shiv ka krodh
shiv ka krodh

Hindi Katha: एक बार दक्ष प्रजापति के हृदय में अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा उत्पन्न हुई। तब उन्होंने शीघ्र ही महायज्ञ की तैयारी कर सभी देवगण को आमंत्रित कर लिया। इन्द्रादि समस्त देवता अपने-अपने विमानों में बैठकर यज्ञस्थली की ओर चल पड़े।

उन्हें जाते देखकर भगवती पार्वती उत्सुकतावश भगवान् शिव से बोलीं ‘भगवन् ! ये देवगण इतने प्रसन्न होकर अपनी-अपनी पत्नियों के साथ कहाँ जा रहे हैं? क्या आज कोई विशेष पर्व या शुभ दिन है? कृपया बताने का कष्ट करें।

भगवान् शिव अपने आसन पर बैठे परब्रह्म परमात्मा का ध्यान कर रहे थे । भगवती पार्वती का स्वर सुनकर उन्होंने आँखें खोलीं और उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले – “कल्याणी ! दक्ष प्रजापति ने अश्वमेध नामक एक महायज्ञ का आयोजन किया है। ये समस्त देवगण वहीं जा रहे हैं। यज्ञ – पुण्य और यज्ञ – भाग मिलने से इनके बल-पौरुष में और भी वृद्धि हो जाएगी, इसलिए ये प्रसन्नचित्त और उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। “

भगवान् शिव की बात सुनकर पार्वती बोलीं- ” प्रभु ! प्रजापति दक्ष महायज्ञ का आयोजन कर रहे हैं। इसलिए यज्ञ की व्यस्तता में वे हमें निमंत्रण देना भूल गए होंगे। हमें उनके प्रति कोई द्वेष रखे बिना शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिए। आपके बिना यह यज्ञ कभी पूरा नहीं हो सकता । “

भगवान् शिव उन्हें समझाते हुए बोले – “देवी ! पूर्वकाल से ही देवताओं ने किसी भी यज्ञ में मेरा भाग नहीं रखा है। इसलिए दक्ष प्रजापति ने मुझे आमंत्रित नहीं किया है। हमें भी पहले से चले आ रहे इस नियम का पालन करना चाहिए ।

‘ भगवती पार्वती बोलीं-‘भगवन् ! आप सब देवताओं में श्रेष्ठ हैं। आपके गुण और प्रभाव सबसे अधिक हैं। आपका तेज, बल और यश – संसार में अद्वितीय है।आप ही साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं। यह सृष्टि आप द्वारा ही रचित है। इसके बाद भी यज्ञ में आपका भाग नहीं होने पर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है। भगवन् ! उन दुष्टों को इस धृष्टता के लिए आप अवश्य दण्डित करें। “

तब भगवती पार्वती की इच्छा पूर्ण करने के लिए लीलाधारी भगवान् महादेव की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। वे भयंकर गर्जना करते हुए अपने आसन से उठे और अपनी एक जटा उखाड़कर ज़ोर से एक चट्टान पर पटक दी। शीघ्र ही वहाँ वीरभद्र नामक एक दिव्य पुरुष प्रकट हो गया। उसका शरीर अति विशाल और मुख विकराल था। हज़ारों भुजाओं से युक्त वह पुरुष अनेक अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित था। उसके मुख से भयंकर अग्नि- ज्वालाएँ निकल रही थीं । आँखों में अंगारे दहक रहे थे। वह साक्षात् काल – स्वरूप भगवान् महादेव का अंशावतार था ।

प्रकट होने के बाद वीरभद्र हाथ जोड़कर भगवान् शिव से बोला – ” प्रभु! मैं आपके क्रोध की अग्नि से उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा कार्य आपके शत्रुओं का नाश करना है। बताइए, मुझे किस दुष्ट और पापी का संहार करना है। “

भगवान् शिव आदेश देते हुए बोले – ” वीरभद्र ! मैं तुम्हें अपने पार्षदों का अधिपति घोषित करता हूँ। तुम तत्क्षण मेरे पार्षदों के साथ जाकर उस अहंकारी दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर उसे दण्डित करो। वहाँ जितने भी मेरे विरोधी हों, उन्हें अपने क्रोध की अग्नि में जलाकर भस्म कर दो।” भगवान् शिव की आज्ञा से वीरभद्र ने सिंह- वेश धारण कर लिया और शिव-पार्षदों की एक बड़ी सेना लेकर दक्ष प्रजापति को दण्डित करने चल पड़ा। उस समय उसके साथ भगवती पार्वती के क्रोध से उत्पन्न भद्रकाली भी थीं।

इधर यज्ञशाला में बैठे ऋषि-मुनियों और देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर धूल उड़ती देखी तो शिव के अनन्य भक्त दधीचि मुनि बोले – ” मान्यवरो ! दक्ष ने भगवान् शिव को यज्ञ में आमंत्रित न कर घोर पाप किया है और यह उसी पाप का फल प्रतीत होता है। अवश्य यह संहारकर्ता भगवान् शिव के क्रोध का प्रतिफल है। उन्हें क्रोधित करने वाला तीनों लोकों में कहीं भी शरण नहीं पा सकता। विधाता भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते। अब दक्ष प्रजापति को अपने पाप का फल अवश्य भोगना होगा । “

दधीचि मुनि बोल ही रहे थे कि तभी वीरभद्र ने शिवगण के साथ यज्ञशाला पर आक्रमण कर दिया। उसके प्रहारों से आहत होकर सभी लोग प्राण बचाकर इ र-उधर भागने लगे। शिव – पार्षदों के भयंकर गर्जन से दसों दिशाएँ गूँज उठीं। कोई वहाँ की वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट करने लगे तो कोई मण्डपों को गिराने लगे। देखते-ही- देखते उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर डाला।

तब दक्ष प्रजापति विनम्रतापूर्वक वीरभद्र से बोले – “देव ! आप कौन हैं? हमने कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण आप इस यज्ञ को नष्ट करने के लिए उद्यत हुए हैं?”

वीरभद्र बोला – “प्रजापति ! न तो मैं देवता हूँ और न ही दैत्य । मेरा नाम वीरभद्र है और मैं भगवान् शिव के कोप से प्रकट हुआ हूँ। ये भद्रकाली हैं। इनका प्रादुर्भाव भगवती पार्वती के क्रोध से हुआ है। दक्ष ! तुमने अपने यज्ञ में भगवान् शिव को न बुलाकर उनका तिरस्कार किया है। इसलिए उनकी आज्ञानुसार मैं तुम्हारा यज्ञ नष्ट करने आया हूँ। “

वीरभद्र की बात सुनकर ब्रह्माजी देवताओं से बोले – ” देवगण ! जिस पर स्वयं भगवान् क्रोधित हो जाएँ, उस प्राणी को कोई नहीं बचा सकता। किंतु भगवान् शिव परम दयालु और भोले भंडारी हैं। भक्तों द्वारा पुकाने जाने पर वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। यदि तुम चाहते हो कि यह यज्ञ पुनः आरम्भ होकर पूर्ण हो तो पवित्र मन से भोले भंडारी से क्षमा-याचना करो । अन्यथा यह यज्ञ क्या, संपूर्ण सृष्टि का बचना असम्भव हो जाएगा । “

तत्पश्चात् ब्रह्माजी—देवताओं, प्रजापतियों और पितृों को साथ लेकर कैलाश की ओर चल पड़े।

उस समय भगवान् शिव क्रोधित होकर ताण्डव कर रहे थे। उनके पैरों की थाप से सम्पूर्ण सृष्टि में कम्पन हो रहा था। नदियों के मार्ग बदल गए थे। समुद्र की लहरें रौद्र रूप दिखा रही थीं। ब्रह्माजी उनकी स्तुति करते हुए बोले – “देवाधिदेव महादेव ! आप सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं। आप शुभ कर्म करने वालों को स्वर्ग अथवा मोक्ष प्रदान करते हैं तथा पाप कर्म करने वालों को घोर नरकों में डालते हैं। आपने धर्म और अर्थ की प्राप्ति करवाने वाले वेदों की रक्षा के लिए यज्ञ को प्रकट किया, किंतु दक्ष जैसा शुभ कर्म कर रहा था, उसका परिणाम कितना अशुभ हुआ। भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं । भगवान् की माया भी आपको भ्रमित नहीं कर सकती। दक्ष ने आपका तिरस्कार कर घोर पाप किया है, किंतु आप परम दयालु और भक्त – वत्सल हैं। अत: उस अपूर्ण यज्ञ का पुनरुद्धार करने की कृपा करें। “

ब्रह्माजी के इस प्रकार स्तुति करने से भगवान् शिव का क्रोध शांत हो गया और वे प्रसन्न हो गए। उनके क्षमाभाव को देख सभी उनकी जय-जयकार करने लगे। तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् शिव ब्रह्माजी के साथ दक्ष की यज्ञशाला में गए।

महादेव को देख दक्ष प्रजापति करुण स्वर में उनकी स्तुति करते हुए बोले “भगवन् ! मैंने यज्ञ में आपको आमंत्रित न कर घोर पाप किया था, मुझे क्षमा करें, भगवन्। मैं आपकी महिमा को नहीं जानता था। किंतु आज आपने मेरे ज्ञान – चक्षु खोल दिए हैं। यद्यपि मैं आपकी कृपा प्राप्त करने के योग्य नहीं हूँ, फिर भी आप प्रसन्न होकर मुझ पर दया कीजिए । “

तब भगवान् महादेव बोले – ” प्रजापति दक्ष ! मैं तुम्हारी भक्ति और श्रद्धा से अत्यंत प्रसन्न होकर तुम्हें क्षमा करता हूँ। निःसंकोच बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ?”

प्रजापति दक्ष बोले – “प्रभु ! आपके पार्षदों द्वारा यज्ञ की जो सामग्री नष्ट- भ्रष्ट कर दी गई है, वह अनेक दिनों के प्रयत्न से संचित की गई थी। इसके बिना मेरा यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता है। अत: आप वर – स्वरूप इन सामग्रियों को पुनः यज्ञ- योग्य बनाने की कृपा करें, जिससे कि मैं यह यज्ञ पूर्ण कर आपका और यहाँ उपस्थित अन्य देवताओं का पूजन कर सकूँ। ‘

तथास्तु कहकर भगवान् शिव ने दक्ष की इच्छा पूर्ण कर दी।

इसके बाद वह यज्ञ पुनः आरम्भ हुआ । यज्ञ पूर्ण होने पर भगवान् महादेव ने वहाँ उपस्थित सभी ऋषि-मुनियों और देवताओं को अपने विराट् स्वरूप के दर्शन करवाए। इसके बाद दक्ष ने भगवान् शिव सहित सभी देवताओं का पूजन कर उन्हें यज्ञ-भाग प्रदान किया।

इस प्रकार भगवान् शिव की कृपा से दक्ष प्रजापति का यज्ञ पूरा हुआ।

कुछ ग्रंथों में बताया गया है कि इसी यज्ञ में सती ने प्राण त्याग दिए थे। बाद में हिमालय के यहाँ उमा पार्वती के रूप में जन्म लिया था।