Sharda Sinha: मैं किसी हाल में मायूस नहीं हो सकती, जुल्मतें लाखों हो मगर उम्मीद सहर रखती हूं, ये मिसरा शारदा सिन्हा पर बिल्कुल फिट बैठता है। उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी उम्मीद नहीं छोड़ी और जिंदादिली के साथ अपनी पूरी जिंदगी जीती रहीं।
छठ गीत की पर्याय बन चुकीं शारदा सिन्हा के गानों के बिना बिहार का ये त्यौहार अधूरा ही माना जाता है। माथे पर बड़ी सी बिंदी, सिल्क की साड़ी और गले में बड़ी सी चेन, ये थी उनकी पहचान। देवी की तरह दिखने वाली शारदा सिन्हा की वाणी में सरस्वती का वास है। जीवन भर छठी मैया की पूजा-अर्चना करने
वाली पद्मश्री गायिका ने छठ के दिन ही प्राण गंवा दिए। गीत-संगीत के साथ उनको नृत्य का भी बेहद शौक था। उनकी गायिकी में आंचलिक भाषा और बोली की मिठास सुनाई देती थी जो उन्हें आमजन से जोड़कर रखती
थी। शारदा सिन्हा के गानों में दर्द-वेदना के साथ मौज मस्ती भी होती थी। मशहूर होने के लिए कभी भी उन्होंने अपने गाने का ट्रैक नहीं बदला। उनके गानों में अश्लीलता ना थी। कोई भी बिहारी ऐसा नहीं होगा जिसके
घर में छठ के समय शारदा सिन्हा का गीत ना बजे।
स्टेज पर गाना गाने से पहले वह हमेशा पान जरूर खाती थीं। पान खाने की वह कोई आदी नहीं थी बल्कि वह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करती थीं। मिथिलांचल में हमेशा मां भगवती को पान प्रसाद के रूप में चढ़ाया
जाता था। पान के अलावा वह साड़ियों की भी बेहद शौकिन थी। वह सिल्क की साड़ियां ही ज्यादा पहनना पसंद करती थीं। उनके हाथ हमेशा चूड़ियों से भरे रहते थे। हमेशा साज श्रृंगार में रहने वाली शारदा सिन्हा अपने पति की मौत के बाद मायूस रहने लगी थीं। उनके निधन के 2 महीने बाद ही उन्होंने दुनिया को
अलविदा कह दिया। बिहार के समस्तीपुर में 1 अक्टूबर 1952 को 6 भाइयों के बाद जन्मी शारदा सिन्हा
बड़ी मन्नतों के बाद पैदा हुई थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया है कि ‘मैं अपने मायके में दबंग लड़की थी। मुझे किसी काम के लिए मना नहीं किया जाता था। बचपन में मेरे पिता जी ने मुझे संगीत और नृत्य सिखाने के
लिए एक गुरु को घर पर बुलाया गया था। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा मैंने बचपन से ही ली थी। मैथिली परिवार में जन्मी शारदा जी ने कहा था कि उन्होंने अपने करियर का पहला गाना अपने घर से ही शुरू किया था। उनके भाई की शादी में उन्होंने अपना पहला गाना गाया था और इस गाने को बेहद पसंद किया गया। बिहार की पांचों प्रमुख भाषाओं जैसे- मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, मंजूषा के साथ उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी
अपनी आवाज दी है। कई भाषाओं की ज्ञाता शारदा घर में कई लोगों की नकल करना भी जानती उनकी इस कला को ससुराल वालों ने बेहद पसंद किया था। बेटी से बहू बनने के बाद उन्हें भी हर महिला की तरह समझौता करना पड़ा। उनकी सास को शारदा का गाना-बजाना और प्रोग्राम में जाना पसंद नहीं था। लेकिन जब लोगों ने उनकी बहू की तारीफ उनके सामने की तो वो भी अपनी बहू की फैन हो गईं।

शादी के बाद एक औरत का कोई साथ दे ना दे लेकिन उसका पति अगर साथ देता है तो वह शारदा सिन्हा जैसी शख्सियत बन जाती हैं। बिहार कोकिला अपने हर साक्षात्कार में सिन्हा जी के सपोर्ट का जरूर जिक्र करती हैं। जीवन के कई उतार-चढ़ाव में उम्मीद नहीं तोड़ने वाली शारदा ने लोक गीतों के साथ गजल, भजन और बॉलीवुड फिल्मों तक में अपनी सुरीली आवाज से लोगों के दिलों में घर कर गईं।
मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर से जुड़े एक किस्से के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘लखनऊ में एक ऑडिशन देने के दौरान जब मेरा चयन नहीं हुआ तो मैंने चिंता में कुल्फी खाकर गला खराब कर लिया था।
उसके बाद सिन्हा जी ने कहा कि एक बार और ऑडिशन के लिए पूछते हैं। जब उनका दोबारा ऑडिशन हुआ तो उनका सलेक्शन भी हो गया और बेगम अख्तर ने उन्हें कहा कि तुम्हारी आवाज बहुत अच्छी है, तुम बहुत
आगे जाओगी।
छठ की रौनक रहीं शारदा की आवाज केवल बिहारियों के दिल-दिमाग में ही नहीं बल्कि उनकी आवाज का दीवाना कहें तो पूरा भारतवर्ष है। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वह हर रोज 8 घंटे से ज्यादा रियाज
करती थीं वह कई बार अपने बच्चे को स्टेज पर साड़ी में छुपाकर रियाज के समय दूध भी पिलाती थीं। वह कहती थी कि मैं अपना रियाज कभी नहीं छोड़ सकती थी। शारदा सिन्हा की आवाज अमर है, उनकी आवाज
हर किसी के जेहन में हमेशा ही रहेगी। उनकी बेटी ने कहा है कि वह मां की विरासत संभालेगी लेकिन उनके जैसा कंठ किसी को नहीं मिला है।
श्रीमती शारदा सिन्हा मेरे लिए आदर्श हैं सीमा प्रियदर्शिनी सहाय

पद्म श्री और पद्म विभूषण जैसे सम्मान से सम्मानित बिहार की स्वर कोकिला श्रीमती शारदा सिन्हा किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। हम बिहार वासियों के लिए वह एक महान गौरव थीं। भगवान सूर्य देव और माता
सरस्वती की कृपा ने बिहार को अपने आप पर गर्व करने के लिए श्रीमती शारदा सिन्हा जी को एक बिहारी के रूप में भेजा था। कोयल उनके कंठ में मौजूद थीं। जब भी वह गातीं तो उनके उन्मुक्त कंठ की स्वर लहरियों
से दिलों में तार बजने लगती थी।
उन्होंने शादी के बाद न सिर्फ अपनी पढ़ाई जारी रखी बल्कि संगीत का रियाज भी जारी रखा। संगीत में बीएड करने के बाद समस्तीपुर में संगीत की प्रोफेसर बनीं। बिहार के रुढ़िवादी माहौल में घर से बाहर निकल
कर नौकरी करना और फिर अपने आप को गायिका के रूप में प्रतिष्ठित करना, यह कोई आसान काम नहीं था, मगर शारदा जी ने यह कर दिखाया। अपने पूरे परिवार को साथ लेकर इस कामयाबी पर पहुंची और अपने आप को सिद्ध किया। न सिर्फ छठ के गीतों तक या मैथिली और भोजपुरी गीतों तक उनकी सीमा बनी रही बल्कि हिंदी फिल्मों तक भी उन्होने अपनी पहचान बनाई। समय अनवरत गतिशील है और इस दुनिया में
सबकुछ नश्वर है। समय के चक्र में आज श्रीमती शारदा सिन्हा जी अतीत में समा गईं लेकिन उनके रूप और सुर दोनों की आवाज अमर रहेंगी।
शत-शत नमन आपको शारदा जी, बिहार को, भारत को और पूरी दुनिया को आप पर हमेशा फक्र रहेगा।
मेरी नजर में शारदा सिन्हा कविता झा ‘अविका’
बात उन दिनों की है जब मैंने लेखन के सफर में कदम रखा ही था। ओनलाइन एक काव्य मंच से जुड़ी और सभी के आग्रह करने पर जब अपनी लिखी कविता सुनाई तो वहां के एडमिन ने जो मुझसे कहा वो शब्द मेरे लिए बड़े ही अनमोल थे। जिनकी आवाज से ही छठ और सामा चकेवा जैसे पर्व का आनंद उठाती आई हूं,
बचपन से उनके गीत सुनती आई हूं उनकी आवाज से मेरी तुलना की जाए। शायद वो मजाक ही किया होगा उस मंच के एडमिन ने परन्तु मेरे मन में शारदा सिन्हा के प्रति बहुत ही सम्मान रहा है।

हमारे मिथिलांचल के साथ-साथ पूरे भारत का नाम रोशन किया है उन्होंने। आज बिहार ही नहीं पूरे देश और विदेशों में भी उनके गीत सुने जाते हैं। उन जैसा तो शायद इस जन्म में बनना मुश्किल है। वह मेरी आदर्श हैं। मिथिला की बेटी थी वो और मैं भी मैथिल परिवार से हूं। काश! वो बात सच हो जाए कि मेरी आवाज शारदा सिन्हा से मिलती है। मैं उन्हें अपना गुरु मानती हूं। उनके गाए छठ और सामा के गीत पर मन भक्ति और जोश से भर जाता है। मैं उन्हें अपने गुरु के रूप में देखती हूं। उनके मौत की खबर पर विश्वास ही नहीं हो रहा। मन बार-बार यही कह रहा है कि काश! ये खबर झूठी हो। उनके गीतों में वह हमेशा जीवित रहेंगी। उनका वो हंसता-मुस्कुराता चेहरा हमेशा आंखों पर नाचता रहता है।
“छठ की रौनक रहीं शारदा की आवाज केवल बिहारियों के दिल-दिमाग में ही नहीं बल्कि उनकी आवाज का दीवाना कहें तो पूरा भारतवर्ष है।”
