Expectation in Married Life
Expectation in Married Life

Expectation in Married Life: अपने पारिवारिक जीवन की चर्चा या कोई उलझन कभी किसी पुरुष सहयोगी के सामने बयां न करें अन्यथा वह सहानुभूति दर्शाकर सहयोग देने की पेशकश करेगा और अंतत: आपके दुख, जो दुख न होकर सिर्फ क्षणिक क्रोध था, को हवा देगा।

आ ज हमारे आसपास ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जो बड़ी उम्र की हैं, समझदार व संपन्न हैं जिनके किशोर पुत्र या पुत्री हैं, आकर्षक व ऊंचे ओहदे पर आसीन पति हैं। फिर भी उनकी अव्यावहारिक सोच उन्हें कहीं का नहीं छोड़ती है। उम्र के इस मोड़ पर जब ऐसी महिला से परिपक्वता की उम्मीद की जाती है तो वह चतुर किस्म के पुरुषों के जाल में उलझ जाती है, जिसे वह निश्छल स्नेह, आत्मीयता या दोस्ती समझती है।
वास्तव में वह प्यार, चाहत, लगाव, विश्वास, आत्मीयता या दोस्ती कुछ न होकर बढ़ती उम्र का आकर्षण, शारीरिक आवश्यकता या नवीनता की चाह मात्र होती है। इस कमजोरी का कुछ पुरुष भरपूर फायदा उठाते हैं। वे ऐसी कमजोर स्त्रियों को बहला-फुसलाकर उनकी तारीफ कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। बाद में वे उन्हें ‘दूध में पड़ी हुई मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं और तब से महिलाएं न घर की रहती हैं, न घाट की।

 Expectation in Married Life-sick mentality
sick mentality

कई बार होता यह है कि शादी के बाद जिस महिला का कोई पूर्व प्रेमी होता है, उसे वे भुला बैठती हैं, पर कुछ वर्षों बाद बच्चे बड़े होने लगते हैं व बाहर की दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं। पति भी अपने काम पर अधिक ध्यान लगते हैं तथा पत्नी को उतना समय नहीं दे पाते हैं। तब वह खुद को खाली, एकाकी व थकी हुई पाती है। ऐसे में उस पर यह सोच हावी हो जाती है कि मैं इनके लिए खटती रही, अपने शौक खत्म कर दिए, परिचय का दायरा समेट लिया और आज इन्हें मेरी सुध नहीं है। ऐसे में अकस्मात पूर्व प्रेमी का मिलना या किसी
और पुरुष का जीवन में आना उन्हें सुकून दे जाता है। वे अपने घर-परिवार को यह जताने के लिए कि मुझे भी कोई वक्त दे सकता है या किसी को मेरी भी फिक्र है, अपनी इस बीमार मानसिक सोच की वजह से ऐसे संबंध बना बैठती हैं, जिन्हें घर-परिवार सहन नहीं कर सकता है।

इसके लिए महिलाओं को स्वयं में मजबूती लानी होगी। पानी के बुलबुले की तरह विवाह पूर्व के संबंध मिटा डालने होंगे। न ही दोस्ती के नाम पर किसी पुरुष को अपने साथ छल करने की इजाजत देनी होगी। भूलकर भी अपने पुराने संबंधों को हवा नहीं देनी चाहिए। कोई पुरुष ऐसे संबंधों को चाहत का हवाला देकर जारी रखना
चाहता है तो भी अपने स्तर पर उसका विरोध करना चाहिए और अपनी ओर से इसे महत्त्व नहीं देना चाहिए। उसे इस सच्चाई को समझ लेना चाहिए कि तृप्ति की डकार ले, पुरुष थाली परे सरका देता है और जूठी थाली
नाली पर औंधी पड़ी रहती है।

बड़ी उम्र का विवाहित पुरुष जिंदगी का लंबा अनुभव रखता है। कर्णप्रिय शब्दों का जाल फैलाकर, दौलत लुटाकर तथा अपने रुतबे की धाक जमाकर ये घाघ पुरुष सुंदर जवान अनुभवहीन युवतियों को अपने प्रेम
जाल में फंसा लेते हैं। उन्हें ऐसा बेवकूफ बनाते हैं कि वे इनकी असली मंशा वक्त रहते समझ ही नहीं पातीं। जब उन्हें होश आता है तो ऐसे संबंधों से उन्हें पछतावे के सिवा और कुछ हासिल नहीं होता है। वे ऐसी राह चुन लेती हैं जो मंजिल तक नहीं पहुंचती है। हमारा समाज ऐसे रिश्तों को नहीं स्वीकारता है। समाज के नियम को
तोड़कर सुख-शांति से जीना आसान नहीं होता है। वे लोगों की शंका का शिकार होती हैं और कई सवालिया नजरों का सामना करना पड़ता है। अत: यह आवश्यक है कि संपर्क में आने वाले से एक निश्चित मर्यादित दूरी बनाकर रखें। उनसे अगर मिलना आवश्यक है तो अपने पति की उपस्थिति में ही मिलें।

सिनेमाई जिंदगी और वास्तविकता के अंतर को पहचानें क्योंकि जो परदे पर है, वह सिर्फ परदे पर ही होता है। मित्रता हमेशा हमउम्र या अपने स्तर के लोगों से ही बनाएं। बड़ी उम्र के पुरुष या स्त्री की दोस्ती को पहले सोच-समझकर, देखभाल कर परख लें फिर उन पर विश्वास करें। हमारा समाज पुरुष प्रधान है, यहां महिलाओं की स्थिति हमेशा कमजोर रही है। इस सत्य को स्वीकारें तथा अपनी स्थिति को और सुदृढ़ बनाने के लिए कहीं भी अपनी प्रतिष्ठा और इज्जत दांव पर न लगाएं।

विपरीत सेक्स के आकर्षण व उम्र की नजाकत को अपनी कमजोरी न बनाएं। हर प्रेमी को अपनी प्रेमिका संसार में सबसे खूबसूरत लगती है क्योंकि खूबसूरती शक्ल-सूरत में नहीं होती है बल्कि देखने वाले की नजर में होती है। पता नहीं कौन-सी चीज़ या कौन-सी बात किसी को पसंद आ जाती है। और बस सिलसिला शुरू हो जाता है पसंदगी का, प्यार का, पर विवाह के बाद दाम्पत्य संबंध की सीमा न लांघें, मर्यादा न तोड़ें।
अपने परिवार को प्राथमिकता दें, उसे ही समझें, सराहें व स्वीकारें।

सीमाओं का उल्लंघन ना करें

कई बार कई लोगों को बस यूं ही… बीते हुए अतीत को फिर से जीने का, दोहराने का पागलपन सवार हो जाता है। ढलती उम्र में जब जवानी हाथ से फिसलती दिखती है तब वह यह देखना चाहते हैं कि अभी भी किसी को अपने रूप और लावण्य से आकॢषत कर सकने की क्षमता रखते हैं या नहीं? और इसी के चक्कर में अतीत फिर जिंदा हो जाता है, या अतीत की परछाइयां उनके मध्य फिर से रेंगने लगती हैं पर तब भी उन्हें अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। उन्हें अपने परिवार के प्रति ईमानदार बने रहना चाहिए, आकर्षण के
मध्य सेक्स को नहीं आने देना चाहिए।

स्त्रियां भावुक होती हैं। भावना में बहकर ऐसे पुरुषों को अपना हितैषी मान बैठती हैं व संबंध प्रगाढ़ कर लेती हैं। वैवाहिक जीवन में अन्य पुरुषों से संबंध रखना अनैतिक होता है लेकिन अकेलेपन से ऊबी महिलाओं को कभी-कभी समस्याग्रस्त पुरुष मिल जाते हैं। वे स्त्रियां उनसे हमदर्दी का रिश्ता रखती हैं तथा उन पुरुषों की
परेशानियां दूर करने में अपना अकेलापन भूल जाती हैं लेकिन कुछ समय बाद वह नयापन भी पुराना हो जाता है, इस हद तक कि वह अपने परिवार की ऊब से भी अधिक विकृत और घृणित लगने लगता है। और तब वह महिला ऊब के साथ-साथ अपराधबोध से ग्रस्त होने के कारण तनाव भी महसूस करने लगती हैं।