Hindi Kahani: समय बीतता गया, मीना जी किसी ना किसी तरीके से अनुप को समझाती लेकिन अनुप अपने फैसले पर अडिग रहा। अनुप रश्मि से मिलता रहा, उसे यकीन दिलाता रहा कि वो एक-दूसरे के लिए बने हैं।
‘अरे रामेश्वर भाई साहब आप, आइए ना! मीना जी ने कहते हुए दरवाजा खोला।
‘मनोहर कहां है भाभी?’
‘पूजा कर रहे हैं। आप बैठिए, मैं अभी बुलाती हूं। पूजा खत्म करके मनोहर जी आए और अपने दोस्त से गले मिलते हुए उनका हाल-चाल पूछा। ‘रामेश्वर रिटायरमेंट के बाद जिंदगी कैसी कट रही है? मनोहर जी ने पूछा।
‘अभी तो दो-चार दिन ही हुए लेकिन सच बताऊं तो सुकुन महसूस कर रहा हूं। इतने सालों से वही रूटीन फालो करके ऊब गया था। बस अब जल्दी से रश्मि के हाथ पीले कर गंगा नहाना चाहता हूं।’ रामेश्वर जी ने कहा। ‘फिर देर किस बात की, चलो तुम्हारी ये इच्छा भी पूरी किए देते हैं। हंसते हुए मनोहर जी ने कहा।
‘मैं समझा नहीं।
‘मतलब हम रश्मि को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं। क्यों मीना मैंने ठीक कहा ना!
मीना जी ने हंसते हुए हामी भर दी। ‘ओह! आप लोगों ने मेरे मुंह की बात छीन ली। मैं सच में बहुत भाग्यशाली हूं।
अनुप और रश्मि की जोड़ी बहुत खूब जमेगी। रामेश्वर जी खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। ‘दोनों बचपन के दोस्त भी हैं लेकिन एक बार हमें दोनों बच्चों की राय भी पूछनी चाहिए। मनोहर जी ने कहा। ‘हां, तुम ठीक कह रहे हो। मैं आज ही रश्मि से बात कर लूंगा। रामेश्वर जी ने कहा।
कुछ देर तक बातें चलती रही। उसके बाद रामेश्वर जी ने आज्ञा ली और अपने घर चले गए।
इधर रश्मि और अनुप पार्क में बैठे भविष्य के सपने सजा रहे थे। दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे लेकिन ये
बात घरवालों को पता नहीं था।
‘तुम अंकल से हमारी शादी के बारे में अब बात करोगे? रश्मि ने शिकायती लहजे में अनुप से पूछा।
‘आज पक्का, मैं पापा से बात कर लूंगा। या यूं कहूं की इस बार की होली हम दोस्त नहीं पति-पत्नी बनकर खेलेंगे। शरारती लहजे में अनुप ने कहा। ‘अच्छा, इतना कांफिडेंस? देखते है! रश्मि ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।
‘चलो बाय-बाय… इतना कहकर दोनों अपने घर चले गए। रश्मि के घर पहुंचते ही, आशा जी ने रश्मि से अनुप के बारे में बात की तो जैसे रश्मि की मन की मुराद पुरी हो गई। उधर मनोहर जी ने भी ये खुशखबरी रामेश्वर जी को सुना दी। दोनों घरों में खुशियों की लहर दौड़ गई।
दोनों परिवारों में शादी की तैयारियां चलने लगी शादी के दो दिन बाद होली थी। अनुप बार-बार रश्मि को अपनी कही बात पर छेड़ता और कहता, देखा कहा था ना कि इस बार की होली हम पति- पत्नी
बनकर खेलेंगे। उसकी बात सुनकर रश्मि शरमा जाती।

शादी को दो दिन ही बचे थे। शादी की तैयारियां लगभग हो चुकी थी। खाने के मेन्यू में आए बदलाव के कारण मनोहर जी इस बाबत कैटरर से मिलने चले गए। कैटरर से बात करके और फाइनल लिस्ट उनको देकर वो घर लौट रहे थे तभी एक बाइक ने उन्हें टक्कर मारी दी और उनकी उसी वक्त मृत्यु हो गई। बाइक चला रहे
दोनों व्यक्ति नशे में थे। कैटरर ने तुरंत एक्सीडेंट की खबर अनुप को दी। अनुप ने रामेश्वर जी को भी खबर कर दिया और दोनों हॉस्पीटल पहुंचे तो उन्हें पता चला की मनोहर जी की मृत्यु हो चुकी है।
दोनों घरों में इस घटना के कारण हाहाकार मच गया। दोनों घरों में मातम छा गया। किसी ने भी ऐसे अनिष्ट की कल्पना तक नहीं की थी। दोनों परिवारों के लगभग सारे रिश्तेदार भी आ चुके थे। रामेश्वर जी इस कठिन समय में हर पल अनुप के साथ रहे। उन्हें अपने दोस्त के जाने का गम अंदर ही अंदर खाए जा रहा था लेकिन अनुप कमजोर ना पड़ जाए इसलिए वो ऊपर कठोर बने रहे। मनोहर जी की आकस्मिक मृत्यु के कारण घर में तरहतरह की बातें होने लगी। कोई कहता, ‘लड़की के पैर बहुत अशुभ है, तो कोई कहता ‘अपशकुनी है, ससुर को ही खा गई।’
ये उड़ती-फिरती बातें मीना जी के कानों तक पहुंची और उन्होंने भी मन ही मन इस बात का यकीन कर लिया कि रश्मि अपशकुनी है।
इस घटना को तीन-चार महीने बीत गए। अब जिंदगी की गाड़ी धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी थी। एक दिन रामेश्वर जी अनुप के घर आए और मीना भाभी से कहने लगे, ‘समय कब बदल जाता है किसी को नहीं पता, मनोहर इस शादी से कितना खुश था। काश! वो… इतना सुन मीना जी रोने
लगी।
‘भाभी ईश्वर की मर्जी के आगे हम सब बेबस हैं लेकिन मनोहर की इच्छा को अब हम सब मिलकर पूरा करेंगे। आप कहिए तो शादी के लिए नया दिन निकलवाएं?
‘नहीं, अब रश्मि और अनुप की शादी नहीं हो सकती। ‘आप ये क्या कह रही हैं?
‘सही कह रही हूं। रश्मि हमारे परिवार के लिए अपशकुनी है। उससे रिश्ता तय होते ही मनोहर जी इस दुनिया से चले गए। रामेश्वर जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। ‘आप ये क्या कह रही हैं? मनोहर का इस दुनिया से जाना ईश्वर की इच्छा थी। इसमें रश्मि का कोई दोष नहीं। मुझे लगता था कि आप समझदार महिला हैं लेकिन आप भी अंधविश्वासी और छोटी सोच की निकलीं। मेरी बेटी अपशकुनी नहीं है। आप क्या रिश्ता तोड़ेंगी! मैं ऐसे घर में स्वयं अपनी बेटी को नहीं दूंगा। मैं
ये रिश्ता तोड़ता हूं।
गुस्से में आगबबूला होकर रामेश्वर जी वहां से चले गए। बात अनुप तक पहुंची। उसने मां को बहुत समझाया लेकिन वो नहीं मानी। अनुप ने भी अपना फैसला सुना दिया। अगर वो शादी करेगा तो सिर्फ रश्मि से और किसी से नहीं। मीना जी अनुप के फैसले से ना पिघली और वैसे ही कठोर बनी रही।
कुछ दिनों बाद अनुप के मामा, अपनी भांजी और अनुप की छोटी बहन राधा के लिए रिश्ता लेकर आए। लड़के का परिवार समृद्ध और पढ़ा-लिखा था। लड़का भी सरकारी नौकरी करता था। उसके मां और पिता दोनों शिक्षक थे।
मामा ने अपनी बहन मीना को समझाते हुए कहा कि अनुप को कुछ समय दो, अभी जख्म हरा है। फिर वो तुम्हारी बात मान लेगा और उस लड़की से विवाह करने से इंकार कर देगा। अभी बेटी की शादी धूमधाम से करो। मीना जी ने हांमी भर दी। कुछ ही दिनों में राधा का विवाह मनीष से कर दिया गया। ससुराल में राधा को
सब ह्रश्वयार करते थे। इधर रश्मि ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अनुप को नौकरी मिल गई। समय बीतता गया, मीना जी किसी ना किसी तरीके से अनुप को समझाती लेकिन अनुप अपने फैसले पर
अडिग रहा। अनुप रश्मि से मिलता रहा और उसे यकीन दिलाता रहा कि वो एक-दूसरे के लिए बने हैं।
सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था। अचानक राधा के पति के एक्सीडेंट की खबर आई। अचानक गाड़ी के सामने एक छोटा बच्चा आ गया और उसे बचाने के लिए गाड़ी सड़क से नीचे लुढ़क गई। खैर मनीष की जान तो बच गई लेकिन उसे रीढ़ की हड्डी में चोट आई, जिस कारण डॉक्टर ने उसे छह महीने बेडरेस्ट की
सलाह दी।
मीना जी यह खबर सुनते ही डर गई और यह सोच बैठी कि अब उनकी बेटी को भी सब मनहूस कहेंगे। इस डर के कारण वो राधा के घर पहुंच गई और कहने लगी कि इसमें राधा की कोई गलती नहीं है और
इस घटना को ईश्वर के कहर का नाम देने लगी।
राधा की सासू मां मीना जी के मन की बात भांप गई और उनको आश्वस्त करने के लिए कहने लगी, ‘मैंने तो आपसे ऐसा कुछ नहीं कहा। आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि हम अपनी बहू को मनहूस मानेंगे। हम पढ़े-लिखे लोग हैं और ऐसी रूढ़िवादी सोच को बिलकुल नहीं मानते। मुझे तो खुशी है कि मुझे राधा जैसी बहू मिली जो अपने पति की सेवा में लगी है। कोई शुभ-अशुभ नहीं होता, ये तो संयोग की बात है। होनी को कौन टाल सकता है!
समधन की बात सुनकर मीना जी के गले में महीनों से लटकी हुई फांस आज निकल गई। रश्मि के साथ किए गए उन्हें अपने दुर्व्यवहार के लिए बहुत अफसोस हुआ। वो वहां से सीधे रामेश्वर जी के घर पहुंची और अपने किए की माफी मांगी। रश्मि और अनुप का विवाह एक निश्चित दिन निकालकर कर दिया। दूसरे दिन होली का
त्यौहार था। अनुप ने रश्मि से किए गए अपने वादे की याद दिलाते हुए लाल रंग उसके गाल में लगा दिया और धीरे से कहा ‘होली की शुभकामनाएं मिसेज अनुप। इतना सुनते ही रश्मि शर्म से उसके आगोश में समा गई।
