Haath Se Bade Haath
Haath Se Bade Haath

Kids story in hindi: अभी परसों ही स्कूल में आशु के चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी। एक से एक अनोखे चित्र थे। ज्यादातर प्रकति की सुंदरता के चित्र थे। चिड़ियाँ, पेड़ और फूल-पत्ते ऐसे लगते, जैसे सचमुच के हों और अभी-अभी बोल पड़ेंगे। यहाँ तक कि बगीचे की हरी घास भी ऐसी लगती, जैसे दूर से ही आँखों को ठंडक पहुँचा रही हो।

फिर आशु ने अपने मम्मी- पापा और दोस्तों के चित्र भी बनाए थे। बड़े ही जानदार। पड़ोस के बड़े हँसमुख बिरजू चाचा और श्यामला चाची के चित्र भी एकदम बोलते हुए से लगते। बिरजू चाचा आशु को बहुत प्यार करते थे, श्यामला चाची भी। दोनों खुद भी कलाकार थे। वे उसके चित्रों को भी खूब सराहते, और नए-नए चित्र बनाने को कहते। एक से एक सुंदर आइडियाज भी थे उनके पास। इससे आशु को बहुत मदद मिलती। वह चित्र बनाने बैठता तो उसे अपनी कोई सुध-बुध न रहती। वह जैसे किसी और ही दुनिया में जा पहुँचता।

हालाँकि, आशु को अपने दादा-दादी के चित्र बनाने में सबसे ज्यादा मजा आया था। पिछले महीने दादा-दादी उसके घर कोई पंद्रह-बीस दिन रुके थे। ये आशु के सबसे अच्छे दिन थे। वह दादा-दादी से खूब नई-नई कहानियाँ सुनता था। फिर उन पर कल्पना से बड़े नायाब चित्र भी बनाता। दादा-दादी दोनों देखते तो निहाल हो जाते। दिन भर आशु का माथा पुचकारते रहते।

दादी तो बार-बार यही कहती थीं, “आशु बेटे, ईश्वर ने तुझे बहुत बड़ा वरदान दिया है। तू जीवन में कुछ भी बनना, पर चित्र बनाना मत छोड़ना। ऐसे चित्र मैंने तो किसी और बच्चे के देखे नहीं। तुझमें कुछ अलग ही बात है।”

सचमुच कुछ न कुछ तो था ही आशु के चित्रों में। इसलिए चित्रकला प्रदर्शनी में जो भी उसके ये नए निराले चित्र देखता, वह मुरीद हो जाता। जी भरकर आशु की कला की तारीफ करता था। इतनी कम उम्र में ऐसे बोलते हुए जानदार चित्र बना लेना कोई छोटी बात न थी। आशु में सचमुच कुछ बात थी, जो बस आशु में ही थी।

उन चित्रों में गजब का आकर्षण और निखार था। सबसे सजीव लगती थीं उसकी बनाई रंग-बिरंगी चिड़ियाँ, जलपाँखी, तोते और मोर। जैसे इशारा करते ही अभी उड़ जाएँगे। रंगों का इतना बढ़िया मेल देखकर हर कोई ठगा सा रह जाता था।

वैसे चार-पाँच साल की उम्र से ही आशु के भीतर जाने कैसे चित्र बनाने की लगन पैदा हो गई थी। कोयले या खड़िया से फर्श पर दिन भर रेखाएँ खींचता रहता था। नर्सरी के दूसरे विद्यार्थी जब ‘ए बी सी’ भी नहीं लिख पाते थे, वह स्लेट पर जलमुर्गाबियाँ और बतखें बनाने लगा था। कुछ और बड़ा हुआ, तो रंगीन पेंसिलों से कॉपी पर चित्र बनाता। नए साल पर दोस्तों को रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में सुंदर तोहफे देता।

और अब तो आशु सातवीं कक्षा में आ गया था। उसका आत्मविश्वास और निखर गया था। बड़ी ही सधी हुई रेखाएँ खींचता और रंग भरते ही वे चित्र बोलने लगते। चित्र बनाने समय पूरी तरह उसमें खो जाता था आशु। और सच पूछो तो वह चित्र नहीं बनाता था, बल्कि चित्रों में एक नई, जीती-जागती दुनिया बसा देना चाहता था। कभी बनाते-बनाते एकदम उदास हो जाता, तो कभी खुद ही जोरों से हँस पड़ता। चित्रों में वह अपने मन को भी पिरो देता। इसीलिए उसके चित्रों में प्राण आ जाते। लोग हैरान होकर कहते, “अरे, ये चित्र तो किसी बड़े चित्रकार द्वारा बनाए गए लगते हैं!”

कई बार आशु के सहपाठी उसके बनाए चित्र घर दिखाने ले जाते। फिर सबके खूब तारीफ करने पर वे मुसकराते हुए कहते, “मगर इन्हें बनाने वाले चित्रकार की उम्र केवल ग्यारह वर्ष है!” सुनकर सभी चकित रह जाते।

फिर आशु के ड्राइंग के अध्यापक सोमेश जी तो उसकी प्रशंसा करते थकते न थे। बड़ी-बड़ी मूँछों वाले बड़े प्यारे थे सोमेश जी। हर बच्चे को वे प्यार करते, पर आशु पर तो वे जान छिड़कते थे। अकसर उसकी पीठ थपथपाते हुए कहते, “तुम बड़े होकर एक दिन नामी चित्रकार बनोगे, आशु। याद रखना मेरी बात। भूलना नहीं…!“

और आशु को मीठी गुदगुदी सी होती। आखिर उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना यही तो था।

*

पर आज…? आज सिर्फ दो दिन बाद ही उसके सपनों और उम्मीदों के घरौंदे पर जैसे किसी ने तलवार चला दी। आशु तड़पता हुआ सड़क पर पड़ा था, लहूलुहान!

उफ, क्या से क्या हो गया! वह घर आने के लिए बस से उतर रहा था कि अचानक पीछे से एक ट्रक तेजी से चलता हुआ पास से गुजरा। अंधाधुंध रफ्तार। मदहोश ड्राइवर को जैसे किसी चीज का होश ही नहीं। आशु धक्का खाकर किसी तिनके की तरह बड़ी दूर जा गिरा, और ट्रक के पहिए बेरहमी से उसके हाथों को कुचलते हुए आगे बढ़ गए। भयानक दर्द के मारे चीखकर आशु बेहोश हो गया था। उसकी बाँहें और सारा शरीर खून से लथपथ था।

आशु के मम्मी-पापा को यह खबर मिली तो वे घबराए हुए वहाँ पहुँचे। बेटे की यह हालत देखी, तो खुद को सँभालना मुश्किल हो गया। मम्मी का तो रो-रोकर बुरा हाल था। लगता था, यहीं बेहोश होकर गिर जाएँगी।

फौरन आशु को सिविल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने तुरंत इंजेक्शन लगाए और इलाज में जुट गए। पूरे चौबीस घंटों तक आशु बेहोश रहा। जब उसे होश आया तो वह दर्द के मारे कराह उठा। मम्मी और पापा ने प्यार से उसे लेटे रहने के लिए कहा। पर उसका ध्यान अपनी बाँहों की ओर गया, जिन पर प्लास्टर चढ़ा था। वह उन्हें हिला तक नहीं सकता था।

तभी उसे किसी भयानक सपने की तरह वह दुर्घटना याद आ गई। और पूरे शरीर में थरथरी सी होने लगी। कुछ देर बाद उसकी नजर अपनी बाँहों पर पड़ी, तो एक तीखी कराह सी निकल गई। उसकी आँखों से धारोधार आँसू बह निकले। आँसू बहते जा रहे थे, और वह बिलख-बिलखकर कह रहा था, “पापा…..पापा, अब मैं चित्र कैसे बनाऊँगा? मैं चित्र कैसे बनाऊँगा पापा?” कहते-कहते उसकी हिचकियाँ बँध गईं।

आशु की बात सुनते ही उसके मम्मी-पापा की आँखें भी आँसुओं से भीग गईं। अंदर ही अंदर उनकी जोर से रुलाई छूट रही थी। पर आशु को दिलासा देते हुए उन्होंने भर्राए हुए गले से कहा, “सब ठीक हो जाएगा, बेटा!… बिल्कुल ठीक हो जाएगा। तुम चिंता मत करो।”

मम्मी प्यार से आशु के सिर पर हाथ फेर रही थीं। पर उनका शरीर रह-रहकर काँपने लगता। जैसे जूड़ी बुखार हो। वे बैठे-बैठे अचानक सिहर उठतीं। आशु जानता था, वे भी अंदर ही अंदर रो रही थीं।

पर वह क्या करे? कैसे खुद को धीरज बँधाए, कैसे मम्मी, पापा को?

कुछ ऐसा हो गया था, जिसे सह पाना मुश्किल था। कह पाना भी। पिछली बातें सोचते ही जैसे प्राण निकलते थे। पर फिर भी सहना तो था। जीवन तो इसी का नाम है न।

उसी शाम को बिरजू अंकल और श्यामला आंटी भी आए। दोनों आशु को देखकर जैसे मुँहमारे से हो गए। चाहते थे कुछ बोलें, पर मुँह से आवाज निकलती ही न थी। चेहरा दुख की स्याही से पुता हुआ। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। आशु को वे सगे बेटे से ज्यादा प्यार करते थे। पर उसकी यह हालत देख, उनका कलेजा फटा जा रहा था। समझ नहीं पा रहे थे, क्या कहें, कैसे कहें?

बड़ी मुश्किल से श्यामला आंटी के मुँह से बोल निकले, “आशु, चिंता न करो। सब ठीक हो जाएगा बेटे।” फिर बिरजू अंकल भी उसका मन बहलाने के लिए बहुत सी बातें बताते रहे, जिससे आशु का दुख थोड़ा कम हो जाए। उसके दिल में थोड़ी हिम्मत, थोड़ा हौसला आ जाए।

फिर एकाएक उन्हें कुछ ध्यान आया। उन्होंने अपने थैले में से मोबाइल फोन निकाला, और उस पर पसंदीदा गीत लगा दिया। धीरे-धीरे कमरे की हवा में गीत के सुर गूँजने लगे-

हम होंगे कामयाब,

एक दिन,

हमको है विश्वास, पूरा है विश्वास…!

सुनकर आशु के चेहरे पर पहली बार एक मद्धिम सी मुसकराहट आई। श्यामला आंटी ने आगे बढ़कर प्यार से उसका माथा चूम लिया।

पूरे तीन महीने बाद आशु की बाँहों का प्लास्टर उतरा। अब वह बाँहों को थोड़ा-बहुत हिला सकता था। पर हाथ जैसे बेजान होकर रह गए थे। हाथों की उँगलियाँ बुरी तरह कुचल गई थीं।

इसके एक महीने बाद आशु ने फिर से स्कूल जाना शुरू किया। पर अब वह हर वक्त बुझा-बुझा सा रहता था। उसके मम्मी-पापा और अध्यापक उसे खुश रखने की लाख कोशिश करते, पर उसकी उदासी कम होने का नाम न लेती। वह हर वक्त गुमसुम सा रहता। कुछ सोचता हुआ था।

उसकी जिंदगी देखते ही देखते एकदम काली स्याह हो गई थी। यह अचानक क्या हुआ, कैसे हुआ! वह कैसे इससे उबरे? कुछ भी वह सोच नहीं पा रहा था। कभी-कभी उसे लगता, क्या सच ही वह इस दुख से कभी उबर नहीं पाएगा…और जिंदगी बस अब केवल बोझ बनकर रह जाएगी।

आशु के चित्रकला के अध्यापक सोमेश जी उसकी हालत देखकर बहुत दुखी थे। वे यह बात जानते थे कि चित्र बनाने का शौक आशु के रोम-रोम में बसा है। पर अब चित्र न बना पाने की विवशता के कारण वह निराश हो चुका है। वे आशु को इस निराशा के घेरे से बाहर लाने के बारे में विचार करने लगे।

क्या वे उम्मीद का कोई छोटा सा धागा भी आशु को पकड़ा सकते हैं? अगर ऐसा हो सके तो बहुत अच्छा।

सोमेश जी ने एक-दो बार समझाने-बुझाने की कोशिश की, पर आशु का चेहरा तो ऐसे बुझ गया था, जैसे किसी ने उस पर राख मल दी हो।

हालाँकि सोमेश जी निराश नहीं थे। बार- बार एक ही बात उनके मन में आती, चित्रकला में आशु के प्राण बसते हैं। वह चित्र न बना पाने से बहुत निराश है। पर अगर वह चित्र बनाने लग जाए, तो उसकी निराशा बहुत कम हो जाएगी। यही उसके लिए सही रास्ता भी है। यही, बस यही…बस, यही…!

*

एक दिन मास्टर जी ‘दैनिक नवयुग’ अखबार पढ़ रहे थे। तभी अचानक वे चौंक उठे। उनका ध्यान एक खबर पर गया, “पैरों से कढ़ाई-बुनाई कर सकती हैं अंबिका!”

यह खबर कोई बारह-तेरह बरस की एक अपंग लड़की के बारे में थी, जो पैरों से बहुत सुंदर चित्र बनाती थी। यहाँ तक कि वह पैरों से ही कढ़ाई-बुनाई भी कर लेती थी और खाना भी बनाती थी। मोती जैसे अक्षरों से लिख भी सकती थी। फिर रोजाना नहाना-धोना, कपड़े बदलना और घर की साफ-सफाई, ये सारे काम तो वह बड़े मजे में करती ही थी। कभी-कभी अपने और मम्मी-पापा के लिए चाय-नाश्ता बनाकर भी उन्हें हैरान कर देती थी।

खबर पढ़कर सोमेश जी को लगा, उनकी समस्या का हल मिल गया है। उन्होंने वह अखबार सहेजकर अपने पास रख लिया।

अगले दिन सोमेश जी ने आशु को बुलाया और अखबार में छपी यह खबर पढ़ने के लिए दी। उसे पढ़ते ही आशु के चेहरे पर चमक आ गई। आँखें झिप-झिप करने लगीं। पहली बार उसके चेहरे पर थोड़ा चैन और एक उम्मीद, एक उजाला सा नजर आने लगा था।

मन में एक अचरज सा। जैसे बहुत दिनों बाद सिर पर रखा निराशा का बोझ एकाएक हिल गया हो, और नाउम्मीदी के बीच रास्ता उसे नजर आने लगा हो।

दो दिन बाद इतवार को राजधानी के लाल किला मैदान में उस लड़की के इस अनोखे कार्यक्रम का प्रदर्शन होना था। आशु ने थरथराती आवाज में कहा, “मास्टर जी, मैं यह कार्यक्रम जरूर देखूँगा।”

“हाँ, बेटे, देखना। जरूर। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।” मास्टर जी के स्वर में गहरा प्यार छलछला रहा था।

उस दिन शाम को सोमेश जी आशु के साथ घर आए। उन्होंने आशु के मम्मी-पापा से कहा, “इतवार को आशु दिल्ली जाएगा मेरे साथ।” और सारी बात बता दी।

आशु के पापा हँसे, “वाह, आप दोनों ही क्यों? हम लोग क्यों नहीं?” आनन-फानन में उन्होंने सोमेश जी के साथ उस प्रदर्शन को देखने का कार्यक्रम बना लिया।

शाम को बिरजू अंकल और श्यामला चाची को भी यह बात पता चली। सुनकर उनके चेहरे खिल गए।

बड़े दिनों से हालत यह थी कि वे अंदर ही अंदर रोते रहते थे। बार-बार सोचते, आशु के पास जाकर उसे थोड़ी हिम्मत बँधाएँ। पर जानते थे, कि आशु के पास जाते ही उनकी रुलाई छूट जाएगी। इससे उलटे आशु के मन को ठेस लगेगी।

*

पर अब उनके मन में भी उम्मीद पैदा हो गई थी। थोड़ी उम्मीद, थोड़ा उजाला। सोचते, शायद कुछ हो जाए, शायद कुछ हो ही जाए। एक चमत्कार जैसा। और आशु की जिंदगी इतनी चुप-चुप और उदास न रहे।

बिरजू चाचा के पास अपनी कार थी। उसी में बैठकर इतवार को सब लोग दिल्ली पहुँचे। पहले चिड़ियाघर और गुड़ियाघर की सैर की और फिर लाल किले के सामने मैदान में शाम के समय कार्यक्रम देखने पहुँच गए।

*

ठीक समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ। उस छोटी-सी लड़की अंबिका ने आते ही सबको हाथ जोड़कर नमस्कार किया। फिर कहा-

“आप सब लोग बड़े हैं, मैं तो छोटी सी ही हूँ। मेरे पास क्या है, जो मैं प्रस्तुत करूँ। पर मन में ललक थी, तो मैं आज आपके सामने आई हूँ। वैसे मेरा यह कार्यक्रम कोई सर्कस का खेल तो है नहीं। यह हकीकत है। जिंदगी की हकीकत।…

“आज से कुछ साल पहले मेरी जिंदगी में बहुत दुख था। बहुत मुश्किलें। अचानक मेरे मम्मी-पापा ने एक रास्ता न
िकाला और मैं आगे चल पड़ी। चलती गई, बस चलती ही गई। होते-होते कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन पर पड़ा बोझ थोड़ा कम होता गया, मन में उम्मीद सी जाग गई। अंदर कोई कहता, ‘जिंदगी तुझसे मिलने आई है अंबिका, उसका स्वागत कर…उसके साथ हँस- खेल और नाच । हँसते-हँसते ऐसे काम कर, जिससे जिंदगी एक जगह रुकी न रहे!”

“और तब से बहुत कुछ मैंने खुद-ब-खुद सीखा। बहुत कुछ पाया। मन की निराशा हलकी होते-होते उड़ गई। आज मेरे मन में बस, आशा ही आशा है, उम्मीद ही उम्मीद। मेरे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं। उन्होंने कहा, बेटी अंबिका, एक बार लोगों को भी अपनी यह कला दिखाओ।… शायद इससे बहुत सारे लोग जो निराशा में पड़े हैं और बुरी तरह निराश हैं, उनके मन में भी जिंदगी का उजाला फूट पड़े।… तो इसीलिए यह कार्यक्रम करने को मैं तैयार हुई ।… अब देखिए आप कि वे सारे काम जो आप हाथों से करते हैं, और बहुत से तो हाथों से भी नहीं कर पाते, वे काम मैं हँसते-खेलते पैरों से करती हूँ। और अपने आप में मगन रहती हूँ …”

अंबिका की बात पूरी होते ही पूरा सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सभी लोग उसके सम्मान में खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे।

इसके बाद अंबिका का असली कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसके लिए वह यहाँ आई थी। उसने बहुत धीरज और आत्मविश्वास के साथ पैरों से सारा काम करके दिखाया। आशु उसकी एक-एक बात पर गौर करता रहा। उसका पैरों में चम्मच उठाना, पकड़ना, उससे बड़े मजे में प्याली में खीर डालकर खाना। या फिर सूई से कढ़ाई-बुनाई करना, ब्रश और रंगों से चित्रकारी, सभी कुछ। और सबसे बड़ी बात यह थी कि अंबिका के चेहरे पर जरा भी दुख की झाँईं न थी। उसका चेहरा आत्मविश्वास से दिप-दिप कर रहा था।

बिना कहे मानो वह कह रही थी, ‘यह ठीक है कि मेरे हाथ नहीं हैं। पर इससे क्या? मैं पैरों से वे सारे काम कर सकती हूँ, जो लोग हाथों से करते हैं। बल्कि पैरों से मैं उनसे भी ज्यादा अच्छा काम करके दिखा सकती हूँ। सिर्फ हाथ न होने से जिंदगी थोड़े ही खत्म हो जाती है। जिंदगी तो हौसले का नाम है, और हौसला मुझमें औरों से कहीं ज्यादा है। मैं मुश्किलों के पहाड़ से टकरा सकती हूँ। फिर भी मैं रोऊँगी या बिलखूँगी नहीं। हार नहीं मानूँगी, और अपनी हिम्मत से हर जगह जीतकर दिखा दूँगी।’

आशु को यह सब किसी सपने या जीती-जागती फिल्म जैसा लग रहा था। मन ही मन उड़कर वह भी जैसे फिल्म में शामिल हो जाता और फिर एक से एक अचरज भरे काम करने लगता।

कार्यक्रम के बाद आशु अपने मम्मी-पापा के साथ अंबिका से मिला। अंबिका को आशु बहुत अच्छा लगा। अपने जीवन की बहुत सी बातें उसने आशु को बताईं कि पहले उसे हर काम में कितनी मुश्किल आती थी, पर अभ्यास करते-करते, रास्ता निकलता गया। और अब तो वह अकेले सारे काम खूब मजे में कर लेती है।

आशु के मम्मी-पापा ने अंबिका को बताया कि उस दुर्घटना के बाद से आशु बहुत उदास बहुत रहता है। इस पर अंबिका ने बड़े प्यार से आशु के सिर पर हाथ फेरा। बोली, “सुनो आशु, मैं भी तो तुम्हारी तरह हूँ। लोग कहते थे, लड़कियाँ कुछ नहीं कर सकतीं। पर मैंने तो साबित करके दिखा दिया कि अगर मन में लगन है, तो लड़का हो या लड़की, वह अपनी मंजिल पाकर ही रहेगा। मैंने सोच लिया था कि मैं किसी की मदद नहीं लूँगी। बस, मेहनत करूँगी। खूब मेहनत, और इसी के बूते हार नहीं मानूँगी। एक दिन मैं वह करके दिखा दूँगी, जिसे देखकर सारी दुनिया हैरान हो। … तो जब मैं कर सकती हूँ आशु, तो भला तुम क्यों नहीं कर सकते? मुझे वचन दो, कि आज से तुम कभी रोओगे नहीं… और उदास भी नहीं होओगे।”

आशु ने अंबिका के सामने प्रॉमिस किया कि अब वह खुद को बदलेगा।

“मैं तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी आशु। तुम पढ़ना। फिर जब पैरों से लिखना सीख जाओ, तो मेरी चिट्ठी का जवाब तुम भी दिया करना। मैं एक दिन मम्मी-पापा के साथ तुमसे मिलने आऊँगी। ठीक है न आशु!” अंबिका ने मुसकराते हुए कहा। इस पर आशु भी मुसकरा दिया।

कार्यक्रम खत्म होने पर आशु को लगा, जैसे उसकी जिंदगी एकाएक बदल गई है। उसने मास्टर जी से कहा, “मास्टर जी, क्या मैं भी ऐसे ही चित्र बना सकता हूँ। बना सकता हूँ न!”

“हाँ-हाँ बेटे, क्यों नहीं? तुम कोशिश करो तो अब भी बहुत बड़े चित्रकार बन सकते हो।” मास्टर जी ने फिर से उसके आत्मविश्वास को जगा दिया।

*

आशु के भीतर यह बात बैठ गई। उसकी सोई हुई उमंग और सपने जाग गए। उसी दिन घर आकर उसने पैर से ब्रश पकड़ने और हलके-हलके चलाने का अभ्यास किया।

अब वह चित्र बनाने की कोशिश करने लगा। शुरू-शुरू में लकीरें टेढ़ी बनती थीं। रंग बिखर जाते थे। काम करने में उसे थकान भी बहुत ज्यादा हो जाती थी। पर धीरे-धीरे वह पैरों से चित्र बनाने लगा। बिरजू अंकल और श्यामला आंटी उसके चित्रों की खूब तारीफ करते। नए-नए आयडियाज सुझाते।

जल्दी ही आशु के चित्रों में पहले की तरह सफाई और निखार नजर आने लगा था। बल्कि उनमें कहीं अधिक गहराई आ गई थी।

बिरजू अंकल मुसकराकर कहते, “आशु, तुम्हारे ये चित्र तो पहले से ज्यादा अच्छे हैं!”

अब तो आशु पूरे आत्मविश्वास से जुट पड़ा और खूब मेहनत करने लगा। धीरे-धीरे उसके चित्रों में पहले जैसी कलात्मकता और आकर्षण आने लगा। जब उसने प्रकृति और जीवन के दृश्यों को अपनी कल्पना से रँगकर कागज पर उतारा, तो उनमें हँसी-खुशी के रंग पहले से भी ज्यादा छलछला रहे थे। उनमें जीवन का संगीत था।

सोमेश जी तो देखकर मुग्ध हो उठे। बोले, “आशु बेटे, तुमने साबित कर दिया कि तुम सच्चे कलाकार हो। जो सच में चित्रकार होता है, वह हाथों से नहीं, मन की आँखों से चित्र बनाता है।”

कुछ समय बाद सोमेश जी ने स्कूल के कवींद्र रवींद्र हॉल में फिर से उसके चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन किया।

ठीक दो साल बाद यह प्रदर्शनी हो रही थी। इस बार आशु के चित्रों में पहले से भी ज्यादा बारीकी और कल्पनाशीलता थी। हर चित्र में जीवन की हँसी-खुशी और मुसकानें छलक रही थीं। कुछ चित्रों में उसके अपने दुख की छाया थी। उदासी भी। पर ज्यादातर चित्र ऐसे थे, जो बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी हिम्मत न हारने का संदेश देते थे।

प्रसिद्ध चित्रकार देवधर जी ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। सबने दिल खोलकर चित्रों की सराहना की और आशु की लगन पर प्रसन्नता प्रकट की। देवधर जी ने आशु की तारीफ करते हुए उसे ‘कल का महान कलाकार’ बताया, तो उसकी आँखों से बरबस आँसू छलक पड़े।

उसने देवधर जी के आगे सिर झुकाकर आशीर्वाद लिया। फिर दौड़कर सोमेश जी के पैर छू लिए। बोला, “आपने रास्ता दिखा दिया है मास्टर जी। अब मेरे जीवन में कहीं अँधेरा नहीं है, कहीं नहीं! मैं अब कभी हारूँगा नहीं, रोऊँगा नहीं…!” कहते-कहते आशु की आँखों में खुशी के आँसू छलछला उठे।

दूर खड़े देवधर जी मंद-मंद मुसकरा रहे थे।

ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)