अकबर के इस सेनापति से नाराज होकर देवी मां ने मोड़ लिया मुंह, आज भी मंदिर में लगती है भक्तों की कतार: Shila Mata Mandir
Shila Mata Mandir

Overview:

जयपुर के आमेर महल में स्थित शिला देवी माता का भव्य मंदिर। इस मंदिर की मान्यता राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश में है। यही कारण है कि आमेर आने वाला हर शख्स इस मंदिर के दर्शन करने जरूर जाता है।

Shila Mata Mandir: एक मां अपने भक्तों की पुकार कैसे सुनती है और उनकी मदद किस प्रकार करती है, इसी का उदाहरण है जयपुर के आमेर महल में स्थित शिला देवी माता का भव्य मंदिर। इस मंदिर की मान्यता राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश में है। यही कारण है कि आमेर आने वाला हर शख्स इस मंदिर के दर्शन करने जरूर जाता है। यहां मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी के रूप में विराजित हैं। करीब 500 साल पुराना यह मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है। इसके साथ कई रोचक कहानियां भी जुड़ी हैं। आज भी नवरात्र के नौ दिनों में यहां मेला भरता है और हजारों भक्त यहां शिला माता के दर्शनों को आते हैं।

Shila Mata Mandir-शिला माता के विग्रह को 1508 में बंगाल के कूचबिहार के जसोर इलाके से आमेर लाया गया था।
The idol of Shila Mata was brought to Amer from Jasor area of ​​Cooch Behar in Bengal in 1508.

माना जाता है कि शिला माता के विग्रह को 1508 में बंगाल के कूचबिहार के जसोर इलाके से आमेर लाया गया था। राजा मानसिंह जसोर के राजा को हराकर माता को लाए थे। माता की यह प्रतिमा उत्तर मुखी है। एक समय था जब माता को नर बलि दी जाती थी। लेकिन इसके बाद पशु बलि दी जाने लगी। हालांकि 1972 के बाद पशु बलि पर भी रोक लगा दी गई।  

इतिहासकारों के अनुसार बंगाल के शासक राजा केदार थे। उस समय मुगल बादशाह अकबर के सेनापति मानसिंह का उनसे युद्ध हुआ। लेकिन पहली बार में मानसिंह परास्त हो गए। तब राजा मानसिंह को पता चला कि राजा केदार के पास शिला माता का विग्रह है। किवदंती है कि शिला माता का यह विग्रह समुद्र तल में था। एक दिन मानसिंह के स्वप्न में शिला माता आईं और उन्हें आशीर्वाद दिया कि जब वे माता के विग्रह को समुद्र तल से निकालेंगे तो उन्हें विजय मिलेगी। राजा मानसिंह ने ऐसा ही किया और युद्ध में उनकी विजय हुई। इसके बाद राजा मानसिंह शिला माता की इस चमत्कारी प्रतिमा को आमेर लाए और यहां भव्य मंदिर बनवाकर उन्हें विराजित किया।  

शिला माता की दृष्टि जयपुर की ओर नहीं है, बल्कि उनकी पीठ गुलाबी नगर की तरह है। इसे लेकर भी कई मान्यताएं हैं। माना जाता है कि  आमेर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने माता के विग्रह को उत्तर मुखी करवाया था। दरअसल, यह महिषासुर मर्दिनी का विग्रह है। ऐसे में ज्योतिषियों के मत के अनुसार अगर माता की दृष्टि जयपुर की ओर होती तो अकाल पड़ने की आशंका हो सकती थी। वहीं शहर की तरफ पीठ होने पर विकास होने की बात कही गई। इसलिए शिला माता के विग्रह को दक्षिण मुखी से उत्तर मुखी किया गया। ऐसे में माता रानी की पीठ जयपुर शहर की ओर है।

शिला माता का विग्रह बंगाल से आया था। यही कारण है कि इस विग्रह के साथ उनके पुजारी भी बंगाल से ही लाए गए थे। आज भी यहां बंगाली पद्धति से पूजा अर्चना की जाती है।  

शिला माता की दृष्टि टेढ़ी है। इसे लेकर भी कई कहानियां जुड़ी हैं। मान्यता के अनुसार 1727 ईस्वी में आमेर को छोड़कर कछवाहा राजवंश ने जयपुर को अपनी राजधानी बनाया। ऐसे में माता रुष्ट हो गई और उनकी दृष्टि टेढ़ी हो गई। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार राजा मानसिंह ने शिला माता को हर रोज एक नरबलि देने का वचन दिया, लेकिन वह उसे पूरा नहीं कर पाए। इसकी जगह उन्होंने पशु बलि देने की शुरुआत की, जिससे नाराज होकर माता रानी ने मानसिंह से मुंह मोड़ लिया।

मैं अंकिता शर्मा। मुझे मीडिया के तीनों माध्यम प्रिंट, डिजिटल और टीवी का करीब 18 साल का लंबा अनुभव है। मैंने राजस्थान के प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थानों के साथ काम किया है। इसी के साथ मैं कई प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की एडिटर भी...