Mulla Nasruddin ki kahaniya: पौ फटते ही जब तारों का प्रकाश धीमा होने लगा तो अँधेरे में चीज़ों के आकार उभरने लगे। सैकड़ों मेहतर, बढ़ई, कुम्हार और सफ़ाई करनेवाले बाज़ार में पहुँच गए और बड़ी लगन से अपना काम करने लगे। उन्होंने गिरे हुए शामियानों को सीधा खड़ा किया। पुलों की मरम्मत की। बाड़ों के सुराख़ों को भरा और टूटे बर्तनों तथा लकड़ी के टुकड़ों को साफ़ किया।
और सूरज की पहली किरण जब धरती पर उतरी तो बुखारा में रात के हंगामे का कहीं कोई निशान बाक़ी नहीं रह गया था।
रात भर आराम से कब्र पर सोने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर सवार हुआ और बाज़ार की ओर चल दिया। बाज़ार खुल चुके थे। चहल-पहल दिखाई देने लगी थी। लोगों के आने-जाने और तरह-तरह की बोलियों की भनभनाहट सुनाई देने लगी थी । व्यापारियों, फ़क़ीरों, भिश्तिचों, नाइयों और भिखारियों की आवाज़ें गूँजने लगी थीं। डरावने औज़ारों को हिलाते हुए दाँत निकालने वालों के शोर के बीच लोगों को अपनी आवाज़ तक सुनाई नहीं दे रही थी।
मुल्ला नसरुद्दीन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए चला आ रहा था – हटो बचो, रास्ता दो, रंग-बिरंगे लबादों, साफों, घोड़ों के कंबलों, कालीनों, बेचने – ख़रीदने वालों की चीनी, अरबी, मंगोलियन और भी अन्य कई भाषाएँ उस धक्कम – धक्का करती, भनभनाती भीड़ में शामिल थीं।
उड़कर धूल आकाश पर छा गई थी। आदमियों का कभी ख़त्म न होने वाला ताँता लगा हुआ था। अपना-अपना सामान फैलाकर व्यापारी उस शोर में अपनी आवाज़ें मिला रहे थे। कुम्हार पतली छड़ियों से अपने बर्तन बजा रहे थे और गुज़रने वालों के लबादे पकड़-पकड़कर बर्तनों की खनखनाहट सुनने का आग्रह कर रहे थे ताकि वे उन्हें ख़रीदने के लिए राज़ी हो जाएँ । ताँबे के बर्तनों की चमक चकाचौंध पैदा कर रही थी। छोटे-छोटे हथौड़ों की आवाजें गूँज रही थीं। कारीगर सुराहियों और किश्तियों पर डिज़ाइन बना रहे थे। वे ज़ोर-ज़ोर से अपनी दस्तकारी की तारीफें कर रहे थे। दूसरों के काम की बुराइयाँ कर रहे थे।
मुल्ला नसरुद्दीन बाज़ार से गुज़रता हुआ आगे बढ़ा तो उसे अमीर का महल दिखाई दिया। उसके चारों ओर तिरछे घटाव की चारदीवारी थी, जिसमें तोपों के लिए सुराख़ बने हुए थे।
महलके फाटक के बाहर एक रंग-बिरंगा खेमा था। एक फटे हुए शामियाने के नीचे गर्मी से बेहाल लोग बैठे थे। कुछ चटाइयों पर लेटे थे। कुछ अकेले थे और कुछ अपने परिवार के साथ थे। औरतें बच्चों को दूध पिला रही थीं या फटे हुए गद्दों या लबादों की मरम्मत कर रहीं थीं। अधनंगे बच्चे लड़ते- झगड़ते, चीखते- चिल्लाते दौड़ रहे थे और अपने जिस्म के पोशीदा हिस्से को महल की ओर कर रहे थे।
‘लगता है, ये , लोग यहाँ कई दिन से पड़े हैं।’ मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचा।
उसकी नज़र दो आदमियों पर पड़ी। उनमें से एक गंजा था और दूसरा दाढ़ीवाला, अपने-अपने शामियाने के नीचे वे नंगी ज़मीन पर लेटे थे। पास ही उन दोनों के बीच एक दुबला-पतला बकरा खूंटे से बँधा था। उसकी पसलियाँ खाल फाड़कर बाहर निकली पड़ रही थी । दर्द भरी आवाज़ में ‘मैं-मैं’ करता वह खूँटे पर मुँह मार रहा था। खूँटे का आधा भाग वह खा भी चुका था ।
अगर आप भले मुसलमान हैं तो अपने घरों में क्यों नहीं रहते। महल के फाटक पर क्यों पड़े हो ?’
‘हम अपने आका – ए – नामदार, जिनकी रोशनी सूरज को भी ढक लेती है, उनके इन्साफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं।’
मुल्ला नसरुद्दीन ने ताने भरी आवाज़ में कहा, ‘अच्छा! आप अपने बादशाह के सही और नेक इन्साफ़ का इंतज़ार काफ़ी देर से कर रहे हैं, जिसकी रोशनी सूरज को भी ढक लेती है?’
‘हम पाँच हफ्ते से इंतज़ार कर रहे हैं,’ गंजे आदमी ने कहा, ‘झगड़ालू दढ़ियल-अल्लाह इसे सज़ा दे – शैतान अपनी दुम इसके बिस्तर पर फैलाए । मेरा एक बड़ा भाई है। हमारे वालिद का इन्तकाल हो गया। वह हम लोगों के लिए जायदाद छोड़ गए थे। इस बकरे को छोड़कर हमने सब कुछ बाँट लिया। अब अमीर ही फ़ैसला करेंगे कि यह बकरा किसे मिलना चाहिए?’
‘लेकिन जायदाद कहाँ है, जो आप लोगों को विरासत में मिली थी?’
‘सब कुछ बेचकर पैसा इकट्ठा कर लिया, क्योंकि अर्जी लिखनेवाले मुशीरों, अहलदारों, पहरेदारों और दूसरे बहुत से लोगों को भी तो पैसा देना होता है न।’ गंजे आदमी ने कहा और फिर अचानक उछल पड़ा। फिर दौड़कर एक दरवेश को पकड़ लिया, जो नंगे पाँव था, गंदगी से भरा था, जिसके सिर पर नुकीली टोपी थी, बगल में काली तूंबी लटक रही थी।
‘ऐ नेकरूह इन्सान, मेरे लिए दुआ करो,’ गंजे ने कहा, ‘दुआ करो कि फ़ैसला मेरे हक में हो । ‘
दरवेश ने उससे रक़म ली और दुआ करने लगा।
फिर जैसे ही उसने दुआ का आखिरी लफ्ज बोला, गंजे ने उसकी तँबी में
एक सिक्का और डाल दिया । दरवेश फिर दुआ करने लगा।
दाढ़ी वाला परेशान होकर उठा और भीड़ पर नज़र दौड़ाने लगा। काफ़ी ढूँढने के बाद उसे एक दरवेश दिखाई दे गया, जो पहले दरवेश से भी ज़्यादा फटेहाल और गंदा था। इसीलिए वह ज़्यादा पाक था। इस दरवेश ने बहुत बड़ी रकम माँगी। दाढ़ीवाला मोलभाव करना चाहता था। लेकिन तभी दरवेश ने अपनी टोपी के नीचे से टटोलकर मुट्ठी भर बड़ी-बड़ी जुएँ निकालीं । दाढ़ीवाला उसकी पवित्रता को मान गया और माँगी हुई रक़म मंजूर कर ली और जीत की नज़र से अपने छोटे भाई की ओर देखते हुए रक़म दे दी।
दरवेश घुटने मोड़कर बैठ गया और ज़ोर-ज़ोर से दुआ माँगने लगा। इतने ज़ोर से कि उसकी आवाज़ में पहले दरवेश की आवाज़ दब गई।
गंजा परेशान हो उठा। उसने अपने दरवेश को कुछ सिक्के और दे दिए। दढ़ियल ने भी ऐसा ही किया। दोनों दरवेशों ने एक-दूसरे को हराने के लिए इतना शोर मचाया कि अल्लाह ने फ़रिश्तों से बहिश्त की खिड़कियाँ बंद करा दी होंगी ताकि इस शोरगुल से वह बहरे न हो जाएँ।
खूँटे को कुतरता हुआ बकरा लगातार दर्द भरी आवाज़ में मिमिया रहा था। गंजे ने उसके आगे तिपतिया घास का आधा गट्ठर डाल दिया।
‘मेरे बकरे के सामने से हटा अपनी बदबूदार घास ।’ दढ़ियल चिल्लाया। उसने लात मारकर घास हटायी और भूसी से भरा बर्तन उसके सामने रख दिया।
‘नहीं, मेरा बकरा तुम्हारी भूसी नहीं खाएगा ।’ गंजा गुस्से से चिल्लाया और भूसी का बर्तन भी घास के पास जा पड़ा। गिरते ही बर्तन टूट गया। भूसी सड़क की धूल में मिल गई।
दोनों भाई गुस्से में एक-दूसरे से गुथ गए। वे गालियों और घूँसों की बौछार करने लगे।
मुल्ला नसरुद्दीन ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘दो बेवकूफ़ लड़ रहे हैं और दो ठग दुआ माँग रहे हैं। इस बीच बकरा भूख से मर चुका है। ऐ नेक और आपसी मुहब्बत वाले भाइयो, ज़रा इधर तो देखो। अल्लाह ने बकरा छीनकर अपने ढंग से तुम्हारा झगड़ा निबटा दिया है। ‘
दोनों भाइयों को अक्ल आ गई। वे एक-दूसरे से अलग हो गए। खून से लथपथ चेहरों से वे देर तक मरे हुए बकरे को ताकते रहे। फिर गंजे ने कहा, ‘इसका चमड़ा निकाल लेना चाहिए । ‘
‘इसका चमड़ा मैं निकालूँगा।’ दाढ़ी वाले ने कहा ।
‘तुम क्यों निकालोगे?’ गुस्से से गंजी खोपड़ी लाल पड़ गई।
‘बकरा मेरा है, चमड़ा भी मेरा है। ‘
‘तेरा नहीं, मेरा है। ‘
इससे पहले कि मुल्ला नसरुद्दीन कुछ कह पाता, वे दोनों फिर गुथकर ज़मीन पर लोटने लगे।
एक पल बाद ही एक भाई की मुट्ठी में काले बालों का एक गुच्छा दिखाई दिया। मुल्ला नसरुद्दीन ने अंदाज़ा लगा लिया कि बड़े भाई की दाढ़ी का आधा हिस्सा नुच चुका है। निराशा से सिर हिलाते हुए वह आगे बढ़ गया।
अपनी पेटी में चिमटा खोसे एक लुहार उसे आता दिखाई दिया। यह वही लुहार था, जिससे एक दिन पहले ही तालाब पर उसकी बातचीत हुई थी।
मुल्ला नसरुद्दीन खुशी से चिल्ला उठा, ‘लुहार भाई, सलाम। हम फिर मिल गए। क्या तुम भी अमीर से इन्साफ़ माँगने आए हो?’
लुहार ने दुख भरे लहजे में कहा, ‘ऐसे इन्साफ़ से क्या फायदा? मैं लुहारों की बिरादरी की एक शिकायत लेकर आया हूँ। हमें पंद्रह सिपाहियों को तीन महीने तक खिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। एक साल बीत चुका है, वे अब भी हमारे सिर पर सवार हैं। इससे हमें बड़ा नुकसान हो रहा है। ‘
‘मैं रँगरेजों की गली से आया हूँ।’ दूसरे आदमी ने कहा। उसके हाथों पर रंगों के दाग थे। सुबह से शाम तक ज़हरीला धुआँ सूँघते हुए उसके चेहरे का रंग हरे रंग का हो गया था। ‘मैं भी ऐसी ही शिकायत लेकर आया हूँ। हमें पच्चीस सिपाही मिले हैं खिलाने को। हमारा कारोबार चौपट हो गया है और मुनाफा घट गया है। शायद अमीर हम पर रहम कर दे और इस बोझ से हमें छुटकारा दिला दे। ‘
‘तुम लोगों को बेचारे सिपाही बुरे क्यों लगते हैं? वे बुखारा के सबसे ज़्यादा ख़राब और लालची बाशिंदे तो हैं नहीं । तुम, अमीर, वज़ीर और अफसरों को पालते हो । दो हज़ार मौलवियों और छः हज़ार दरवेशों को पालते हो। खिलाते -पिलाते हो। फिर बेचारे सिपाही क्यों भूखे रहें? क्या तुमने यह कहावत नहीं सुनी – जहाँ एक सियार को खाना मिलता है, वहाँ तुरंत दस सियार आकर जमा हो जाते हैं। ऐ लुहार और रँगरेज भाई, तुम्हारी नाराज़ी मेरी समझ में नहीं आती । ‘
‘इतने ज़ोर से मत बोलो।’ लुहार ने चारों ओर देखते हुए कहा ।
रँगरेज ने मुल्ला नसरुद्दीन को टोकते हुए कहा, ‘तुम ख़तरनाक आदमी हो। तुम्हारी बात में नेकी नहीं है। हमारे अमीर तो बहुत ही समझदार और उदार हैं।
‘ उसने अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी, क्योंकि तभी ढोल और तुरही बजने की आवाज़ें आने लगीं। महल के पीतल जड़े फाटक धीरे-धीरे खुलने लगे और खेमों में चहल-पहल आरंभ हो गई।
हर ओर से अमीर – अमीर की आवाज़ें आने लगीं। लोग महल के सामने भीड़ लगाने लगे ताकि अमीर की सूरत देख सकें। मुल्ला नसरुद्दीन ने आगे की कृतार में एक सुविधाजनक स्थान खोज लिया।
सबसे पहले फाटक से दो लोग चीखते हुए निकले। वे चिल्ला रहे थे, ‘अमीर के लिए रास्ता ख़ाली करो । आला हजरत अमीर के लिए रास्ता खाली करो ।’
उनके पीछे-पीछे सिपाही निकले, जो अपनी लाठियों को दाएँ-बाएँ उन लोगों के सिरों और पीठ पर मार रहे थे, जो दुर्भाग्य से फाटक के सामने आकर इकट्ठे हो गए थे।
भीड़ में एक चौड़ा रास्ता बन गया। ढोल, बाँसुरी, तंबूरे लेकर मीरासी निकले। उनके पीछे हीरे जड़े मखमली म्यानों में तलवारें लटकाए, सुनहरे रेशमी कपड़े पहने, नौकर-चाकर आ रहे थे। फिर ऊँची अंबारियों से सजे दो हाथी निकले। सबसे अंत में एक बहुत ही सजी हुई गाड़ी आई। उसमें चंदोवे के भीतर खुद महान अमीर आराम से लेटे हुए थे।
यह देखते ही भीड़ में एक दबी फुसफुसाहट होने लगी। अमीर की आज्ञा के अनुसार सब लोग धरती पर लेट गए। अमीर का आदेश था कि वफ़ादार रियाया विनम्रता का व्यवहार करे और कभी आँखें ऊपर उठाकर न देखे। नौकर दौड़-दौड़कर सवारी के सामने कालीन बिछा रहे थे। गाड़ी के एक ओर पंखा झलनेवाला घोड़े की
दुम के बालों का चँवर अपने कंधे पर रखे चल रहा था। दूसरी ओर अमीर का हुक्के वाला था, जो बड़ी शान और गंभीरता से सोने का तुर्की हुक्का लिए साथ-साथ चल रहा था।
जुलूस में सबसे पीछे पीतल की टोपियाँ पहने, ढाल, भाले, तीर कमान और नंगी तलवारें लिए सिपाही चल रहे थे। उनके पीछे दो छोटी तोपें थीं।
चारों ओर दोपहर के सूरज की चमकीली धूप फैली हुई थी। उस तेज़ धूप में जवाहरात दमक रहे थे। सोने-चाँदी के जेवर चमचमा रहे थे। पीतल के टोप और ढालें चमचमा रही थीं। नंगी तलवारें कोंध रही थीं। लेकिन धरती पर लेटी भीड़ में न जवाहरात दमक रहे थे, न सोना; ताँबा तक नहीं। सूरज की चमकदार रोशनी में मन खुश करने के लिए वहाँ कुछ भी नहीं था। थी बस भूख, ग़रीबी और फटे चीथड़े। अमीर का शानदार जुलूस जब गंदे, जाहिल, दबे-पिसे और फटेहाल लोगों के बीच से गुज़रा तो ऐसा लग रहा था जैसे गंदे चीथड़े में सोने का पतला डोरा डाल दिया गया हो।
जिस ऊँचे तख्त पर बैठकर अमीर अपने वफादारों पर मेहरबानियाँ करने वाले थे, उसके चारों ओर पहले से ही पहरेदार तैनात कर दिए गए थे। सज़ा देने वाले जल्लाद अमीर के हुक्म को पूरा करने की तैयारियाँ कर रहे थे। बेंतों की लचक और डंडों की मजबूती की जाँच की जा रही थी। कुछ लोग कच्ची खाल की दुम वाले चाबुकों को नाँदों में भिगो रहे थे और ज़मीन में सूलियाँ तथा फाँसी के लिए खंभे गाड़ रहे थे।
जल्लादों का अफसर महल के पहरेदारों का अफसर था। उसका नाम अर्सला बेग था। अपनी क्रूरता के लिए वह दूर-दूर तक बदनाम था। वह काले बालों और मोटे बदन का सुंदर नौजवान था। उसकी दाढ़ी उसके सीने को ढकती हुई पेट तक पहुँच गई थी। उसकी आवाज़ ऊँट की बलबलाहट जैसी थी। लोगों पर दिल खोलकर लात-घूसों की बौछार करने के बाद वह अचानक झुक गया । विनम्रता से उसका बदन काँपने लगा।
धीरे-धीरे हिलती-डुलती सवारी तख़्त तक पहुँच गई। अमीर ने चंदोवे के पर्दे हटाकर लोगों को दर्शन दिए ।
