sooryoday nahin
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Hindi Katha: प्राचीन समय की बात है – प्रतिष्ठानपुर नामक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण का नाम कौशिक था। पूर्व जन्म में किए हुए पापों के कारण उसे कोढ़ हो गया। उसके सभी संबंधी उसे छोड़कर वहाँ से चले गए। भयंकर रोग होने के बाद भी उसकी पत्नी मृदुला उसे देवता के समान पूजती थी । वह प्रतिदिन उसके पैरों की मालिश करती, स्नान करवाती, कपड़े पहनाती और भोजन करवाती थी। इस प्रकार अपने सुखों का त्याग कर वह सदा अपने पति की सेवा में मग्न रहती थी । कौशिक ब्राह्मण बड़ा क्रोधी स्वभाव का था । वह प्रायः मृदुला को भला-बुरा कहता रहता था। मृदुला शांत मन से सबकुछ सहन कर लेती थी । कौशिक ब्राह्मण से चला फिरा नहीं जाता था।

एक दिन उसने मृदुला से कहा “प्रिय ! कुछ दिन पहले मैंने घर के सामने से एक सुंदर दासी को जाते देखा था। वह मेरे मन में बस गई है। मैं उस दासी को चाहने लगा हूँ, किंतु मुझमें उस तक पहुँचने की शक्ति नहीं है। इसलिए तुम मुझे उसके पास ले चलो और उससे मिला दो ।”

पति के वचन सुनकर भी साध्वी मृदुला को क्रोध नहीं आया। उसने पति को दासी के पास ले जाने का दृढ़ निश्चय किया और उसे अपने कंधों पर उठा लिया। फिर धीरे-धीरे दासी के घर की ओर चल पड़ी। रात्रि का समय था । आकाश में बादल छाए हुए थे। केवल बिजली के चमकने से मार्ग दिखाई दे जाता था । ऐसे घोर अंधकार में मृदुला पति को कंधे पर उठाए, राजमार्ग से जा रही थी।

मार्ग में एक सूली थी, जिसपर चोरी के संदेह में माण्डव्य नामक एक ऋषि को चढ़ा दिया गया था। यद्यपि माण्डव्य चाहता तो अपनी मंत्र – शक्ति से इस दण्ड से बच सकता था, किंतु उसे ज्ञात था कि बचपन में वह चींटियों को काँटे चुभो- चुभोकर पीड़ा दिया करता था । उसी पाप के परिणामस्वरूप उसे सूली पर चढ़ना पड़ा था। इसलिए वह अपने दुष्कर्म का यह दण्ड भोग रहा था।

अंधकार में देख न सकने के कारण कौशिक ने अनजाने में ही अपने पैर से सूली को हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्य बोला – ” जिस दुष्ट ने सूली को हिलाकर मुझे कष्ट पहुँचाया है, मुझे दुःखी किया है, वह पापी आत्मा सूर्योदय होने पर अपने प्राणों से हाथ धो बैठे। सूर्य-दर्शन से उसका विनाश हो जाए। “

माण्डव्य ऋषि का शाप सुनकर मृदुला बोली “ब्राह्मण देव ! मेरे पति से अनजाने में ही यह कार्य हो गया। आप एक परम तपस्वी हैं। वेदों और शास्त्रों का आपने अध्ययन किया है। इस प्रकार विचलित होकर शाप देना आपको शोभा नहीं देता। कृपया अपने शाप को वापस ले लें। “

माण्डव्य ऋषि क्रुद्ध स्वर में बोला – ” हे दुष्टा ! मेरा शाप वापस नहीं हो सकता। तुम्हारे पति ने जानबूझकर मुझे पीड़ा पहुँचाई है, इसका फल उसे अवश्य भोगना होगा । “

तब मृदुला बोली – “मुनिवर ! आप अपना शाप वापस ले लें, अन्यथा कल सूर्योदय नहीं होगा। यदि मैंने सच्चे मन से पति सेवा की है तो मैं अपने सतीत्व के बल से सूर्य को रोक लूँगी।” इतना कहकर मृदुला वहाँ से चली गई।

पतिव्रता मृदुला के सतीत्व के समक्ष सूर्य भी असहाय हो गए और कई दिनों तक नहीं निकले। सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब इन्द्र सहित सभी देवता ब्रह्माजी की शरण में गए और उनसे विनती करते हुए बोले “हमारी रक्षा करें, पितामह ! मृदुला ने सूर्यदेव को बाँध लिया है। ऋषि-मुनि यज्ञ, हवन आदि करके हमें भोजन प्रदान करते थे। किंतु प्रात:काल हुए बिना ये सब पुण्य कर्म असम्भव हो गए हैं। आप हमारी सहायता कीजिए, प्रभु।”

देवताओं को चिंतित देख ब्रह्माजी बोले – ” पुत्रो ! मृदुला की महानता के कारण ही सूर्योदय नहीं हो रहा है । आप सब महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया के पास जाएँ और सूर्योदय की कामना से उन्हें प्रसन्न करें। वे परम साध्वी और पतिव्रता स्त्री हैं। उनके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। वे पतिव्रता मृदुला को समझाकर सूर्य देव को मुक्त कर देंगी। “

ब्रह्माजी के परामर्श से इन्द्र सहित सभी देवता सती अनसूया की शरण में गए और उनकी स्तुति करने लगे। तब सती अनसूया बोलीं- “देवगण ! पतिव्रता की शक्ति के सामने जगत् की सभी शक्तियाँ बलहीन हैं। इसलिए मृदुला को मनाकर ही दिन की सृष्टि की जा सकती है। आप सब अपने-अपने लोक लौट जाएँ। मैं स्वयं ही कोई ऐसा उपाय करूँगी, जिससे कि दिन-रात की व्यवस्था चलती रहे और उस पतिव्रता के पति के प्राण भी बच जाएँ। “

देवताओं को विदा कर सती अनसूया मृदुला के घर गईं। अनुसूया को देख मृदुला ने भक्तिपूर्वक उनका आदर-सत्कार किया।

तत्पश्चात् मधुर स्वर में बोली – “माते ! आपके आगमन से मैं धन्य हो गई। आपने अपनी चरणधूलि से मुझ तुच्छ की कुटिया को पवित्र कर दिया। कृपया अपने आगमन का उद्देश्य बताने का कष्ट करें। “

मृदुला की स्तुति से प्रसन्न होकर अनसूया बोलीं- “पुत्री मृदुले ! सूर्यदेव के विराम से दिन-रात की व्यवस्था का लोप हो गया है, जिससे कि यज्ञ, हवन आदि शुभ कार्य बंद हो गए हैं और देवताओं को भोजन मिलना बंद हो गया है। सृष्टि में हाहाकार मच गया है। इसलिए मैं तुम्हारे पास आई हूँ। तुम सृष्टि पर दया करो और सूर्यदेव को बंधन मुक्त कर दो। “

मृदुला हाथ जोड़ते हुए बोली – “माते ! माण्डव्य मुनि ने मेरे पति को शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। मैं किस प्रकार अपने पति का बुरा चाह सकती हूँ? आप ही मेरा मार्ग-दर्शन कीजिए, माते । “

सती अनसूया ने कौशिक को स्वस्थ करके पुनर्जीवित करने का वचन दिया। तब मृदुला ने सूर्यदेव को मुक्त कर दिया और सूर्योदय हो गया। सूर्योदय होने पर कौशिक की मृत्यु हो गई, किंतु अनसूया के वरदान से कौशिक ब्राह्मण पुनः स्वस्थ होकर जीवित हो गया। देवताओं ने शंख, मृदंग और ढोल बजाकर सती अनसूया की स्तुति की।