" शब्द कहाँ से लाऊँ ?"-गृहलक्ष्मी की कविता
Sabad Kaha se Laau

Hindi Poem: लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?
शब्द नहीं हैं मेरे पास।
जब भी कोशिश करती हूँ कुछ लिखने की
आँख मेरी भर आती है।
कोशिश करती हूँ कुछ सोचने की,
ठीक से सोच मैं पाती नहीं हूँ।
लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?
शब्द नहीं हैं मेरे पास।

पिता की तस्वीर दिल में समां जाती है,
रह रहकर उनकी याद दिलाती है।
पिता से बढ़कर कोई मित्र नहीं जहाँ में,
पिता से बढ़कर कोई विश्वास नहीं जहां में।
पिता हैं तो सब कुछ है यहाँ,
बिना पिता के कुछ भी नहीं जहाँ में।
लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?
शब्द नहीं हैं मेरे पास।

वो कुर्सी आज भी वहीं है जहां पहले थी,
बस नहीं हैं तो उस पर बैठे मेरे पिता।
वो घर की खिड़की पर टंगा हल्के से नीले रंग का पर्दा,
जो पिताजी ने अपने हाथों से टांगा था।
आज खिड़की वहीं है, पर्दा भी वही है,
नहीं हैं तो बस मेरे पिता।
लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?
शब्द नहीं हैं मेरे पास।।

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मायके जाती हूं घर का कोना कोना देखती हूं ,
कहीं दिखाई नहीं देते पिता।
कौन कहता है कि मां से मायका होता है?
मायका तो पिता से भी होता है,,
जहां उसके सपनों का राजकुमार,, उसके पिता ,,
अपनी बेटी के सपनों को पूरा करते हैं और
हर वक्त ससुराल से आने के लिए अपनी बेटी की प्रतीक्षा करते हैं।
लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?
शब्द नहीं हैं मेरे पास।।
जब भी कोशिश करती हूं कुछ कहने की,,,
बोल मैं पाती नहीं हूं।
आंखों से झर-झर बहते आंसू
मेरे पिता की याद दिलाते हैं।।