Hindi Katha: सृष्टि के आरम्भिक काल की बात है, तीनों लोक जल में डूबे हुए थे। केवल भगवान् विष्णु शेषनाग पर सोए हुए थे। सैकड़ों वर्षों तक भगवान् विष्णु निद्रालीन रहे। तब एक दिन उनके कानों में जमे मैल से मधु और कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हो गए। वास्तव में वह मैल रजोगुण और तमोगुण का मिश्रण था, जिसने उन दो प्रतापी दैत्यों को जन्म दिया था। जल में खेलते-कूदते ही वे युवा हो गए। एक दिन उन्हें आकाश में एक दिव्य चमक दिखाई दी। वे दोनों उस दिव्य चमक को ही सृष्टि की साक्षात् रचयिता मानकर उसकी स्तुति करने लगे ।
अनजाने में ही उन्होंने एक हज़ार वर्षों तक देवी भगवती की कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उस दिव्य तेज से आकाशवाणी होने लगी ‘दैत्यो ! तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ । इच्छानुसार वर माँगो । ‘
मधु-कैटभ हाथ जोड़कर बोले – “हे देवी! हमें इच्छा-मृत्यु का वरदान देने की कृपा करें।” देवी भगवती ने उन्हें इच्छानुसार वरदान दे दिया और अपने तेजरूप में अदृश्य हो गईं। भगवती से वरदान पाकर मधु-कैटभ अत्यंत अभिमानी हो गए। दोनों दैत्य जल-जीवों पर अत्याचार करने लगे । एक दिन उनकी दृष्टि कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्माजी पर पड़ी । ब्रह्माजी को देख दोनों दैत्य उन्हें युद्ध के लिए ललकारते हुए बोले – ” हे प्राणी ! हमारे साथ युद्ध करो अथवा कमल का यह सुंदर आसन हमें सौंपकर यहाँ से चले जाओ, अन्यथा हम तुम्हें समाप्त कर देंगे। ‘
ब्रह्माजी ने ध्यान लगाया तो उन्हें उनकी शक्ति का भली-भाँति ज्ञान हो गया और वे अपने आराध्य देव भगवान् विष्णु की शरण में उनकी सहायता लेने पहुँचे। भगवान् विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। ब्रह्माजी ने प्रयास किया, लेकिन विष्णुजी की योगनिद्रा नहीं टूटी, तब ब्रह्माजी ने योगनिद्रा की ही स्तुति आरम्भ कर दी, जो देवी भगवती का ही निराकार रूप है। ब्रह्माजी की स्तुति से प्रसन्न होकर योगनिद्रा ने विष्णुजी के ऊपर से अपना प्रभाव हटा लिया और उसी क्षण विष्णुजी ने आँखें खोल दीं। ब्रह्माजी को वहाँ चिंतित देखकर श्री विष्णु बोले – “पद्मयोनि ब्रह्माजी ! आप जप-तप छोड़कर यहाँ कैसे आ गए? आप इतने भयभीत क्यों हैं?”
ब्रह्माजी बोले ‘भगवन् ! आपके कान के मैल से मधु और कैटभ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुए हैं। वे बड़े भयंकर और बली हैं। मैं उन्हीं के भय से आपकी शरण में उपस्थित हुआ हूँ । उनसे मेरी रक्षा कीजिए, प्रभु !
तभी ब्रह्माजी को ढूँढ़ते हुए मधु और कैटभ भी वहाँ पहुँच गए। ब्रह्माजी को देखकर वे दैत्य अहंकारपूर्ण शब्दों में बोले – ” हे प्राणी ! तुझे हमसे कोई नहीं बचा सकता। तू जिसकी शरण में आया है, उसके देखते-देखते ही हम तेरे प्राण हर लेंगे। इसके बाद सर्प पर बैठे इस प्राणी को भी मार देंगे । यदि तुम दोनों प्राण बचाना चाहते हो तो हमारी शरण में आ जाओ। हम तुम्हें जीवनदान दे देंगे। “
मधु-और कैटभ की बात सुनकर भगवान् विष्णु शांत स्वर में बोले – “दानव श्रेष्ठ ! तुम इच्छापूर्वक मुझसे युद्ध कर लो। तुम बहुत बली हो। तुम्हें असीम अभिमान हो गया है। यदि युद्ध करने की अभिलाषा हो तो आ जाओ, मैं तुम्हारा अभिमान दूर कर दूँगा।”
भगवान् विष्णु की बात सुन दैत्य मधु और कैटभ की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। मधु क्रोध से अंधा होकर श्रीविष्णु से जा भिड़ा। दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा। मधु के थक जाने पर कैटभ युद्ध में उतरकर श्रीविष्णु से लड़ने लगता था और उसके थक जाने पर मधु आ जाता था। इस प्रकार भयंकर युद्ध चलता रहा। ब्रह्माजी आकाश में खड़े होकर यह दृश्य देख रहे थे।
पाँच हज़ार वर्षों तक यह लड़ाई चलती रही। जब वे दैत्य किसी भी प्रकार पराजित न हुए, तब विष्णु मन-ही-मन मधु और कैटभ की मृत्यु के विषय में विचार करने लगे ‘आज तक कोई भी दैत्य मेरे समक्ष इतने समय तक नहीं ठहर सका। किंतु इतने लम्बे युद्ध के बाद भी ये भयंकर दानव नहीं थके, यह बड़े आश्चर्य की बात है । मेरा बल और पराक्रम कहाँ चला गया? ये दानव स्वस्थ किस प्रकार बने रहते हैं?’ यह सोचकर भगवान् विष्णु ने ध्यान लगाया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि ‘देवी के इच्छा-मृत्यु के वरदान के कारण मधु और कैटभ दैत्य इतने बली हैं। ये दानव वर के प्रभाव से गर्व में चूर हो रहे हैं। इनसे लड़ना व्यर्थ है । इनके अंत के लिए भगवती की ही शरण लेना उचित होगा । ‘
यह विचार कर विष्णु, योगनिद्रा देवी भगवती की स्तुति करते हुए बोले -‘माते ! ये दैत्य देवताओं के लिए भयानक संकट उत्पन्न कर रहे हैं। मैं इनके समक्ष स्वयं को शक्तिहीन अनुभव कर रहा हूँ। मुझे ज्ञात है, इनके पीछे केवल आपकी माया काम कर रही है। इनमें आप ही शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। माते ! जिसमें आपकी शक्ति का अंश विद्यमान हो, उसका अहित कोई भी नहीं कर सकता। किंतु हे कल्याणमयी माता ! जगत् के कल्याण के लिए आप इन दैत्यों से हमारी रक्षा करें। आपके अतिरिक्त कोई भी इनका संहार नहीं कर सकता।’
तब देवी ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए और कहा ” हे विष्णु ! जो प्राणी निःस्वार्थ भाव से मेरी पूजा करता है, मैं प्रसन्न होकर उसे तीनों लोक का राज्य भी प्रदान कर देती हूँ। किंतु मैं उस पर तब तक प्रसन्न रहती हूँ, जब तक वह मेरे दिए गए वरदान का प्रयोग जगत् के कल्याण के लिए करता है। यदि वह मेरे वर का दुरुपयोग करके सृष्टि के लिए खतरा बन जाता है, तो मैं अपनी माया से उसे पल भर में नष्ट कर देती हूँ। इन दैत्यों ने एक हज़ार वर्ष तक कठोर तपस्या कर मुझे प्रसन्न किया था। उसी के फलस्वरूप मैंने इन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। किंतु वर पाकर ये अहंकारी हो गए और स्वयं को परब्रह्म समझने लगे हैं। आप भय रहित हो जाएँ। अब इनका संहार कोई नहीं रोक सकता । मेरी वक्र दृष्टि से ये दोनों दानव शीघ्र ही मारे जाएँगे । ‘
यह कहकर माता भगवती ने श्रीविष्णु को आशीर्वाद दिया। इसके पश्चात् श्रीविष्णु पुनः युद्ध के लिए तैयार हो गए। परस्पर घोर युद्ध होने लगा।
सम्पूर्ण सृष्टि भगवती जगदम्बिका की माया से सम्मोहित है । जीवों का जन्म लेना, माता-पिता, पुत्र-पुत्रियों और बंधु-बांधवों के प्रति मोह उत्पन्न होना तथा आयु पूरी होने पर मृत्यु को प्राप्त होना – ये सब उनकी माया के विभिन्न रूप हैं। जगत् की सभी शक्तियाँ और विद्याएँ उनके समक्ष क्षीण हैं। वे श्रेष्ठ ज्ञानी और विद्वान को भी पल भर में मोह – ग्रस्त करने की शक्ति रखती हैं। जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी उनकी माया से मोहित हैं, फिर वे पापी दैत्य – मधु और कैटभ उनका सामना किस प्रकार कर पाते ? युद्ध करते हुए मधु-कैटभ की दृष्टि आकाश में देवी भगवती की ओर पड़ी और तत्क्षण दोनों उनकी माया से सम्मोहित हो गए।
उन्हें सम्मोहित देख श्रीविष्णु बोले – “वीरो ! तुम्हारे युद्ध-कौशल से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे समान वीर और पराक्रमी योद्धा सम्पूर्ण जगत् में नहीं है। तुम्हारे पराक्रम ने समस्त देवताओं को भी मोहित कर दिया है। इसलिए मैं प्रसन्न होकर तुम्हें अभिलषित वर प्रदान करना चाहता हूँ। राज्य, रत्न, आभूषण – तुम्हें जो इच्छा हो, माँग लो। “
उस समय मधु और कैटभ भगवती जगदम्बा की माया से मोहित थे, अत: भगवान् विष्णु की बात सुनकर वे दोनों अहंकार में भरकर बोले – ” हे वीर ! तुम्हारे पास क्या है हमें देने के लिए? तुम स्वयं हमारे सामने बलहीन हो । उल्टे तुम्हें कुछ चाहिए तो कहो। तुम्हारे इस अद्भुत युद्ध से हम बड़े प्रसन्न हैं। जिस वरदान की अभिलाषा हो, हमसे प्रार्थना करो । ‘
भगवान् श्रीविष्णु बोले ‘दानव वीर ! यदि तुम प्रसन्न होकर मुझे वरदान देना चाहते हो तो दोनों मेरे हाथ से मृत्यु स्वीकार कर लो। “
यह वर सुन दोनों भयभीत हो उठे। उन्हें मृत्यु का भय सताने लगा । तब चारों ओर जल देखकर दोनों युक्तिपूर्वक बोले – ” हे विष्णु ! हम अपना वचन अवश्य निभाएँगे। किंतु हमारी भी एक इच्छा है कि तुम हमें ऐसे स्थान पर मृत्यु दो, जहाँ जल न हो। “
भगवान् विष्णु ने अपनी दोनों विशाल जाँघें फैलाकर मिलाईं और मधु-कैटभ को जल पर ही जलरहित स्थान दिखा दिया। फिर बोले – ” इस स्थान पर जल नहीं है। यहाँ अपने सिर रखो। ” मधु-कैटभ ठगे से खड़े थे। उन्होंने स्वयं को मृत्यु के मुख में डाल दिया था। जैसे ही दैत्यों ने भगवान् की जंघाओं पर सिर रखे, उन्होंने सुदर्शन चक्र से उनके सिर काट दिए। उस समय जल उन दैत्यों के रक्त और मज्जा से व्याप्त हो गया। यह भी कहा जाता है कि पृथ्वी इन दैत्यों के रक्त और मज्जा से ही बनी। तभी से पृथ्वी का एक नाम ‘मेदिनी’ पड़ गया।
