, क्या मोहब्बत तब भी सांसे ले पाएगी?