Hindi Love Story: “अब किसी भी क़ीमत पर मैं तुमसे अलग नहीं होना चाहती।” उसे बार-बार हमारे रिश्तों को लेकर बेफ़िक्री चाहिए होती है।
“क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि, मैं तुम्हें ख़ुद से अलग कर दूँगा?”
“नहीं, ऐसा नहीं है। पर तुम जानते हो ना, पिछले रिलेशन से कैसे निकल पायी हूँ। एक-एक पल कटना कितना मुश्किल हो जाता है। उसके साथ इतने डीप लव में थी मैं, उसके बग़ैर ज़िंदगी की सोच भी नहीं सकती थी। तुम जब मेरी ज़िंदगी में आने लगे, तब मैं बहुत डरी हुई थी। शायद इसलिए तुमसे कम्फर्टेबल होने में इतना ज़्यादा वक़्त लगा। ऐसा लगता था, किसी तरह ख़ुद को आत्महत्या करने से रोक कर रख लूँ बस। इतना डिप्रेशन झेला है मैंने, कि याद करती हूँ तो अब भी पसीने से भीग जाती हूँ। सोचती हूँ कभी-कभी कि, शायद उस समय किसी दैवीय शक्ति ने मेरा साथ दिया, जिसने मुझे तुमसे मिला दिया और ज़िंदगी जीने की इच्छा फिर से पैदा हो गई।”
“हा…हा…हा…तुम किसी एक ख़्वाब को अपने जीने की वजह समझ रही थी डियर। असली ज़िंदगी एक ख़्वाब के भरोसे नहीं जी जाती, एक के बाद एक ख़्वाब देखने होते हैं।” ज़िंदगी का दरिया, जिंदा है तो ख़्वाबों को तैरना सीखना ही होता है।
“जब बहुत डीप रिलेशन हो तो कोई दूसरा सपना दिख कैसे सकता है?”
“प्यारु! तुम समझती हो, रिश्ते ही अकेली मंज़िल हैं ज़िंदगी में? इस रास्ते पर तो तुम्हें मायूस होना ही था। सच कहूँ तो मुझे लगता है कि, अच्छा हुआ जो तुम रिलेशन टूटने से डिप्रेशन में आयी। उस मौक़े की शायद तुम अभी कल्पना भी नहीं कर पाओ कि, तब क्या होता जब वह मिल जाता और पूरा हुआ ख़्वाब तुम्हें झूठ लगने लगता?”
“मतलब?”
“तुम्हें पहले भी कई बार कहा है, उम्मीदों और प्यार में अन्तर हमें समझते जाना होगा। प्यार मुक्त होने का रास्ता है और उम्मीदें नीचता से भरी क़ैद का रास्ता बनाती हैं।”
“प्यार ना होता, तो इतना दुख भी नहीं होता ना?..।”
“प्यार दुख देना जानता ही कहाँ है डियर?…उम्मीदें ही दुख देती हैं। और मेरा रिश्ता तुम्हें दुख दे नहीं सकता, क्योंकि मैं तुम्हें भरोसे नहीं बेचता।”
“तो कुछ भी उम्मीद ना रखूँ तुमसे? इतनी भी नहीं कि तुम ज़िंदगी में हमेशा मेरा साथ दोगे?”
“हा…हा…मैंने कहा ना, मैं कभी कोई ऐसा प्रॉमिस नहीं करता, जिसका भविष्य झूठा होने की संभावना हो। जब तब हमारे बीच प्यार और सम्मान महसूस होता रहेगा तभी तक हमें साथ रहना चाहिए। वह वक़्त अभी की किसी बातचीत से तय नहीं किया जा सकता। तुम उसकी फ़िक्र में पड़ती ही क्यों हो? हम ज़िंदगी जीने के लिए मिले हैं, जब तक तुम्हें मेरा रिलेशन बोझ न लगे तब तक ही रहो। यूँ सोचो तो, डिप्रेशन-विप्रेशन एक तरह का काल्पनिक संसार है। किसी ख़ास समय पर तेजी से उभरी हुई नकारात्मक भावनाएं, समय के साथ ही बदलती जाती हैं। किसी और से आने वाले सुख-दुख कभी स्थायी हों, इस बात की मुझे तो कोई संभावना नहीं दिखती। किसी के हमारे जीवन में आने से पहले जब हम जी सकते थे, तो उसके बाद क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि, जिसे हम ज़िंदगी समझ रहे थे, वह खोखली थी और उसमें कोई ऐसी पॉजीटिव बात थी ही नहीं जो हमें जीवन भर के लिए इश्क़ की तरह ख़ूबसूरत यादें दे सकती। हम लालची होते हैं और रिश्तों के दरवाजे लाँघते जीवन भर की बैसाखी ढूँढते, शक से भरी ताका-झाँकी करते रहते हैं। और मज़े की बात यह है कि जो सुख हमें दिख रहा होता है, वह सिर्फ़ भविष्य के हवाई सपनों का मनगढ़ंत सुख होता है।”
“मतलब ख़ुशियाँ भी बस इमेजिनेशन हैं और दुख भी? वाह भई वाह!”
“मेरी नज़रों से देखो तो तुम्हें यह कल्पना ही जीवन का सच मालूम पड़ेगी। हमें जीने के लिए ख़्वाबों के थान, तह किए हुए चाहिए। कुछ अधूरे लक्ष्य चाहिए, प्लानिंग चाहिए। जरा सोचो हसीन ख़्वाबों के बग़ैर हमारा आज कितना कोरा हो जायेगा?”
“तो क्या सपने देखना ही छोड़ दे इंसान? या फिर सपने ही देखे?” उसने उलझते हुए पूछा।
“यह मैं समझ सकता हूँ कि, उसने तुम्हारे ख़्वाबों का एक हिस्सा भी नहीं समझा। पर इंसान वह ख़्वाब देखना तो बिल्कुल छोड़ दे, जो किसी और के पूरे करने से पूरे होते हों। यहाँ हर किसी को अपने ख़्वाब देखने का हक़ है, कोई किसी और के ख़्वाबों को क्यों पूरा करते फिरे? तुम सोचो जरा कि तुम्हारा कितना दबाव होगा उस बेचारे पर कि, वह तुम्हारे पैमानों पर खरा उतरे। और हुआ क्या? वक़्त के साथ तुम अपनी कपोल दुनिया से निकल ही गई, जिसे तुम डिप्रेशन का नाम दे रही हो। अपनी तकलीफों को बड़ा दिखाने का सुख भी अजीब है इन्सानों में…”
“तुमने झेला होता वह सब, तब तुम्हें मालूम होता कि तकलीफ़ थी या दिखाई जा रही थी।” वेदना कमतर समझे जाने की नाख़ुशी उसके चेहरे पर थी।
“मैं नहीं कहता तकलीफ़ नहीं थी, थी और होनी भी चाहिए। बल्कि पीड़ाओं को जीए बग़ैर तो हम ठीक से इंसान भी नहीं हो सकते। तकलीफ़ें ज़िंदगी का सहज विकास है; क़िस्मत वाली हो तुम, जो तुम्हें मिली। मेरा कहना सिर्फ़ इतना है कि, हमारे जीवन में बहुत कुछ हॉरमोन्स के खेल हैं; जिन्हें हम डिप्रेशन टाईप के शब्दों से समझते हैं। लेकिन डियर तुम सोचो, कभी जिस इंसान के बग़ैर तुम रहने की कल्पना नहीं कर सकती थी, आज उसके साथ रहने की सोच भी नहीं सकती।”
“हाँ, यह तो सच है। पर उसने मेरे साथ जो भी किया हो, नफ़रत तो उससे मैं अब भी नहीं कर पाती।”
“तुम्हें नफ़रत करनी ही क्यों है? जो कुछ उससे सीखा और मिला, ज़िंदगी में उसे देखने का अपना नज़रिया सुधार लो। जो नहीं मिली, ऐसी तो अनगिनत चीजें हैं ब्रह्माण्ड में। और तुम्हारा प्यार सच था तो खोया उसने है, तुमने नहीं।”
“अच्छा, एक बात बताओ; एक फिलॉसफ़र को पैदा करने में भगवान को कुछ एक्सट्रा अफोर्ड लगाना पड़ता है क्या?” डिप्रेशन भूलकर मज़े की उसकी मंशा साफ़ हुई।
“करना पड़ता ही होगा, वरना तुम भी फिलॉसफ़र नहीं हो जाती?” मैं तिरछा मुस्काया।
“तो तुम्हें लगता है, हमने जिस लॉट में जन्म लिया है, वह ठेकेदारी में बनवाया गया था?” उसकी भौहों और आई लाइनर का, कमाल का टेढ़ापन दिल में हमेशा आरज़ूएं पैदा करता आया है।
“देखा तुमने, एक फिलॉसफ़र की सोहबत में किस तरह बुद्धि जागृत होती है? हा…हा…हा…” उसने मेरे गाल पर काटा और मेरे कंधे पर सर रखकर मेरी गरदन की ख़ुशबू गहरी साँसो के साथ ली। शायद उसका कोई बोझिल लिबास उतरा हो।
मुझे तो अलादीन के उस चिराग़ की कल्पना, कल्पना की तरह नहीं लग रही थी जिसके भीतर मख़मली गद्दों के बिस्तर, अरब क़ालीन और शराब की सुराहियाँ सजी हुई थीं। मृगनयनों का ही पैदा किया हुआ भ्रम था शायद, जो मुझे वे उन प्यालों की तरह दिख रहे थे जिनमें शराब थोड़ी-थोड़ी उड़ेल कर, इश्क़ की तरह चुस्कियों और तहज़ीब के साथ पी जानी चाहिए।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
