mahashakti ka chamatkaar
mahashakti ka chamatkaar

Hindi Katha: ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब की बात है। उन्होंने कई दैत्य पैदा किए जो जगत् में हालाहल नामक दैत्य कहलाए। उन दैत्यों में अपार बल था । उन्होंने अपनी तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे इच्छित वर प्राप्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।

तत्पश्चात् उन्होंने वैकुण्ठ और कैलाश को घेर लिया। उन दैत्यों का दुःसाहस देखकर भगवान् विष्णु और शिव उनसे स्वयं युद्ध करने आए। दैत्यों ने ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर रखा था, अतः धीरे-धीरे भगवान् विष्णु और शिव – दैत्यों से पराजित होने लगे। तब भगवती जगदम्बिका की अंशावतार देवी गौरी और देवी लक्ष्मी ने अपनी शक्तियों को विष्णु और शिव में स्थापित कर दिया। महाशक्ति के प्रभाव से उन्होंने हालाहल दैत्यों को समाप्त कर दिया। इससे उनमें अपनी शक्ति के प्रति अहंकार उत्पन्न हो गया और वे परब्रह्म जगदम्बिका की शक्ति की अवहेलना करने लगे। यह देख लीलावश महागौरी और महालक्ष्मी वहाँ से अन्तर्धान हो गईं। भगवती जगदम्बिका की शक्ति हटते ही दोनों प्रधान देवता शक्ति और तेजहीन हो गए।

उनकी यह दशा देख ब्रह्माजी बहुत चिंतित हुए। ध्यान लगाने पर उन्हें सारी बात ज्ञात हो गई। उन्होंने उसी क्षण अपने पुत्र दक्ष और सनक आदि को बुलाया और उनसे कहा – ” हे पुत्रो ! भगवती जगदम्बिका के तेज के अभाव में महादेव और श्रीविष्णु शक्तिहीन हो गए हैं। मैं सृष्टि रचना के कार्य में लगा हुआ हूँ। इसलिए तुम अपनी भक्ति से भगवती जगदम्बा को प्रसन्न करके उनसे पुनः अवतार लेने की प्रार्थना करो । ‘

पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर उनके सभी मानस पुत्र भगवती जगदम्बा को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर्वत पर चले गए और चित्त को एकाग्र करके माता के मायाबीज मंत्र का जप करने लगे।

दीर्घकाल तक कठोर तप करने के पश्चात् माता जगदम्बिका उनके सामने प्रकट हुईं और उनसे इच्छित वर माँगने के लिए कहा।

तब दक्ष ने विभिन्न प्रकार से माता जगदम्बिका की स्तुति की और विनम्रतापूर्वक बोले “माते ! आप ऐसी कृपा करने का कष्ट करें, जिससे कि भगवान् विष्णु और शिव को उनकी शक्तियाँ पुनः प्राप्त हो जाएँ। मेरे घर में अवतार लेकर मुझे धन्य करें, माँ। ” दक्ष की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती प्रेमपूर्वक बोलीं- ” हे दक्ष ! मेरे शक्ति-रूपों का तिरस्कार करने से ही शिव और विष्णु की ऐसी दशा हुई है। किंतु तुमने मेरे प्रिय मायाबीज मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप किया है, इसलिए मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। अत: मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि शिव और विष्णु को उनकी शक्तियाँ पुनः प्राप्त हो जाएँ । दक्ष ! मैं तुम्हारे घर सती के रूप में जन्म लूँगी और क्षीरसागर के यहाँ लक्ष्मी के रूप में। फिर मेरी प्रेरणा से वे शक्तियाँ विष्णु और शिव के पास चली जाएँगी। ‘

जगदम्बा के वरदान से शीघ्र ही दक्ष के घर में देवी सती का जन्म हुआ। देवी सती का विवाह शिव के साथ हुआ। क्षीरसागर के घर जन्म लेने वाली देवी लक्ष्मी का विवाह समुद्र-मंथन के पश्चात् भगवान् विष्णु से हुआ। इस प्रकार भगवती की कृपा से शिव और विष्णु पुनः शक्तिसम्पन्न हो गए।