zamindar babu gangasahay ke ghar mein
zamindar babu gangasahay ke ghar mein

शाम को गाँव में जमींदार बाबू गंगासहाय के यहाँ हम लोग पहुँच गए थे।

एकदम सादा रहन-सहन वाले इतने नेक और भले इनसान थे वे कि क्या कहूँ, क्या नहीं, कह पाना मुश्किल। कई बार हमारे शब्द साथ छोड़ जाते हैं।…कुछ ऐसा ही मैं महसूस कर रहा था।…शहीद मोहना के लिए उनके दिल में ऐसा प्यार, ऐसा आदर और गहरी तड़प थी…कि देखकर मैं और परमेश्वरी बाबू दोनों भाव-विह्वल।

वहाँ मोहना की ही चर्चा चलती रही। अजीब समाँ था। मोहना जैसे मरा नहीं, हिरनापुर की मिट्टी में, हवा में, आकाश में, चप्पे-चप्पे में समा गया हो।

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)